Monday, September 13, 2010

" आज हिंदी दिवस हैं,-१४ सितम्बर "

" आज हिंदी दिवस हैं, "


सुबह जागते ही अपनी पत्नी को कहा ,

हैप्पी हिंदी दिवस.

थोड़ी देर में अपनी गलती का एहसास हो गया,

हिंदी दिवस पर भी हैप्पी हिंदी दिवस बोल गया.

हिंगलिश का ये कैसा असर हो गया हैं हम पर,

मात्र भाषा ही भूल गए हम सब.

हर आदमी चाहता हैं,

बस उसको अंग्रेजी आ जाये,

हिंदी तो लोकल लोग बोलते हैं,

हम इंग्लिश बन जाए.

इस सम्रद्ध भाषा के अब कम ही ज्ञानी रह गए हैं,

कुछ लोग अँगरेज़ और कुछ हिंगलिश हो गए हैं.

कितनी बड़ी बिडम्बना हैं,

अपनी राज्यभाषा को मनाने के लिए ,

हमें उसका दिवस मनाना पड़ रहा हैं.

मेरे जैसे कट्टर हिंदी समर्थक भी,

अब हिंगलिश बोलने में शान समझ रहे है.

हिंदी तड़प रही हैं अपने ही नौनिहालों के बर्ताव से,

धीरे धीरे दम तोड़ रही हैं हिंगलिश और इंग्लिश के प्रभाव से.

Saturday, September 11, 2010

रास्ते से एक दिन खुदा जा रहे थे......

रास्ते से एक दिन खुदा जा रहे थे,

मुझे देख कर आँख चुरा रहे थे,

मैं भी कम न था,

पकड़ ही लिया अगले नुक्कड़ पर,

बैठा दिया एक चाय के खोमचे पर,

कुछ इधर उधर की बाते की,

फिर मैं लाइन पर आ ही गया,

पूछ ही डाला सवाल खुदा से,

जिससे एक बार तो खुदा भी सकपका गया,

मैंने पूछा , " अपनी ही बनायीं दुनिया में,

यु छुपे- चुप्प घूम रहे हो "

चाय का घूँट शायद गले में ही अटक गया,

दर्द उनकी आँखे में आ गया,

" सोच कर क्या बनायीं थी मैंने दुनिया,

ये हाल क्या हो गया.

दुनिया बनाने से थोडा थक कर सो गया था,

लेकिन अंदाज़ा न था, इतनी देर में सब कुछ बदल जायेगा,

रचनाकार को खुद ही आसरा दूंदना भारी हो जायेगा."

मैंने सोचा अब अपना दर्द बता कर क्यूँ परेशान खुदा को करू,

खुद ही संभल जाऊंगा, खुदा को चाय के चुस्कियो के बीच ही छोड़ दिया.



 

चल खुदा, मेरे साथ चल...

" चल खुदा, मेरे साथ चल, तुझे तेरी ही दुनिया दिखाता हूँ.


तुने जो भी सोचा था, हकीकत में दिखाता हूँ.

तुने तो सबको एक सा बनाया था, मगर फर्क कितना , समझाता हूँ.

कोई तो भूखा मरे , और कही खजाने भरे पड़े.

तुने तो सबको प्यार करना सीखाया, मगर यहाँ तो भाई भाई से लड़े.

तुने कितने जतन से बनाई दुनिया, मगर तेरे ही बन्दे इसकी तस्वीर बदले.

तुने तो एक धर्म बनाया मानवता का, यहाँ तो कितने पंथ बने.

अब तो तुझे भी कई नाम दे दिए, एक तू निरंकार अब तेरे हजारो नाम हुए.

तुझे बंद कर इट के दरवाजो में, तेरे नाम से कितने घर जले.



चल खुदा ! मेरे साथ चल, तुझे तेरी ही दुनिया दिखाता हूँ.

जो तेरा नाम रोज़ ले, मुशीबत में वो ही पड़े,

जो करे आज तमाशा , हाथ दुनिया उसी को जोड़े.

सच में तुने भी रचना करने के बाद इस दुनिया की सुध नहीं ली.

सब कुछ बना दिया है अच्छा, ये सोच आँखे मूद ली.

