Thursday, March 22, 2012

मौन ..........


कौन कहता हैं मौन रह कर  समस्याओं से नहीं जूझा जा सकता, 
श्री मनमोहन जी से पूछ लो, 
इतने घोटाले और गठबंधन की सरकार को , 
इतने साल संभाल कर , 
और फिर भी चलते रहना, 
अब इस मौन में शक्ति नहीं है तो और क्या, 
विपक्ष भले ही हड़ताल करे , 
लोग भले ही धरना दे , 
महंगाई से भले ही जान चली जाये , 
कोई फर्क नहीं पड़ता , 
मौन रहकर ही इन सबसे निपटा जा सकता हैं, 
क्यूंकि बोलने वाला हमेशा बडबोला कहलाता हैं . 
चलो ! कुछ तो सीखा मनमोहन जी से , 
मौन में ताकत हैं हम भी आजमाते हैं, 
क्यूँ हम बात बात में भड़क कर , 
अपना ही तबियत खराब करते हैं. 

Wednesday, March 21, 2012

समय का चक्र ....


हर सुबह इठला के कहती हैं
लो, मैं फिर गयी तुम्हारे लिए
लेकर एक नयी दिन की सौगात
अब ये तुम पर हैं
कैसे करोगे आज का तुम इस्तेमाल
दोपहर कहती हैं अभी भी वक़्त हैं
सूरज अभी उफान पर हैं
दिन की जवानी हैं
उठा ले कदम करने अपने सपने साकार
शाम आते आते सबक दे जाती हैं
आज का दिन गया अब
कल का फिर करना इंतज़ार
रात अपनी कालिमा ओडे
हमें करा  जाता हैं याद हमारी औकात.  
यु ही हर रोज़ हमें ज़िन्दगी का एक सन्देश दे जाता हैं
हम बड़ते चलते हैं
दिन , महीने , साल और दशक
यू ही बनते चले जाते हैं
दिन अगर अच्छा बीता तो हम खुश हो जाते हैं, 
दिन अगर बुरा रहा तो चलो कट गया कह कर सो जाते हैं. 
समय का चक्र यूँ ही चलता रहता हैं, 
फिर एक दिन हम अपनी खाते की ज़िन्दगी काट के, 
अनजान सफ़र की तरफ निकल जाते हैं. 


Sunday, March 4, 2012

मिलकर जहाँ बनाना हैं ..



एक एक से अनेक बने , 
अनेक से बने एक कारवां, 
कारवां से बने एक समाज , 
समाज से बने एक देश, 
तो आओ की अब एक से अनेक बने, 
कारवां को गुंजायमान करे, 
समाज को फिर जीवन मूल्य दे ,
देश को फिर से शशक्त करे. 
फैला हैं जो अत्याचार , 
उसका विरोध करे , 
अपनी आने वाली पीढ़ी  को, 
आओ की एक उम्मीद  दे. 

Saturday, February 18, 2012

खुदी तेरी और तू खुद का,

खुदी तेरी और तू खुद का, 
फिर तुझे सहारा किसका, 
अपनी तकदीर का मालिक तू खुद, 
अपनी राहो का अकेला राही तू खुद, 
तो चल , अपनी राह पकड़ ,
मुड़कर देख ना दुबारा, 
तुझे कोई फर्क नहीं  पड़ता , 
तेरे पीछे कोई हैं या तू चला हैं बिलकुल अकेला. 
लक्ष्य तेरा सामने और हौंसला तेरा खुद का, 
पा गया तो संतोष तेरा और ना पाया तो गम किसका?
तुझे क्या फर्क पड़ना नाकामयाबियो का, 
खुद से ही तो मुकाबला तेरा, 
दुसरे तेरी कुव्वत को क्या जानेगे, 
उनका काम तो हैं दुसरो को भीड़ में लेकर चलना. 
तू खुदी हैं और खुद  तू  अपने साथ खड़ा, 
चला चल बेफिक्र अपनी राह में खुद को खुदी साबित करना बस काम तेरा. 

Sunday, February 12, 2012

पांच घूरते शब्द .........कौन , कब , कहाँ , क्यों और कैसे ?



