Thursday, May 5, 2011

इन्क्रीमेंट ....


वो अपने इन्क्रीमेंट को लेकर नाखुश दिखा, 
रात भर सोचा और सुबह बॉस के पास पंहुचा, 
दिल की सारी भड़ास निकालने के बाद , 
बॉस को इस्तीफे देने की बात कहकर , 
चुपचाप अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. 

थोड़ी देर सोचने के बाद फिर बॉस से टाइम माँगा, 
और फिर बॉस से मिलने चल दिया. 
बॉस  ने उसको कोफी पिलाई और कहां, 
" हाँ ! अब बताओ तुम्हे क्या कहना हैं, "
उसने एक सांस में अपने साथियों के उससे ज्यादा सैलरी  बड़ने का जिक्र किया , 
और पुछा , " सर, मैंने भी तो साल भर मेहनत से काम किया फिर मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों किया?"
बॉस ने उत्तर दिया, " तुम अपनी सैलरी कम बढने से नाखुश हो या दुसरो की तुमसे ज्यादा बड़ी हैं, इससे परेशान हो.
मेरे हिसाब से तुम्हारी सही बड़ी हैं, तुम ही बताओ तुमने साल भर में ऐसा क्या किया, 
जो मैं कह सकू की तुम औरो से अलग हो.
इस साल कुछ असाधारण करके दिखाओ , अगले साल तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर दूंगा "
वो बॉस की बात सुनकर मर्म समझ गया, पिछले दो साल में ३ बॉस को बदलते देख चुका, 
चुपचाप सीट से उठा , और फिर से अपने काम में लग गया. 

जय हो इन्क्रीमेंट की ! जय हो बॉस की ! 

Wednesday, May 4, 2011

रोज़ सुबह........

रोज़ सुबह सवाल करती हैं ज़िन्दगी मुझसे, 
आज नया क्या करेगा ? 
रोज़ शाम फिर मुझे कचोटती है, 
यूँ ही गवा दिया फिर तुने दिन एक नया. 
ये जदोजहद न जाने कितने सालो से रोज़ होती हैं. 
मैं रोज़ रात को फिर अगले दिन को यादगार बनाने की कसम खाता हूँ, 
अगले दिन फिर रात को अपने को वही पाता हूँ. 

Wednesday, April 27, 2011

असमंजस ..................

छोटा सा टॉप और जींस पहनकर , 
वो बस में सफ़र कर रही थी, 
कही से कुछ न दिख जाये, 
बार बार टॉप और जींस को एडजस्ट कर रही थी, 
फिर अपने आस पास के लोगो की घूरती निगाहों से, 
बचने का प्रयास कर रही थी. 

मैं ये सब माजरा देख रहा था, 
लड़की को फैशन के चक्कर में, 
परेशान होते देख रहा था. 
अब ये दुनिया के साथ चलने की कवायद थी उसकी, 
या यार दोस्तों से पीछे रहने का डर उसे सता रहा था. 
कुछ भी कारण हो वो खुद को बड़ी असहज पा रही थी. 

Sunday, April 17, 2011

अहम ब्रह्म्ष्मी .........

जब भी तू हो उदास, मन भर आये होकर कोई बात.


दुनिया जब बेगानी सी लगने लगे,

अपने से जब थोडा भरोसा डगमगाने लगे,

हर चीज़ जब बुरी लगने लगे, किसी काम में मन न लगे,

तसल्ली से किसी एकांत जगह पर बैठ ,

बस थोडा आँख से आंसू निकाल,

और फिर जब थोडा मन हल्का हो जाए,

तो एक मंत्र रख याद,

दस बार खुद से " अहम ब्रह्म्ष्मी " बोल डाल,

खुद को खुदा की एक सम्पूर्ण रचना मान,

याद कर वो लोग, जो बिना कुछ होते हुए भी हंस कर जी रहें हैं,

याद कर वो लोग, जो तेरे पीछे खड़े हैं.

याद कर अपनी माँ का तेरे लिए वो लाड प्यार,

याद कर पिता का वो डांट में तेरे लिए आशीर्वाद,

तू खुद में पूरा हैं , तुझमे में कोई कमी नहीं हैं,

बस थोडा हालातो का धोखा हैं, और समय नहीं तेरे साथ.

मगर ये भी कितने पल ठहरेगा , तेरे सोचने मात्र से ही काफूर हो जायेगा,

फिर से तू खड़ा होगा, लेकर अपने सपनो को साथ.

चल- चला - चल तेरे आगे सारा नीला आकाश.

Wednesday, April 13, 2011

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं...