तेरे ही बन्दों ने देख तेरी दुनिया की हालत बदल दी. "

Thursday, September 9, 2010

कागजो की आपबीती ....( दूसरा भाग)

सुनकर करेंसी नोट के कागज़ की दास्तान,

सारे हो गए हैरान,

जिसे सारे अब तक बड़ा खुशकिस्मत समझ रहे थे,

उसी पर अब सारे तरस खा रहे थे,

अश्रुपूर्ण नयनो को लेकर जब वो नीचे उत्तरी,

चुपचाप जाकर अपनी सीट पर बैठी,

जो अब तक उसे ललचाई नज़रो से देख रहे थे,

अब वो बगले झांक रहे थे.

हर चीज़ जो चमकती है, सोना नहीं होती ,

एक दुसरे के कान में कह रहे थे.

वो भी अपनी बिरादरी की ही हैं,

उसके दुःख में सारे शरीक हो रहे थे.

किसी की किस्मत और हैसियत से जलो मत,

वो भी आग में तप कर उस जगह काबिज़ हुआ हैं.

सब अपनी अपनी जगह राजा हैं,

सबका अपना अलग अलग रास्ता,

जिसका जो काम उसी को भाता हैं,

हर ख़ुशी के पीछे दर्द का बड़ा सैलाब हैं.

Friday, September 3, 2010

कागजों की आपबीती ..........

कागजों के एक सेमीनार में,


सब करेंसी नोट की किस्मत से जल रहे थे,

सब अपनी अपनी बारी से अपनी किस्मत का रोना रो रहे थे,

अखबार वाला कागज़ अपनी दुविधा बता रहा था,

किताबो का कागज़ अपने पर पड़ी धूल को हटा रहा था.

लेकिन सब करेंसी नोट के कागज़ की बोलने की बारी का इंतज़ार कर रहे थे,

आखीर में करेंसी नोट का कागज़ सजा धजा मंच पर पहुचने को तैयार हुआ ,

मंच तक पहुचने के छोटे से रास्ते में ही हजारो ने उसको ललचाई नजरो से घूरा.

छीना झपटी से बचता बचाता वो मंच तक पंहुचा.

तालियों की गूँज से उसका बड़ा स्वागत हुआ.

वो सहमा सहमा माइक तक जा ही पंहुचा,

" मुझे यु मत देखो ललचाई नज़रों से,

अब कुछ भी बचा नहीं हैं मुझमे,

कितने लोगो के पास रह कर गुजरी हूँ में,

गिनती भी कम पड़ गयी हैं गिनने में,

तुम सब मेरी किस्मत पर जल रहे हो,

मगर हकीकत बिलकुल उलटी हैं,

मैं तुम्हे खुशकिस्मत समझती हूँ,

तुम किसी एक के पास रहकर सजती तो हो,

मैं तो कभी इस हाथ में, कभी उस हाथ में,

कभी किसी की तिजोरी में, कभी किसी के जेब में.

एक जगह कभी टिक नहीं सकती,

किसी को अपना कह नहीं सकती,

मुझ पर घर तोड़ने के आरोप लगते हैं,

भाई भाई आपस में मेरे लिए लड़ते हैं.

मुझे ही दुनिया वाले सबसे बड़ा समझते हैं.

सारे दुनिया के बुरे काम मुझसे ही होते हैं.

लोगो को मुझे पाने के लिए दिन रात एक करते देखती हूँ,

बच्चो को उनके अपनों से दूर होते सोचती हूँ,

में न चाहते हुए भी सबमे शरीक हूँ,

मुझसे पूछो तो में सबसे गरीब हूँ. "

सब स्तब्ध रह गए नोट की आपबीती सुन कर,

सन्नाटा पसर गया सारे हॉल पर.
 
(फिर क्या हुआ, अगले भाग में ................पढते रहिये )

Thursday, August 26, 2010

जीवन एक सागर..ज़िन्दगी एक नाव !

जीवन एक सागर..


ज़िन्दगी एक नाव,

हम हैं केवट और हमारा संघर्ष उसकी पतवार,

पतवार संभाले हम भी चल रहें हैं जीवन सागर में,

और करोडो लोग हमारे साथ.

न जाने कहाँ किनारा हैं इस सागर का,

किसी को भी नहीं हैं इसका एहसास.

किसी की नाव गोते खा रही ,

किसी को लहरों का मिल रहा हैं साथ.

कोई लेकर चल रहा अपनों को लेकर साथ,

कोई अकेला ही चप्पू चला रहा और कर रहा मंजिल की तलाश.



हर एक का बस एक लक्ष्य ,

जाना हैं इस सागर के पार,

कोई सीधी रखता हैं पतवार,

कोई हवायो के रुख को देख कर चल रहा अपनी चाल.

