Friday, June 29, 2012

बस .. यूँ ही ख्याल आया


सफ़र बहुत तय करना हैं अभी, अभी तो कुछ ही मीलो के पत्थर नापे हैं. 
आगे कितने और मील चलना हैं,इसका कोई पता नहीं. 
छोड़ते चले अपने निशाँ , जहाँ से भी गुजरे अपना कारवां. 
सफ़र ज़िन्दगी का हैं, आज यहाँ हैं , कल कहाँ?
जहाँ भी आज हैं , जिन्दादिली होनी चाहिए . 
कल अगर उधर न भी हो हम, कमी खलनी  चाहिए. 
हमें तो बढते रहना हैं , ज़िन्दगी एक जगह रुक जाये तो कोई काम की नहीं. 

Thursday, June 7, 2012

पलायन .....


उच्चे उच्चे पहाड़, बीच से बहती नदी, 
ताज़ी हवा और वीराने में कूकती चिड्याएं 
दूर दूर तक मनोरम द्रश्य , 
न कोई कोलाहल , न कोई भागमभाग, 
न गाडियों का रेला और दूर दूर बिखरा गाँव. 
मगर न जाने क्यों इन सबको नजर लग गयी हैं, 
हर गाँव सूना सूना सा हैं, 
अपने बच्चो के लौटने का कब से इन्तेजार कर रहा हैं, 
उस गाँव के लाल पैसे कमाने शहर गए हैं, 
अपने पीछे बुड़े माँ बाप छोड़ गए हैं, 
बीवी हर रोज़ आस में जीती हैं, 
बच्चे पापा के इन्तेजार में हर रूकती गाड़ी से आस लगाये रहते हैं. 
और गाँव का बेटा शहर की गर्मी में झुलस रहा होता हैं, 
एक एक पैसे की खातिर हर रोज़ मर रहा होता हैं, 
जब कभी फुर्सत मिलती हैं उसे शहर की दौड़ भाग से , 
अपनी गाँव की याद में जल रहा होता हैं. 
कब ये पहाड़ अपने श्राप से मुक्त होंगे , 
इसके अपने बच्चे कब इसके अपने होंगे , 
इसके रास्ते अपने बच्चो के पदचाप के लिए तरस गए हैं, 
कब वो बुड़े माँ बाप शहर से आने वाली हर गाड़ी को ताकना बंद करेंगे , 
कब  उस पत्नी का वियोग ख़त्म होगा, 
कब बच्चे अपने पिता को हर रोज़ देखेंगे, 
कब अपने बच्चो के पैरो की धमक से ये पहाड़ फिर  गूंजेंगे ,
कब इसके बच्चे इसे छोड़ कर कभी नहीं जायेंगे. 

Monday, May 28, 2012

क्या बदला ? तब और अब में ...........


बचपन में जब चाँद को छूने की बात करते थे
तारो से आगे जाने की सोचते थे
पर्वत शिखरों को खेल खेल में नापने की शर्त लगाते थे
दुनिया में सब चीजों को पाने के  कितने आसान से तरीके सुझाते थे
ख्वाबो में जीते थे और हर चीज़ को दिल से अपना समझते थे
दोस्तों पर हमेशा जान छिडकने को तैयार रहते थे
माँ बाप की डांट को सुनकर उन्हें हम हिटलर समझते थे,  
और अब.......
 हम जरा उस दहलीज को लाँघ कर आगे बढ गए हैं
जो चाँद तब हमें मुट्ठी में लगता था
अब हम उसकी बात भी नहीं करते हैं
तारे तोडना जैसे बात सोच सोच कर उसे हम अपना बचपना समझ कर भूल जाते हैं
पर्वत शिखरों पर चड़ने की बात तो दूर, तीसरी मंजिल पर जाने के लिए लिफ्ट दूंदते  हैं
ख्वाबो में जीने की आदत कब की धूमिल हो गयी हैं
दोस्तों को  मिले देखे वर्षो बीत गए हैं, नए दोस्तों के लिए नफा नुकसान का ख्याल पहले रखते हैं
माँ बाप की झिडकियो का मतलब अब समझ में आता हैं
बदला क्या हैं?
हम बड़े हो गए हैं
सिर के कुछ बाल सफ़ेद हो गए हैं
जिंदगी के कुछ अनुभव हमें हो गए हैं
हर चीज़ को अपने फायदे के तराजू में तोलने लग गए हैं

Thursday, May 24, 2012

क्या अच्छा , क्या बुरा ?