किताबो में बहुत पढ़ा की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,


जब तक अपने छोटे से गाँव में रहा ,

तो यकीनन लगता था की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,

दुसरे गाँव में भी किसी एक घर में कुछ अच्छा या बुरा होता था,

तो जाने अनजाने खबर हो ही जाती थी,

ख़ुशी की खबर से अच्छा लगता था तो दुःख की खबर में बुरा लगता था.

मगर जब से शहर आया हूँ,

ये उक्ति बेमानी सी लगती हैं,

दस सालो से जिस जगह में रहता हूँ,

अपने पडोसी को मैं खुद नहीं जानता हूँ.

उसके सुख दुःख में शरीक होने की बात तो दूर,

मैं उसका नाम तक नहीं जान पाया हूँ.

अपना घर और ऑफिस के अलावा,

सामाजिक होने का अर्थ मैं भूल सा गया हूँ.

मुझे भी अब तक समझ नहीं आया ,

की मैं भी ऐसा क्यूँ हो गया हूँ.

कहते हैं, " इन बड़े शहरो के ईट सीमेंट के दीवारों के पीछे ,

बहुत पढ़े लिखे और समझदार लोग रहते हैं."

मगर अब भी मैं ," मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,"

का अर्थ इस दिल्ली शहर में रोज़ ढूँढता हूँ.

Sunday, April 10, 2011

ये अन्ना हजारे कौन हैं ?



७२ वर्षीय एक जवान ने जब,

इंडिया गेट पर डेरा डाला.

लोगो ने एक दुसरे से पूछा ,

" ये ! अन्ना हजारे कौन हैं?"

जब तक उन्हें पता चलता ,

हुजूम उमड़ पड़ा था,

कोई जाने न जाने उस शख्स का,

मकसद बड़ा नेक था,

तीन दिनों के अन्दर ही,

उसका नाम सबकी जुबान पे चढ़ गया था,

महाराष्ट्र से आये एक फ़कीर ने ,

दिल्ली में सरकार को हिलाया.

किशन बापट बाबुराव हजारे नाम के इस शख्स ने,

६० साल बाद देश को " बापू " के छोटे अवतार से अवगत कराया.

लगे रहो "छोटे गाँधी "

देश तुम्हारे साथ हैं.

Saturday, March 26, 2011

बस यूँ ही ............

ना उम्मीदी के  इस दौर में ,

फिर भी गाहे बगाहे कुछ,

सूरज की किरणे बिखर ही जाती हैं,

जो शायद हमें फिर से कुछ करने की,

प्रेरणा दे जाती हैं.



कभी डूबते सूरज को देख कर एहसास होता हैं,

जैसे ये अपने में समेट कर कितने राज ,

कितनो पलो की सौगात लिए छुप जाता हैं,

शायद उनको अच्छे बुरे में छाटने के लिए ,

एकांत में चला जाता हैं.



अवसाद बुरा नहीं हैं जीवन में,

अगर हम में लड़ने की क्षमता हैं,

जिजीविषा जीवन की यही तो हैं,

की हर हालात में खुद को बुलंद रखना हैं.

Friday, March 18, 2011

हैप्पी होली !

चहुँ और पेड़ो पर फूल खिलने लगे,


धरती करने लगी हैं अपना श्रृंगार,

मौसम ने करवट बदली ,

बहने लगी मस्त बयार.



फागुन का रंग चड़ने लगा सब पर,

रंगों से खेलने को सब हो गए तैयार.

सब राग द्वेष मिटाकर एक दुसरे को गले मिलाने ,

आ गया होली का त्यौहार.



( होली आपके जीवन में खुसियों और आनंद के रंग भरे)

Tuesday, March 15, 2011

हाहाकार.............

चारो तरफ देख हाहाकार ,


कितना हो गया मनुष्य लाचार,

कल तो जो डींगे भरता था,

प्रकति ने एक ही झटके में,

चूर किया उसका अहंकार.



अब देख रहा वो अंजाम,

छेड़ा छेडी जो उसने की थी प्रकति के साथ,

अब उसका परिणाम देख कर,

रूह भी काँप गयी आज.



दूर से अब देख कर विनाश,

सबको आयी उस खुदा की याद.

संतुलन बिगाड़ा तो अब सजा भी तो भुगतने को,

तैयार रह आज के इंसान.



( यह कविता जापान में आये भूकंप के बाद की स्थिति को ध्यान में रखकर लिखी गयी हैं)

Saturday, March 12, 2011

ज़िन्दगी की उलझन ........



जब छोटे थे तो सोचते थे, कब स्कूल जायेंगे,

और हम बस्ता टांग कर शान दिखायेंगे.

स्कूल पहुचे तो लगा ये कहाँ आ गए ?

फिर सोचा कब कोलेज जायंगे और ?

स्कूल के ये रोज़ रोज़ के झंझटो से कब आज़ादी पाएंगे?

स्कूल खत्म हुआ कोलेज पहुचे थोड़ी दिनों में वहा से भी उकता गए.

