Tuesday, July 7, 2015

हुबली , कर्नाटक से दिल्ली तक ( काव्य यात्रा वृतांत ) ..........

"हुबली,कर्नाटक से ट्रेन पकड़ी निकला दिल्ली ओर,  38 घंटे के सफर में साथ था कोई और !
साफ़ सुथरे हुबली स्टेशन पर समय  पर  लग गयी ट्रेन,बैठ गए  जी चल दी  अपनी ट्रेन !!

लोंडा जंक्शन पर जा जाकर रुक गए ट्रेन के चक्के, पता चला यहाँ से बदले  जायेंगे डब्बे !
गोवा  एक्सप्रेस आयी वास्को से , डब्बे लगा दिए गए  उसके पीछे !!

बेलगाम एक जगह आयी, अब ट्रेन में जमकर सवारी आयी !
"मील्स ओन व्हील्सके एक भाई साहब की "खाना ले लो" की आवाज आयी !!

खा पीकर हम सो गए , कुछ शोर हुआ तो  आँख खुली !
नीचे वाले भाई  साहब बैग कंधे में डाले उतर रहे थे , पूछा तो बोले हम पुणे गए !!

ये ट्रेन भी गजब चीज हैं , कोई भेदभाव नहीं करती !
हिन्दू, मुस्लिम , सिख , ईसाई - सबको अपने चक्को से खींचती !!

कोई छात्र, कोई सरकारी बाबू, कोई  फौजी , कोई प्राइवेट नौकर, कोई व्यापारी  !
बिना भेदभाव के बस सीटी बजाकर सरपट दौड़ती जाती !!

पहुंची ट्रेन फिर एक स्टेशन - नाम था मनमाड , वहाँ मिल रहे थे १०० रुपये में  तीन किलो अनार !
दिल्ली पहुँचते पहुँचते कैसे हो जाते हैं यही १५० रुपये में एक किलो अनार !!

मध्य प्रदेश पहुँच गए आप , मोबाइल में एक सन्देश आया !
ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी , नाम देखकर मैं भी चौंका !!

खांडवा था स्टेशन  का नाम , किशोर कुमार साहब के कुछ गाने याद गए !
मानसून की बारिश से मिटटी की भीनी भीनी खुशबू रही थी, खेत फिर तैयार हो रहे थे , जुताई चल चल रही थी !!

मिटटी की रंगत जगह जगह बदल रही  थी, कर्नाटक की लाल मिटटी - महाराष्ट्र में काली और  मध्य प्रदेश  में धूसर हो रही थी !
पठारों की उच्चाई अब कम हो थी, हुबली से चली ठंडी हवाएँ अब गर्म हो चुकी थी !!

सूरज अब धीरे धीरे डूब रहा था , सामने इटारसी  स्टेशन रहा था !
इटारसी में ट्रैको का जाल बिछा था , मध्य  रेलवे का सारा भार शायद  इसी पर था !!

फिर ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी , अगला स्टेशन भोपाल था !
अब रात  हो चुकी थी , हल्की हल्की ठंडी हवाओ का झोंका आया था !!

मानसून की बरसात का भोपाल में एहसास हुआ, झमाझम बारिश से नवाबो का शहर गुलजार हुआ !
रात के दस बज चुके थे , बर्थ की बत्तियाँ किसी ने बुझा दी और हमारा  भी नींद की आगोश में समाना हो गया !!

सुबह आँख खुली तो फरीदाबाद का स्टेशन दिखा  , झाँसी - ग्वालियर - आगरा - मथुरा सब रात रात में ही गुजर गया था !
३८ घंटे का सफर निजामुद्दीन स्टेशन पर ख़त्म हो चूका था , ट्रेन :१० पर स्टेशन लग गयी थी जबकि उसे :१५ पर पहुँचना था !!

मन ही मन रेलवे का समय पर पहुँचाने का धन्यवाद किया , बैग पकड़ा और अपने घर की ओर चल दिया !
फिर किसी दिन  एक यात्रा होगी , मेरा कवि मन फिर ललचायेगा और अपना यात्रा वृतांत फिर आपको सुनायेगा !!"


( हुबली से दिल्ली तक यह यात्रा मैंने 5 जुलाई से शुरू की और 7 जुलाई को मैं दिल्ली पहुँचा  और चूंकि साथ में कोई नहीं था , अपनी यात्रा को आप तक पहुचाने के लिए कलम का सहारा लिया )

Saturday, July 4, 2015

बेजुबान.......


"कभी किसी तस्वीर को देखकर शब्द भी कुछ बयां नहीं कर पाते ! 
तस्वीर ही सब कुछ बयां कर देती हैं !!

शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं , तस्वीर को समझाने में !
हम इंसानो के पढ़े लिखे संसार में बेजुबान बहुत कुछ कह जाते हैं !!"

Monday, June 29, 2015

कुछ पल ..............

ज़िन्दगी की पाठशाला का मैं एक मामूली सा छात्र हूँ ! रोज़ नए सबक सीखता हूँ !!
कभी भीड़ का हिस्सा बनकर सीखता हूँ ! और कभी कुदरत को निहारते हुए एकांत में सोचता हूँ !!

कुछ दिन ज़िन्दगी को यूँ ही बहने दिया ! न कोई प्लान बनाया , न कोई शिकायत की !!
ज़िन्दगी ने भी अपने होने का बहुत एहसास कराया , कभी फूल पत्तो में खिली तो कभी तितलियों में मुस्कराई !!