कोई तेज चप्पू चलता ,

कोई रखता अपनी मंद चाल.



कितने पीछे छूट रहे इस सफ़र पर,

कितनो का मिल रहा हैं साथ.



जीवन सागर में ज़िन्दगी नाव,

करती जाती कितने पड़ाव पार.



जारी हैं अनंत काल से ये सफ़र ,

पता नहीं कितनो ने पार किया ये सागर,

चलो चलो , आगे चलो ....

शायद हम भी हो जाए उस पार.

Friday, August 20, 2010

चौथा पड़ाव......समय सबसे बलवान

समय का चक्र अपनी गति से घूमता जाता हैं,
कभी सुख , कभी दुःख हर एक को दे जाता हैं.


हर ख़ुशी में ये बात याद रखो, ये पल भी बीत जायेगा !
समय का चक्र हैं, कभी भी पल बदल जायेगा.


दुःख के दिन जरा लम्बे लगते हैं ! घाव जरा धीरे सूखते हैं.
सुख के दिन जरा जल्दी बीतते हैं ! ज़िन्दगी के ये दो पहलू चलते रहते हैं.


समय अपनी गति से चलता रहता हैं !
न वो किसी के लिए रुकता हैं और न अपनी चाल मंद करता हैं.


उसको लिए सब बराबर हैं जगत में, वो किसी के लिए कोई फर्क नहीं करता हैं !
किसी को घाव , तो किसी को मरहम देकर रेत की तरह हर एक की मुट्ठी से फिसलता हैं.

Friday, July 23, 2010

तीसरा पड़ाव.........इच्छा का कोई अंत नहीं

" इच्छा का कोई अंत नहीं,

थोड़े से अब किसी का पेट भरता नहीं,

जो कुछ हैं उसमे अब किसी को संतोष नहीं,

और ज्यादा , ज्यादा की इस दौड़ का कही कोइ अंत नहीं.



जो हैं शायद वो कम हैं , और चाहिए !

मगर कितना चाहिए किसी को इसका पता नहीं.

सबकी की परेशानियों का शायद मूल यही.

और......... और......की इस अंधी दौड़ में,

ज़िन्दगी हर वक़्त सिसकती रही. "

Thursday, July 15, 2010

What is True Relationship?

A boy and a girl were playing together. The boy had a collection of marbles. The girl had some sweets with her. The boy told the girl that he will give her all his marbles in exchange for her sweets. The girl agreed.


The boy kept the biggest and the most beautiful marble aside and gave the rest to the girl. The girl gave him all her sweets as she had promised.

That night, the girl slept peacefully. But the boy couldn't sleep as he kept wondering if the girl had hidden some sweets from him the way he had hidden his best marble.


Moral of the story: If you don't give your hundred percent in a relationship, you'll always keep doubting if the other person has given his/her hundred percent.. This is applicable for any relationship like love, employer-employee relationship etc., Give your hundred percent to everything you do and sleep peacefully.

( I Don’t know who wrote this story, but one of my friend forwarded it to me and I really like it to share it with all my readers)

Wednesday, July 7, 2010

दूसरा पड़ाव ......अंतर्मन की यात्रा .............

खुद पर भरोसा ज्यादा हो गया हैं,
दुसरो से उम्मीदे करना बंद कर दिया हैं .
जीवन पथ के इन रास्तो को ,
अकेले नापने की कवायद शुर कर दी हैं.

मेरे अन्दर खुद खुदा का अंश हैं,
"अहम् ब्र्ह्मष्मी "मंत्र की महता समझ आ गयी हैं.
लेकर साथ अपने अर्धांगिनी और बिटिया को,
जीवन युद्ध में यात्रा अपनी शुरू कर दी हैं.

न किसी से कोई बैर , न किसी से कोई गिला शिकवा,
जीवन पथ के अनजाने सफ़र में हर मुमकिन कोशिश शुरू कर दी हैं.
जीतना हैं इस जंग को हर हाल में ,
मन में ठान ली हैं.

निराशा के बादलो को अपनी उम्मीदों के सूरज से छठा दिया हैं,
विश्वास और संकल्प से हर परिस्थिति से मुकाबला करना हैं.
इश्वर के दिए इस वरदान "जीवन" को,
हर हाल में सार्थक करना हैं. 

Monday, July 5, 2010

पहला मील का पत्थर.............

