हयात हार-ओ-फ़तह का कोई खेल नहीं ,
ये कारवाँ-ए-वक़्त है, इसका कोई मेल नहीं ।
जो कुछ भी है यहाँ, सब फ़ानी हक़ीक़तें ,
किसी भी शय में बक़ा का कोई सिलसिला नहीं ।
हर इक मुस्कुराहट में ग़म की परतें पोशीदा,
कोई भी चेहरा यहाँ आइना-ए-दिल नहीं ।
गुज़र रहा है हर लम्हा रेत की मानिंद,
किसी के क़ब्ज़े में ठहराव का पल नहीं ।
ताल्लुकात के धागे भी कितने कमज़ोर निकले,
कि इनको बाँध सके ऐसा कोई हल नहीं ।
ख़ल्वत में जो मिला, वो अंजुमन में कहाँ मिलता,
ये तन्हाई भी दरअस्ल कोई महफ़िल नहीं ।
अजल का हुक्म है आना भी और जाना भी,
इस अम्र से जहाँ में कोई भी ग़ाफ़िल नहीं ।
आख़िर में बस यही इद्राक काफ़ी है “आनन्द”,
कि ज़ीस्त जी ली अगर, तो कोई हासिल नहीं ।
उर्दू शब्द और हिंदी अर्थ
ख़ल्वत - तन्हाई , हयात - ज़िन्दगी , फ़ानी- नश्वर , पोशीदा-रहस्य , ग़ाफ़िल- बेसुध , इद्राक- चेतना ,ज़ीस्त- जीवन
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