कभी बारिश की बूंदो ने भिगोया ! कभी सूरज की तपिश का अंदाजा किया !!
कभी थोड़ा फिर से बचपन जिया ! और कभी कुछ बुजुर्गो के साथ हो लिया !!

कभी प्रकृति को बड़ी देर तक निहारा ! कभी डूबते सूरज को अलविदा किया !
उगते सूरज की किरणों का स्वाद लिया ! तो कभी बहते पानी में थोड़ा गोता लगाया !!

लगा जैसे ये सब कुछ कही खो सा गया था ! काम की व्यस्तता से कुछ छूट सा गया था !!
दिल - दिमाग -शरीर में जैसे नयी स्फूर्ति सी आ गयी ! जीवन को फिर से दूने उत्साह से जीने की हिम्मत आ गयी !!

कभी यूँ ही फुर्सत निकालिये अपनी व्यस्त ज़िन्दगी से ! ज़िन्दगी को थोड़ा करीब से देखिये !!
ज़िन्दगी फिर से खूबसूरत दिखने लगेगी ! और खुद के लिए कुछ और मायने देखिये !! 

Thursday, June 25, 2015

राजनेता और राजनीति

"बड़ा फक्र होता हैं मुझे कभी की , भावनाओ को शब्दों के माध्यम से व्यक्त कर लेता हूँ !
किसी भी विषय  पर थोड़ा बहुत लिख सकता हूँ !!

मगर एक विषय पर कुछ लिखने  से पहले उलझ जाता हूँ, "राजनीति " और "राजनेता" शब्द से आगे नहीं बढ़ पाता हूँ !
अदभुत विषय हैं और बढ़ा कठिन हैं इस पर लिखना , शब्द भी उलझ जाते हैं !!

जो शब्द किसी और विषय की शोभा बढ़ाते हैं , इस विषय पर कुछ और हो जाते हैं !
शब्दों का मकड़जाल कुछ ऐसा बनता हैं , कहना कुछ और होता हैं मगर शब्द कुछ और ही बयां कर जाते हैं !!

नेता जी की झक सफ़ेद कुर्ते पायजामे के अंदर ना जाने कितने पैबंद हैं !
हाथ जोड़े हथेली के अंदर जाने कितना बड़ा खंजर हैं !!

इस विषय  को शब्दों से  बयां करना , जैसे  सूरज को आइना दिखाना हैं !
नेता जी को समझना जैसे हिंदी भाषी को जर्मन समझना हैं !!

उसूल , नियम , नैतिकता , मानवता , सुशासन , प्रगति, रिश्ते-नाते  - ये सब इस विषय में जनता को लुभाने के शब्द हैं !
अराजकताप्रलोभन , भ्रस्टाचार , भड़काऊ भाषण  - ये  सब इस विषय के चहेते शब्द हैं !!

कुर्सी के  लिए यह दौड़ अदभुत हैं , जिसको मिल गयी वो छोड़ने को तैयार नहीं हैं !
जिसको नहीं मिली हैं , वो दूसरे की कुर्सी पर घुन बनकर कुतरने की तैयारी में हैं !!

दोस्ती और दुश्मनी की इनकी कहानी बड़ी बेमिसाल हैं , जनता के  सामने लडना और रात को गलबहियां जारी हैं !

कोई  समझ सका इन राजनेताओ को  और राजनीती को , कब -कहा - कैसे - क्यों -क्या हो जाये कहना  भारी हैं !!"

Tuesday, June 23, 2015

फुर्सत के कुछ पल …

कुछ  दिन  एकांत में  बिताने का  मौका  मिला , अपने शहर से बहुत दूर !
कुछ क्षण अपने को फिर से समझने का मौका मिला , आदी हो चुके अपने माहौल से बहुत दूर !!

अपने को प्रकृति के  बहुत करीब पाया , ठंडी   हवाओ को अपने गाल  सहलाते फिर से महसूस किया !
बदन में हुई थिरकन को बरसो  बाद फिर महसूस कियाचिड़ियों की चहचाहट का संगीत सुना !!

बनावटी कोलाहल से  दूर - प्रकृति के  संगीत का आनंद लिया , मन जैसे फिर से रम गया !
कंक्रीट के  महलो  के सभ्य इंसानो से इस छोटी  सी जगह के  इंसानो को  जीवन जीते जीते देखा !!

सच में कितनी मशीनी और  व्यवसायिक  हो गयी हैं ज़िन्दगी हमारी , थोड़ा सुकून जब मिला तब सोचा !
कहता तो हूँ सब अपने लिए ही तो कर रहा हूँ , वोअपने लिए वाला समयकब मिलेगा कभी नहीं सोचा !!

टटोला दिल को अपने कुछ फुर्सत के क्षणों में , बहुत कुछ बीत जाने और खो जाने का एहसास हुआ !
फिर भी ढाँढ़स इस बात का बँधा  की ,  वक्त ने फिर मुझे समझने का मौका दिया !!

उसी पुराने "आनन्द " से फिर अपना परिचय हुआ ! खो गया था भीड़ में कही , अपने को भूल गया था !!
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मैं कितना उलझ गया था ! यकीनन वो भी बहुत जरुरी था !!

मगर अपने वजूद को भूल जाना कहा तक सही था , जारी हैं मेरा ये कारवां !
जीवन को समझने का दौर कभी तो विराम लेगा !!