नौकरी करते लोगो को देख अपने भी अरमान हरे हो गए.

नौकरी लगी, थोड़े दिन अच्छा लगे,

फिर डंडे पड़ने शुरू हुए.

कुछ साल नौकरी करने के बाद एहसास हुआ ,

उफ़ ! ये किस जंगल में फंस गए.

अब कभी सोचते हैं कब नौकरी से छुटकारा मिले,

Monday, March 7, 2011

नारी - महिमा अपरम्पार .........



बेटी बनकर तुने महकाया अपने माँ बाप का आँगन ,

बहन बन तुने भाई को दिया स्नेह का संसार.

पत्नी बन तुने पति के सपनो को दिया एक नया आकार,

माँ बन तुने अपने बच्चो को दिए कितने संस्कार.

हर रूप में तू निराली हैं, तेरा बिना ये संसार ख़ाली हैं.

तू जगत जननी तेरी महिमा अपरम्पार हैं.

Happy Women day- Salute to every woman.

वो बदलेंगे तो हम बदलेंगे.......

वो बदलेंगे तो हम बदलेंगे,


बदलने की ये बयार बदलने का नाम नहीं लेती,

न वो बदलने को तैयार,

हमारी झिझक हमें पीछे खिचती,

शायद इसी कशमकश में,

बदलाव की आंधी कभी नहीं चलती.

हम रोज़ यु ही जीते चलते हैं ,

बुरा होते देख कर भी अपना इससे क्या लेना यार !

आगे बड़ लेते हैं.

जब हम पर बीतती हैं कभी,

तो हम "ज़माना कितना संवेदनहीन हो गया हैं " सोचते हैं.

यक्ष प्रश्न यह है - की बदलाव की आंधी लायेगा कौन,

ताकते रहे यु ही मुहं एक दुसरे का हम,

जमाने बीत जायेंगे.

मन में एक टीस सी लिए मर जायेंगे.

Wednesday, March 2, 2011

खुद से मुकाबला

खुद से मुकाबला कर यहाँ,


तेरे जैसा कोई नहीं.

अपनी सीमायों को लाँघ जरा,

तेरे लिए मुश्किल कुछ भी नहीं.

अपने रिकॉर्ड ही तुझे खुद तोड़ने हैं,

तेरे मुकाबले का को नहीं.

डर को निकाल बाहर ज़माने का,

क्यूंकि तुझे सँभालने की कोई जरुरत नहीं.

लक्ष्य बना इतना ऊंचा की,

जिसे छूने की कुव्वत तुझ मैं हो और किसी में नहीं.

असफलता और निराशा तुझे छूकर निकल जाये,

तू अटल, अडिग, अविचल , अविरल बहता जाये ,

लक्ष्य पूरा होने पर भी तुझे कोई थकन नहीं.

Tuesday, January 11, 2011

नए साल के पहले उदगार ................

हालातो को देख कर दिमाग ने उकसाया ,

अब कविताये लिखने से मन उकता गया हैं.

अब नहीं लिखूंगा क्यूंकि किसी एक विषय पर मन टिकना बंद हो गया हैं.

मगर मेरा कवि मन कहाँ मेरी सुनने वाला हैं,

वो हर हालात पर कविताये करने को तैयार रहता हैं.

सोचता हूँ अब इस साल से यथार्थ कविताये लिखूंगा.

सब्जबाग जो अब तक दिखाता था,

सच के धरातल पर झाँकने की कोशिश करूँगा.

लोगो के मर्म को कुछ बाँटने का जतन करूँगा,

ज़िन्दगी को थोडा आइना दिखाऊंगा.

भटके हुए को थोडा रोशनी दिखाऊंगा,

रमे हुए लोगो को कुछ गुदगुदाने का प्रयास करूँगा.

जो जी रहे हैं सिर्फ अपने लिए,

उन्हें थोडा दुसरो के लिए जीना सिखाऊंगा.

जितना भी बन पड़ेगा,

इस भागमभाग की ज़िन्दगी में थोडा सा ही सही, लोगो को सुकून दिलाऊंगा.

Sunday, December 26, 2010

हर साल ........

कुछ खट्टी कुछ मीठी यादे जोड़ कर,

हर साल यु ही चुपके से गुजर जाता है.

जब तक हम समझने लगते उस साल को,

दिसंबर सामने आ जाता हैं.

फिर नए साल के उत्साह में,

पुराने साल को भुला कर,

नए साल के लिए नए ताने बाने बुनते हैं,

नए सपनो को पूरा करने के लिए,

नए साल का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं.

फिर समय का पहिया घूमता जाता हैं,

कब बीत गया एक और साल ,

दिसंबर में याद आता हैं.

( Happy New Year -2011 )