कौन है या था ?
कब हुआ या कब होगा?
कहाँ हुआ या कहाँ होगा ?
क्यों हुआ ?
कैसे हुआ या कैसे होगा ?
इन पांच शब्दों से ज़िन्दगी  बड़ी परेशान हैं, 
हर वक़्त ये शब्द घूरते रहते हैं ज़िन्दगी को , 
वो हर वक़्त इन्ही सवालो का उत्तर ढूँढने में बेहाल हैं. 
सोचो अगर ये पांच शब्द गायब हो जाये , 
तो ज़िन्दगी कितनी आसान हो जाये. 

Monday, February 6, 2012

लोगो का काम हैं कहना ........

अजीब कशमकश हैं ज़िन्दगी की, 
हम जब कुछ करते हैं, 
लोग कहते हैं ये देखो उसने कर दिया, 
कुछ नहीं करते तो लोग कहते हैं, 
अरे........वो तो कुछ नहीं करता. 
उलझन ज़माने की ये बड़ी हैं, 
उसे अपने दुःख -सुख से ज्यादा फर्क , 
इस बात पर पड़ता हैं उसने ऐसा कर दिया. 
कोई उन्हें ये समझाओ , 
वो जो कुछ  नहीं करता ,
उससे उसका ही बिगड़ना हैं, 
और वो जो कुछ करता हैं, 
उससे उसका ही सुधरना हैं, 
फिर क्यूँ बेवजह दुसरो की बातो में उलझा जाये, 
अपने ही दुखो को कुछ कम कर लिए जाये, 
या फिर अपने सुखो को और थोडा जीया जाये.  

Wednesday, January 25, 2012

शब्दों का अकाल

कभी कुछ क्षण ऐसे भी आ जाते हैं, 
शब्दों के भण्डार में अकाल सा पड़ जाता हैं, 
कल देखा था एक सड़क पर, 
एक दो साल की बिटिया को, 
सड़क के किनारे , 
अपनी माँ को पत्तल से खाने खिलाते हुए, 
उसकी नन्ही सी उंगलियाँ , 
प्लास्टिक के चम्मच को थामे हुए थी, 
थोडा थोडा चावल वो अपनी माँ को खिला रही थी, 
उन नन्ही आँखों में संतोष की वो चमक थी , 
एक कोर जब वो अपनी माँ को दे रही थी. 
माँ की आँखों में बेबशी के आसूं थे, 
करती भी क्या वो दोनों हाथो से वो लाचार जो थी. 

Wednesday, December 28, 2011

नए साल की सभी को हार्दिक शुभकामनाये

फिर एक नए साल की स्वागत को पलके बिछाए खड़े हम, 
२०११ को अलविदा कहने को कितने उतावले हम, 
कितनी खट्टी मीठी यादे पीछे छोड़ , 
लो आने वाला हैं एक नया साल आपके सामने. 
सपनो को फिर पंख लगे गए, 
नए साल के लिए अरमान फिर हरे हो गए. 
जनवरी से शुरू होता हर साल , दिसंबर में आकर रुक जाता हैं. 
फिर कैलेंडर हमारा नया आ जाता हैं. 
हर गुजरता साल हमारे जीवन का एक कम हो जाता हैं, 
हम अपनी उम्र में एक साल और जोड़कर , 
फिर आगे बढ जाते हैं , 
हर साल हमारा यूँ ही गुजर जाता हैं. 
चलो ! २०११ का अध्याय ख़त्म कर आगे बड़ते हैं, 
२०१२ का तहेदिल से स्वागत करते हैं. 
लगायेंगे हिसाब किताब कभी इन बीते सालो का, 
जब कभी फुर्सत के कुछ पल हमारे पास होंगे, 
अभी तो भागमभाग की इस ज़िन्दगी में, 
बस कैलेंडर को बदल लेते हैं , 
आओ ! फिर से एक नए साल में प्रवेश करते हैं. 

नए साल की सभी को हार्दिक शुभकामनाये ! 

Sunday, December 18, 2011

इतेफाक से मिली ये ज़िन्दगी .........

