Monday, November 2, 2015

इस शहर को ये क्या हो गया है ?


इस शहर को ये क्या हो गया है ? !
यूँ तो लाखो की तादाद हैं , मगर इंसान क्यों खो गया हैं ? !!
कंक्रीट के घर , कंक्रीट की सड़के , कंक्रीट के ही रास्ते !
मिट्टी की सुगंध का नामोनिशां मिट गया हैं !!
दिखावटी और मिलावटी सब कुछ लगता हैं यहाँ !
एक सच्ची मुस्कान को तरस गया हैं !!

इस शहर को ये क्या हो गया है ? !
हर कोई भाग रहा  हैं , पता नहीं कौन सी दौड़ में हिस्सा ले रहा हैं !
फुर्सत के पलो को तो जैसे ये शहर तरस गया हैं !!
किसी को किसी के लिए वक्त नहीं हैं यहाँ !
मासूम बचपन भी चारदीवारी में दम तोड़ रहा हैं !!
तौली जा रही हैं खुशियाँ यहाँ पैसे में !
जीवन का मतलब ही इंसान भूल गया हैं !!


इस शहर को ये क्या हो  गया है ? !
इंसान का इंसान से भरोसा उठता जा रहा !
हरेक इंसान दूसरे को शक की निगाह से देख रहा हैं !!
बिक रही हैं बाजारों में हर चीज़ !
इंसानियत का  कोई मोल नहीं रहा !!
हवाओ में घुल गया हैं एक अजीब सा जहर  !
घुट घुट कर इंसान जी रहा   !!
रिश्ते अब बस नाम के रह गए !
माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ने का चलन बढ़ गया यहाँ !!

Thursday, October 29, 2015

मैं गाय हूँ ..........................



मैं गाय हूँ ,
सागर तट पर डूबते सूरज को विदा करते हुए सोच रही हूँ !
क्यों मेरे नाम का इतना शोरशराबा हैं ? !!

मैं तो गाय हूँ ,  
और दुसरो के काम आने  के लिए ही  जन्मी हूँ , फिर क्यों मेरे नाम से आज झगड़ा हैं ? !
मेरे दूध से पले बढे  बच्चों को झगड़ते देख आज मैं सचमुच बड़ी दुखी हूँ !!

मैं गाय हूँ , 
मेरे लिए कोई भेद नहीं हैं , मेरे मन में किसी के लिए कोई क्लेश नहीं हैं !
मुझे " गौ माता " कहने वाले लोगों में आज इतना द्वेष क्यों हैं ? !!

मैं गाय हूँ , 
आप भी सूरज हो , क्या किसी खास  के लिए ही चमकते हो ?  !
अगर आप के लिए भी झगड़ा हो जाये और आपने चमकना छोड़ दिया तो क्या होगा ? !!

मैं गाय हूँ , 
मैं  कामधेनु हूँ -प्यार से रखोगे तो सब कुछ न्यौछावर कर दूँगी !
आँख उठाने वालो का कार्त्तवीर्य  अर्जुन के जैसे हाल कर दूँगी !!

Saturday, October 10, 2015

मैं खुश रहता हूँ .......

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं बीते कल का रोना नहीं रोता , और आने वाले कल की फिक्र करता हूँ। 
मैं तो बस आज में जीता हूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं किसी से कोई उम्मीद नहीं पालता !
बस खुद से उम्मीद रखता हूँ !!


मैं खुश रहता हूँ  .......
मुझे बहुत कुछ नहीं चाहिए !
मैं थोड़े से में भी संतोष कर लेता  हूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं किस्मत में यकीन नहींरखता हूँ  !
अपनी तकदीर खुद बनाने में यकीन रखता हूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं औरो को ताने नहीं देता !
खुद अपने गिरेबान में पहले झांक लेता हूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं मानता हूँ -ये उधार की ज़िन्दगी हैं !
और किराये के मकान में कटनी हैं- फिर दुःखी क्यों रहूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मुझे किसी से कोई ईर्ष्या नहीं हैं , न मैं किसी से कोई दुश्मनी रखता हूँ !
दोस्त बनाता हूँ और उनकी उन्नति की कामना करता हूँ !!

मैं खुश रहता हूँ  .......
मैं बस आज और अभी में जीता हूँ !
वक्त चाहे अच्छा हो या बुरा -बीत जायेगा में यकीन रखता हूँ !!

