Sunday, March 29, 2026

ग़ज़ल

 

हयात हार--फ़तह का कोई खेल नहीं ,
ये कारवाँ--वक़्त है, इसका कोई मेल नहीं

जो कुछ भी है यहाँ, सब फ़ानी हक़ीक़तें ,
किसी भी शय में बक़ा का कोई सिलसिला नहीं

हर इक मुस्कुराहट में ग़म की परतें पोशीदा,
कोई भी चेहरा यहाँ आइना--दिल नहीं

गुज़र रहा है हर लम्हा रेत की मानिंद,
किसी के क़ब्ज़े में ठहराव का पल नहीं

ताल्लुकात के धागे भी कितने कमज़ोर निकले,
कि इनको बाँध सके ऐसा कोई हल नहीं

ख़ल्वत में जो मिला, वो अंजुमन में कहाँ मिलता,
ये तन्हाई भी दरअस्ल कोई महफ़िल नहीं

अजल का हुक्म है आना भी और जाना भी,
इस अम्र से जहाँ में कोई भी ग़ाफ़िल नहीं

आख़िर में बस यही इद्राक काफ़ी हैआनन्द”,
कि ज़ीस्त जी ली अगर, तो कोई हासिल नहीं


उर्दू शब्द और हिंदी अर्थ

ख़ल्वत - तन्हाई , हयात - ज़िन्दगी , फ़ानी- नश्वर , पोशीदा-रहस्य , ग़ाफ़िल- बेसुध , इद्राक- चेतना ,ज़ीस्त- जीवन


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