इतेफाक से मिली ये ज़िन्दगी , 
कही इतेफाक ही बन कर न रह जाये, 
कुछ तो करे ऐसा , 
की हमारा भी नाम हो जाये. 
जीते तो हैं करोडो  दुनिया में, 
चंद नाम ही याद रह जाये. 
अपने लिये ही जीए तो क्या जीए, 
की दो पीदियो के बाद ही अपने हमें कोस जाए, 
लिख इबारत कुछ ऐसी की, 
जैसे पत्थर पर लकीर बन जाये. 
पैसा कमा, ऐश कर- सब कुछ ठीक   हैं, 
ज़माने के लिए क्या कर गया बस यही याद रह जाये. 

Sunday, December 11, 2011

१०० साल की दिल्ली .............


इस शहर में कुछ तो बात हैं, 
हर बेगाना भी इससे प्यार करता हैं, 
छोड़ के जब आया था इस शहर अपने गाँव को, 
वादा किया था जल्दी ही छोड़ दूंगा इस शहर को, 
मगर दिल्ली शहर की बात ही कुछ निराली निकली, 
इससे दस सालो में इतना प्यार हुआ की, 
बीस साल पुराने अपने गाँव शहर की यादे धुंधला गयी, 
कहते हैं आज दिल्ली को राजधानी बने १०० साल हो गए हैं, 
आज के ही दिन १९११ में जोर्जे पंचम की ताजपोशी हुई थी, 
दिल्ली दरबार लगा था दिल्ली में, इसकी शान और बड़ी थी, 
इतिहास को थोडा खंगाला तो दिल्ली को कुछ करीब से जाना, 
कितनी बार उजड़ कर फिर से दिल्ली खडी हुई थी, 
जो भी आया लूट खसोट कर ले गया, 
दिल्ली अपने गम चुपचाप सहती रही, 
हर बार फिर बसी फिर से न ख़त्म होने के लिए, 
यमुना के तीरे तीरे बसी मेरी दिल्ली , 
न जाने कितनी बार रोती बिलखती रही,  
मगर आज गर्व हैं मुझे इस दिल्ली पर, 
इसकी शानो शौकत पर, 
जता दिया दिल्ली ने दुनिया को, 
दिलवालों की हैं ये दिल्ली, आओ तो स्वागत करेंगे 
चले भी जाओगे यहाँ से अगर कभी, 
इसे कभी न भूल पाओगे. 
न जाने कितने सल्तनते देखी, कितने राजाओ की दुन्दुभी सुनी, 
दिल्ली  यु ही चुपचाप चलती रही. 
यमुना के तीरे तीरे अपने को रचते बसते , 
सबको कुछ न कुछ देते हुई, 
दिल्ली अब जाकर कुछ शांत हुई. 

Friday, November 18, 2011

विश्राम ...........

कुछ लिखने का मन क्यों नहीं करता, 
शब्दों को ढालने की कोशिश तो करता हूँ मगर, 
कुछ पंकित्यो के बाद कलम सरकती ही नहीं, 
शायद ये आजकल काम ज्यादा होने की थकावट हैं, 
या फिर मुझे ही कुछ नहीं सूझ रहा हैं, 
रचनात्मकता को जगाता तो हूँ हर रोज़, 
मगर किसी विषय पर टिकता क्यों नहीं हूँ. 
शायद मेरा कवि मन विश्राम कर रहा हैं. 
कुछ नए विषयो को टटोल रहा हैं. 
तब तक दुनियादारी के कुछ काम कर लेता हूँ. 
थोडा सा विश्राम लेकर फिर आपके साथ कुछ नया लाने की कोशिश करता हूँ.  

Monday, September 19, 2011

ये कैसी उलझन .......



बॉस कहता हैं ऑफिस तेरी पहली प्राथमिकता हैं,

क्यूंकि तेरी रोज़ी रोटी इसी से चल रही हैं.

आठ घंटे तो दिखाने के हैं, बाकी के घंटे काम करने से ही आगे दरवाजे खुलने हैं.

घर पर बीवी कहती हैं ,

घर तेरी पहली प्राथमिकता हैं , घर पर ज्यादा समय देना ज्यादा मह्त्वपूर्ण हैं.