Friday, September 11, 2015

बादलो का गाँव………………….


“बादलो का कैसा गाँव हैं ? नीचे धरती और ऊपर नीला आसमान हैं !
       स्वप्नसरीखा श्वेत उज्जवल फैला हुआ चारो ओर हैं !!

धरती की प्यास बुझाने देखो इनमे होड़ हैं !
       उमड़ घुमड़ करते ये बादल अपना सर्वस्य न्योछावर करने को तैयार हैं !!

कैसा नयनाभिराम दृश्य ये , गगन पर छाया हैं !
      अपने में नीर समेटे , कुदरत की क्या अजब माया हैं !!

कोई नन्हा बादल उड़ कर कही से आता हैं !
      अपने को समाकर इस गाँव में कहीं खो जाता हैं !!

कोई झक सफ़ेद , कोई दैत्याकार है !
      कोई रूई की फांक सा , कोई अजब सी आकृति  लिए हैं !!

थोड़ा अठखेलियाँ , थोड़ी हुंकार भर - अब ये नन्ही बूँदे बन कर बरस जायेंगे !
मिलकर माटी के साथ सोंधी सोंधी खुशबू बिखेरेंगे !!

कितने पौधों , कितने जीवो की प्यास बुझाने को ये आतुर हैं !
स्वप्नसरीखा गांव थोड़े ही देर में मिट्टी में मिलने को तैयार हैं !!”

(३०००० फ़ीट की उच्चाई से बादलो के फैले हुए झुंड को देखने का सुखद एहसास 6 सितम्बर 15 को अपने बैंगलोर से दिल्ली की हवाई यात्रा में लिया और मेरा कवि मन शरारत कर ही उठा और कुछ शब्दों को पिरो ही दिया. )



Monday, August 17, 2015

वक्त और मैं .................

वक्त और मेरा झगड़ा चलता रहता हैं , मगर हर बार वो बाजी मार जाता हैं !
कितनी बार समझाया उसे , मगर वो फिर आगे निकल जाता हैं !!

अब मैंने भी समझौता सा कर लिया हैं , कदम ताल करनी ही पड़ेगी !
कुछ करना हैं ज़िन्दगी में तो वक्त के साथ दोस्ती करनी ही पड़ेगी !!

मगर बड़ा ज़िद्दी हैं ये वक्त , हर वक्त उकसाता रहता हैं !
थोड़ा भर भी सुस्ता  लूँ तो बहुत आगे निकल जाता हैं !!

मगर कहता भी हैं एक सच्चे दोस्त की तरह , की चलता रह साथ में कहीं न कहीं तो पहुँच ही जायेगा !
मरहम भी देता हैं और सिखाता भी हैं - हरदम एक बात को याद रखने को कहता हैं - "जल्द ही ये पल- अच्छा हो या बुरा बीत जायेगा" !!

Friday, August 14, 2015

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं ...............................

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं क्यूंकि ,
अब भी यहाँ बहुत लोग हैं , जो देश के लिए जज्बात रखते हैं !
आ जाये कभी संकट तो मर मिटने को तैयार रहते हैं !!

अब भी बहुत लोग हैं जो चुपचाप अलख जगाते हैं !
बिना किसी स्वार्थ के अपना कर्तव्य निभाते हैं !!

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं क्यूंकि ,
ये भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद , सुखदेव , राजगुरु - न जाने कितनी कुर्बानियो से सींची हैं !
सुभाष चन्द्र बोस , नेहरू , गांधी , पटेल , मौलाना आज़ाद आदि की सोच रखती हैं !!

अब भी यहाँ अब्दुल कलाम पैदा होते हैं , जो एक हाथ में गीता और दूसरे में कुरान रखते हैं !
अब भी यहाँ दसरथ मांझी पैदा होते हैं , जो अपने दम पर पहाड़ का सीना चीर कर रख देते हैं !!

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं क्यूंकि ,
मेरे देश का "जवान" बिकाऊ नहीं हैं, सीना ताने मातृभूमि की रक्षा करने में शान समझता हैं !
माणिक सरकार जैसा गरीब और निश्वार्थ मुख्यमंत्री त्रिपुरा में अब भी राज करता हैं !!

अभी भी देश के लिए नौजवानो के दिलो में शोले भड़कते हैं !
देश हित के लिए रामलीला मैदान में अब भी आंदोलन होते हैं !!