संसार में अच्छा खोजने के लिए निकलोगे , 
तो हर जगह अच्छाई नजर आएगी. 
बुरा खोजने निकलो तो हर जगह, 
कमियों का अम्बार मिलेगा . 
क्यूंकि जो आपके लिए अच्छा हैं, 
वो सकता हैं अगले के लिए बुरा हो , 
और जो आपके लिए बुरा हैं , 
वो दुसरे के लिए अच्छा हो. 
इसलिए उचित यही हैं, 
सब अच्छा हैं मान के चलो, 
ज्ञान को बढ़ाते चलो, 
फिर अपने विवेक से अच्छे - बुरे की तुलना करो. 
बुरे से बचो और दुसरे को बचाओ , 
अच्छाई के प्रकाश से बुरे के अंधकार को ढकने का प्रयास  करो. 

Sunday, May 13, 2012

मशाल

ताकते रहेंगे एक दुसरे को हम , 
की वो पहल करेगा तो हम भी साथ हो लेंगे, 
कब तक मशाल जलने का हम इन्तेजार करते रहेंगे, 
जलाएंगे एक एक माचिस की तीली भी खुद से हम , 
रोशनी तो खुदबखुद हो जाएगी. 

Wednesday, April 25, 2012

हम कौन हैं ?.....................


हम कौन हैं ?.....................
एक अनजान सफ़र जिसे हम ज़िन्दगी कहते हैं , 
पर चलने वाले मुसाफिर ...........
कहाँ मंजिल और कहाँ पड़ाव , 
सब बातो से अनजान , 
समय की लहरें कुछ हमारे हिसाब से चलती , 
और कुछ हमें चलाती हुई, 
बढ रहा हैं हमारा ये सफ़र. 
हम अपनी गठरी में बांधे , 
कुछ अच्छे और कुछ खट्टे पल, 
बड़ते चलते कभी सीधे , कभी लड़खड़ाते, 
कभी हंसते , कभी रोते 
कभी फक्र करते , कभी कोसते ...
सोचिये ...... ये अनजान सफ़र बड़ा हसीन हैं, 
धीरे धीरे पार होता चला जाता हैं , 
लाख रोके इसे कहीं पर,   
मगर ये ठहरता नहीं हैं बस आगे बढता चला जाता हैं ............................
क्यूंकि पड़ाव तो सिर्फ अल्प विराम हैं इसके लिए, 
विराम चिन्ह से पहले तो बहुत लम्बा सफ़र तय करना हैं. 

Monday, April 16, 2012

क्या शिकायत करू खुदा से ......उसने तो सब कुछ दिया

क्या शिकायत करू खुदा से ......उसने तो सब कुछ दिया ,
इंसान बना कर उसने सबसे पहले मुझ पर एहसान किया, 
दो हाथ , दो कान , दो पैर , दो आँखे  सब कुछ तो सलामत दिया, 
फिर ऊपर से एक सोचने वाला दिमाग देकर मुझे संपूर्ण तो बनाया, 
इन चीजों की एहमियत क्या हैं ज़िन्दगी में , 
जरा इनमे से किसी को हटा के सोचो अपनी ज़िन्दगी में , 
फिर अब मैं खुदा से और क्या मांगू, 
करने के लिए उसने मुझे इतना बड़ा जहाँ तो दिया , 
अब कुछ नहीं कर पाता हूँ तो उसमे उसका क्या कसूर , 
अपना ही शायद रास्तो से भटका होऊंगा, 
उसके ऊपर , फिर भी गाहे बगाहे कभी परेशान होता हूँ, 
तो वो परेशानियों से निकाल  ही  देता हैं , 
हर रोज़ वो मुझे एक नया दिन देता हैं, 
कुछ करने के लिए, अब मैं उसे व्यर्थ गवां देता हूँ तो उसमे उसका क्या, 
उसकी बनायीं दुनिया को कुछ सुधार सकूं , मुझे इसके लिए फुर्सत कहाँ, 
बदले में मैं क्या करता हूँ, 
कभी कभार नाम जप लेता हूँ, जरा ज्यादा हुआ तो मंदिर हो आता हूँ. 
अब और क्या मांगू खुदा से .... उसने तो सब कुछ दिया....

Monday, April 2, 2012

मेरी कविताये .........