पीछे मुड़कर देखने की आदत से अब तौबा कर ली हैं.
यादो को बाट  कर, अच्छी यादे सारी गठरी में भर ली हैं.
बुरी यादो को  तिलांजलि दे दी हैं.

जब से निकला हूँ अंतर्मन यात्रा पर,
सोचता हूँ दुनिया उतनी बुरी नहीं हैं.

दुसरो की कमियाँ खोजने से पहले ,
अपनी गिरेबान झाकने की हिम्मत आ गयी हैं.

लगता हैं अब सारा जहाँ मेरे लिए हैं.
एक चेहरे को खोजो, हजार अच्छे चेहरे बगल में ही खड़े हैं. 

अंतर्मन की इस यात्रा में , मैंने बुराईया निकलना छोड़ दिया हैं.
खुद की खोज में एक मील का पत्थर शायद मैंने छू लिया हैं.

Thursday, July 1, 2010

तलाश ..........

निकल पड़ा हूँ खुद को ढूँढने,
अंतर्मन को अपने टटोलने,
हर रोज़ पूछता हूँ खुद से सवाल,
आज कितनी की तुने खुद की तलाश,

यु ही तो रचा नहीं होगा खुदा ने मुझे,
सौंपा होगा कुछ न कुछ नेक काम.
बस उसी अंतर्मन की यात्रा को,
शुरू हो गया हैं मेरा अभियान.
 
 
न कोई गेरुआ वस्त्र, न कमंडल हाथ में ,
न कोई मंदिर मस्जिद के चक्कर ,
दिल मैं रखकर उस खुदा को,
रोज़ सांसारिक जीवन जी कर,
शुरू कर दी अपनी तलाश.........

Thursday, June 24, 2010

मैं कौन हूँ और मेरा मकसद क्या. ?

मैं कौन हूँ, मुझे मुझसे मेरी पहचान करा दे.
भीड़ में खड़ा हूँ, मैं सबसे अलग कैसे हूँ,
ऐ मेरे खुदा मुझे इतना तू बतला दे.
मैं जानता हूँ, तुने मुझे यू ही नहीं भेजा होगा धरती पर,
तू मुझे मेरे मकसद में लगा दे.

यू बेमकसद ज़िन्दगी गुजारी नहीं जाती,
कुछ कर गुजरने की चाहत जीने नहीं देती ,
मगर यू ही वक़्त गुजरता हैं हर रोज़,
मंजिल कौन सी हैं , कहाँ हैं इसका पता नहीं.

हर रोज़ टटोलता हूँ अपने आप को ,
मैं कौन हूँ और मेरा मकसद क्या.

Friday, June 11, 2010

मेरी विवशता .............

पिछले दो हफ्तों से कोई कविता नहीं लिख पाया इसलिए माफ़ी चाहता हूँ.


कोई विषय ऐसा दूंढ नहीं पाया जिस पर शब्दों का जाल बून सकू.

दो चार पंक्तियों से आगे नहीं बड पाया ,

विषय बहुत हैं मन करता हैं सब पर लिखता जाऊ,

मगर कुछ ऑफिस की टेंशन, कुछ और की चिंता,

शब्दों को पिरोने नहीं दे रही,

सुकून से सोच सकू कुछ, हालात कुछ ऐसे बन नहीं रहें.

कविता लिखने के लिए अभी कुछ भी नहीं.


मगर शब्दों की कुलबुलाहट मुझे चैन से रहने भी नहीं देगी,
भावनाओ का ज्वार लेकर में फिर वापस आऊंगा कुछ शब्दों को फिर सार्थक करूँगा.

Tuesday, June 1, 2010

बहन की विदाई ..........

अपनी बहन को शादी के दिन विदा करते हुए,

कितना अपने दिल को समझाया था !

आँखों की कोरे गीली नहीं होने दूंगा ,
रह रह कर मन को समझाया था !

मगर जब विदाई की बेला आई ,
तो खुदबखुद आंसू छलक आये !

उसके साथ बिताये वो हर पल आँखों में तैर गए.
दुनिया की रीत के आगे हम भी झुक गए !

हमारी छोटी सी गुडिया हमें छोड़ के चली गयी ,
हम आँखों में पानी लिए मुस्कराते रह गए !

बचपन से उसकी जवानी तक हम उसके रक्षक बने रहे,
एक दिन फिर एक अनजान से सफ़र पर उसको अकेला विदा कर गए.

(यह कविता समप्रित है सब भाई बहनों को, जिनके बीच स्नेह और प्यार कहा अटूट बंधन होता हैं. )