दिमाग घनचक्कर की तरह घूम रहा हैं,

किस चीज़ को पहली प्राथमिकता दू,

उलझन बड़ी हैं, नौकरी और घर के बीच में ज़िन्दगी फंसी पड़ी हैं.

इस विषय पर लिखने को तो बहुत कुछ हैं मगर, यहाँ भी असमंजस हैं.


किसी एक पलड़े को भारी करने से अगले का अपने ऊपर ही गिरने भय हैं.

आप लोग खुद ही समझदार हैं ,

between the lines पढने में माहीर हैं.

खुद ही मर्म को समझ लीजियेगा,

अगर कोई रास्ता सूझे तो सबके साथ साझा जरुर करियेगा.

Sunday, September 18, 2011

डोर..

थामे डोर ज़िन्दगी की चले थे किस ओर ,


समय के थपेड़ो ने पंहुचा दिया किस ओर,

कुछ अपनी करनी और कुछ भाग्य के सहारे ,

देखो कहाँ से कहाँ पहुच गए हम लोग.

Saturday, September 17, 2011

मैं कौन हूँ .............

मैं जब पैदा होता हूँ, तो मेरे माँ-बाप मुझे अपने सपनो का सौदागर समझते हैं.


मैं थोडा बड़ा होता हूँ, तो स्कूल की फीस भरने के लिए माँ बाप को उदास देखता हूँ.

जैसे तैसे स्कूल से निकल कर कोलेज पहुचता हूँ, तो नए कपड़ो को तरसता हूँ.

माँ बाप की दो रोटी के जुगाड़ की कोशिशो को समझता हूँ.

उनके सपनो को पूरा करने के लिए मेहनत करता हूँ.

सरकारी नौकरी लग जाए तो परिवार को सहारा मिले,

सोच सोच कर हर फॉर्म भरता हूँ.

फिर थक हार कर प्राइवेट नौकरी की राह पकड़ता हूँ.

फिर हर साल नौकरी बदले तो कुछ पैसे मिले,

कही एक जगह टिक कर नहीं रहता हूँ.

बस के धक्के , बॉस की डांट और चलो कल अच्छा हो जायेगा,

की कशमकश में जवानी गुजारता हूँ.

थोडा जमने की कोशिश में शादी करता हूँ,

माँ बाप के सपनो को छोड़ अपनी दुनिया बसाने की कोशिश करता हूँ.

ऑफिस के टेंसन घर पर ले जाकर बीवी से झगड़ता हूँ.

बच्चो के आगमन से फिर नयी कल्पनाये बुनता हूँ.

उनके लिए रोटी , कपडा और मकान की जुगत बिठाने में लग जाता हूँ.

अपने आदर्श , अपनी कुंठाए गाहे बगाहे इज़हार कर लेता हूँ.

कभी लाइनों में लगे लोगो से , या कभी बस के धक्के मुक्को में ,

अपने गुस्से का इज़हार करता हूँ.

कभी किसी नेता की रैली में या कभी अन्ना हजारे के समर्थको ,

मैं ही शामिल होता हूँ.

जब अन्याय मेरे साथ होता हैं, मैं लोगो को उनके साथ न देने के लिए कोसता हूँ.

जब सड़क के किसी के साथ अन्याय होता हैं तो चुपचाप मैं ही खिसकता हूँ.

मैं कौन हूँ .............मैं आम आदमी हूँ.

Sunday, September 11, 2011

खुदी को साबित.........

इतेफाक से मिली ये ज़िन्दगी, खुदा की नियामत हैं

खुदी को साबित करने का एक अवसर हैं.


निशाँ इतने छोड़ जाने हैं इस धरा पर,

लोग कहे की हाँ ! आया था एक आदमी ज़मी पर.

ज़िन्दगी को जीना हैं इस तरह से,

जिंदगानी से कोई शिकवा न रह जाए,

लोगो का इतना काफिला हो रुखसती के समय की,

खुदा को भी तुझ पर गुमान हो जाए.

यूँ तो अरबो जीवन यहाँ हैं, लेकिन कुछ ऐसा कर गुजर,

की जब पलटे तू ही पन्ने अपने जीवन की किताब के,

फक्र से तेरा सीना चोडा हो जाये.