कभी सोचता हूँ कविताये लिखना बंद कर देता हूँ, 
कौन पढता  हैं अब यहाँ, न छंद हैं उनमे , न ढंग की कोई तुकबंदी ,
किसके पास समय हैं अब हमारी इन कविताओ को पढने  का,  
फुर्सत के चंद लम्हे मिलते ही कहाँ हैं, 
इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में , 
ऊपर से इन कविताओ का मर्म समझने को, 
दिमाग में बेफिजूल बोझ देने का, 
लेकिन फिर मन नहीं मानता , 
कभी कभार फिर बैठ ही जाता हूँ, 
कागजो को कुछ काला नीला करने को, 
कुछ बन पड़ा तो अपलोड कर देता हूँ, 
नहीं तो कागज को  हवाई जहाज बना कर, 
बिटिया के साथ घर की बालकोनी से उड़ा देता हूँ. 
फिर भी उम्मीद बंधी हैं, 
क्या पता कब कोई इन्टरनेट खोल के पढ़ेगा मेरी कविताये, 
वैसे पता हैं इन्टरनेट में उसके पास मेरी कविताओ को पड़ने से ज्यादा और जरूरी काम हैं, 
मेरे कविताओ के पन्ने जिन्हें मैंने जहाज बना के उड़ा दिए हैं, 
उठा के पढने की जहमत ही शायद को उठाएगा, 
किताब बना कर छपवा भी दू तो क्या होगा, 
लोग चेतन भगत को पढने ज्यादा पसंद करेंगे, 
मेरी कविताओ से क्या फायदा होने वाला. 
मगर मैं अपने भावनाओ  को यूँ ही गाहे बगाहे ,
शब्दों का आकार देता रहूँगा .........
क्यूंकि ये मन मुझे बैचैन करता रहता हैं, 
 कुछ लिखूं नहीं तो सोने नहीं देता हैं, 
पढ़ते रहिये , अच्छा लगे तो कभी कभी कोमेंट देते रहिएगा , 
वर्ना मैं तो लगा ही रहूँगा, 
आदत हैं मेरी लिखना, अब छूटने का कोई प्रश्न नहीं उठता ..............

Friday, March 30, 2012

कारवां जारी हैं.................


एक दिन खाली हाथ रोते हुए हम धरती पर आये थे, 
न कुछ होश था , न कुछ सोचने समझने की ताकत. 
समय का कारवां चलता रहा ........
हम बचपन से जवानी की दहलीज तक पहुच गए, 
अपने साथ कितने को मिला लिया, 
और फिर हमारा कारवां बनता चला गया , 
हम मंजिल दर मंजिल बड़ते चले गए, 
कुछ नए साथी मिलते रहे और कुछ पुरानो का रास्ता अलग हो गया , 
हमें चलना ही हैं , जडवत नहीं हो सकते. 
ज़िन्दगी के इस सफ़र में हम बड़ते ही रहेंगे . 
कुछ हमने सीखा , कुछ को हमने सिखाया , 
और कारवां यूँ ही गुजरता रहा....
मगर अब भी सफ़र जारी हैं, 
बहुत मंजिले अभी और छूनी हैं, 
क्यूंकि जब तक हैं ये सफ़र यूँ  ही चलता रहेगा, 
कुछ खट्टे कुछ मीट्ठे अनुभवों के गलियारों से गुजरता रहेगा, 
आज हमने इस कारवां की मशाल थामी हैं, 
कल और कोई आएगा , 
क्यूंकि ये कारवां रुक नहीं सकता ,
ये कारवां जारी हैं और यूँ ही जारी रहेगा....................

Thursday, March 22, 2012

मौन ..........


कौन कहता हैं मौन रह कर  समस्याओं से नहीं जूझा जा सकता, 
श्री मनमोहन जी से पूछ लो, 
इतने घोटाले और गठबंधन की सरकार को , 
इतने साल संभाल कर , 
और फिर भी चलते रहना, 
अब इस मौन में शक्ति नहीं है तो और क्या, 
विपक्ष भले ही हड़ताल करे , 
लोग भले ही धरना दे , 
महंगाई से भले ही जान चली जाये , 
कोई फर्क नहीं पड़ता , 
मौन रहकर ही इन सबसे निपटा जा सकता हैं, 
क्यूंकि बोलने वाला हमेशा बडबोला कहलाता हैं . 
चलो ! कुछ तो सीखा मनमोहन जी से , 
मौन में ताकत हैं हम भी आजमाते हैं, 
क्यूँ हम बात बात में भड़क कर , 
अपना ही तबियत खराब करते हैं. 

Wednesday, March 21, 2012

समय का चक्र ....


हर सुबह इठला के कहती हैं
लो, मैं फिर गयी तुम्हारे लिए
लेकर एक नयी दिन की सौगात
अब ये तुम पर हैं
कैसे करोगे आज का तुम इस्तेमाल
दोपहर कहती हैं अभी भी वक़्त हैं
सूरज अभी उफान पर हैं
दिन की जवानी हैं
उठा ले कदम करने अपने सपने साकार
शाम आते आते सबक दे जाती हैं
आज का दिन गया अब
कल का फिर करना इंतज़ार
रात अपनी कालिमा ओडे
हमें करा  जाता हैं याद हमारी औकात.  
यु ही हर रोज़ हमें ज़िन्दगी का एक सन्देश दे जाता हैं
हम बड़ते चलते हैं
दिन , महीने , साल और दशक
यू ही बनते चले जाते हैं
दिन अगर अच्छा बीता तो हम खुश हो जाते हैं, 
दिन अगर बुरा रहा तो चलो कट गया कह कर सो जाते हैं. 
समय का चक्र यूँ ही चलता रहता हैं, 
फिर एक दिन हम अपनी खाते की ज़िन्दगी काट के, 
अनजान सफ़र की तरफ निकल जाते हैं. 


Sunday, March 4, 2012

मिलकर जहाँ बनाना हैं ..



एक एक से अनेक बने , 
अनेक से बने एक कारवां, 
कारवां से बने एक समाज , 
समाज से बने एक देश, 
तो आओ की अब एक से अनेक बने, 
कारवां को गुंजायमान करे, 
समाज को फिर जीवन मूल्य दे ,
देश को फिर से शशक्त करे. 
फैला हैं जो अत्याचार , 
उसका विरोध करे , 
अपनी आने वाली पीढ़ी  को, 
आओ की एक उम्मीद  दे. 

Saturday, February 18, 2012

खुदी तेरी और तू खुद का,

खुदी तेरी और तू खुद का, 
फिर तुझे सहारा किसका, 
अपनी तकदीर का मालिक तू खुद, 
अपनी राहो का अकेला राही तू खुद, 
तो चल , अपनी राह पकड़ ,
मुड़कर देख ना दुबारा, 
तुझे कोई फर्क नहीं  पड़ता , 
तेरे पीछे कोई हैं या तू चला हैं बिलकुल अकेला. 
लक्ष्य तेरा सामने और हौंसला तेरा खुद का, 
पा गया तो संतोष तेरा और ना पाया तो गम किसका?
तुझे क्या फर्क पड़ना नाकामयाबियो का, 
खुद से ही तो मुकाबला तेरा, 
दुसरे तेरी कुव्वत को क्या जानेगे, 
उनका काम तो हैं दुसरो को भीड़ में लेकर चलना. 
तू खुदी हैं और खुद  तू  अपने साथ खड़ा, 
चला चल बेफिक्र अपनी राह में खुद को खुदी साबित करना बस काम तेरा. 

Sunday, February 12, 2012

पांच घूरते शब्द .........कौन , कब , कहाँ , क्यों और कैसे ?



कौन है या था ?
कब हुआ या कब होगा?
कहाँ हुआ या कहाँ होगा ?
क्यों हुआ ?
कैसे हुआ या कैसे होगा ?
इन पांच शब्दों से ज़िन्दगी  बड़ी परेशान हैं, 
हर वक़्त ये शब्द घूरते रहते हैं ज़िन्दगी को , 
वो हर वक़्त इन्ही सवालो का उत्तर ढूँढने में बेहाल हैं. 
सोचो अगर ये पांच शब्द गायब हो जाये , 
तो ज़िन्दगी कितनी आसान हो जाये. 

Monday, February 6, 2012

लोगो का काम हैं कहना ........

अजीब कशमकश हैं ज़िन्दगी की, 
हम जब कुछ करते हैं, 
लोग कहते हैं ये देखो उसने कर दिया, 
कुछ नहीं करते तो लोग कहते हैं, 
अरे........वो तो कुछ नहीं करता. 
उलझन ज़माने की ये बड़ी हैं, 
उसे अपने दुःख -सुख से ज्यादा फर्क , 
इस बात पर पड़ता हैं उसने ऐसा कर दिया. 
कोई उन्हें ये समझाओ , 
वो जो कुछ  नहीं करता ,
उससे उसका ही बिगड़ना हैं, 
और वो जो कुछ करता हैं, 
उससे उसका ही सुधरना हैं, 
फिर क्यूँ बेवजह दुसरो की बातो में उलझा जाये, 
अपने ही दुखो को कुछ कम कर लिए जाये, 
या फिर अपने सुखो को और थोडा जीया जाये.