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं क्यूंकि ,
कालांतर में भी हमने दंश झेले हैं , हर बार उससे उभरे हैं !
आक्रान्ताओं के गुरूर को ख़त्म किया हैं , और मजबूत बने हैं !!

हर बार मजबूती से हमने अपना गौरव वापस पाया हैं !
भटके हुए लोगो को फिर मुख्यधारा में आते हमने पाया हैं !!

मेरे देश की उम्मीद अभी बाक़ी हैं क्यूंकि ,
रोज़ कही कही कोई किसान देश के लिए और ज्यादा अन्न उपजाने की कोशिश करता हैं !
रोज़ कहीं कही मजदूर सड़के बनाता  हैं !!

दूर गांवों में कोई शिक्षक आज भी भारत के बच्चो को दिल से पढ़ाता हैं !

कही किसी छोर पर भारत माँ का झंडा देख एक बच्चा गर्व करता हैं !!

Monday, August 10, 2015

मेरा देश रो रहा हैं ………………


मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि…………………………..
कश्मीर सुलग रहा हैं , गुजरात डूब रहा हैं !
पूर्व में नक्सल सिर उठा रहा हैं , मध्य में व्यापम घोटाला बलि ले रहा है !!
दक्षिण अलग राग अलाप रहा हैं , दिल्ली चुपचाप तमाशा देख रहा हैं !
दुश्मन घात लगा रहा हैं , बॉर्डर पर जवान गोली खा रहा हैं !!

मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि ,
घर में  ही लड़ मर रहे हैं उसके नौनिहाल , नेता सारे मौज ले रहे हैं !
लोकतंत्र के पावन मंदिर "संसद" में रोज़ हंगामे हो रहे हैं !!
जवान देश की खातिर शहीद हो गया , उसकी किसी को परवाह नहीं हैं !
एक आतंकवादी को फाँसी क्यों दी , राष्ट्रीय चिंता का विषय हो गया हैं !!

मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि ………………
सड़के बेहाल हैं , बिजली पानी का कोई ठिकाना नहीं !
तरस रहा हैं आम आदमी , नेताओ को फुर्सत नहीं !!
भड़काऊ भाषण , दूसरे को नीचा दिखाओ !
कुर्सी की खातिर - शतरंज का खेल चल रहा हैं !!

मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि  ………………
नौजवानो की आशायें धूमिल हैं , कोई रास्ता सूझ नहीं रहा हैं !
माँ-बहनें घर से निकलते डर रही हैं , रावण राह ताक रहा हैं !!
नियम कानूनो की धज्जियां उड़ाने वालो की जय जयकार हो रही हैं !
देश को धर्म और  जाति में बांटने की हर संभव कोशिश हो रही हैं !!

मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि  ………………
किसान आत्महत्या कर रहा हैं , मजदूर काम के लिए तरस रहा हैं !
चुने हुए सेवको में बंदरबांट चल रही हैं , भ्रस्टाचार देश को घुन की तरह खा रही हैं !!
कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए जनता को बहका रहे हैं !
जनता भी चंद पैसे के लिए खुद को बेच रही हैं !! 

मेरा देश  रो रहा हैं क्यूंकि  ………………
रक्षक अब  भक्षक हो गए हैं , कुछ पाखंडी संत हो गए हैं !
जनता गुमशुम हो गयी हैं , लाठियो से डर गयी हैं !!
देख कर हाल , जग हँसाई  हो रही हैं !
तरेर रहे हैं आँखे सब , क्यूंकि घर में ही मैंने मात खायी हैं !!

Monday, July 27, 2015

कलाम सर , लौट के जरूर आना.......


शब्दों की सीमा पता चल गयी , समझ  गया कलम का रुकना !
इतना सा कहना हैं  और लिखना हैं - कलाम सर , लौट के जरूर आना !!

आँखे नम हैं , दिल भारी , कागज भी फड़फड़ा रहा - हे ! भारत रत्न देखो आज आसमान भी जार जार रो रहा !
तुम चिरनिद्रा में सो गए , हे ! कर्मयोगी युगपुरुष हमसे रूठ क्यों चले गए !!

क्या लिखूं , कैसे परिभाषित करूँ - कैसे तुम अब्दुल से कलाम बने ? !
कहाँ से शुरू करूँ , कहाँ ख़त्म करू - कैसे तुम रामेश्वरम से भारत माँ के लाल बने ? !!

शब्दों की भी अपनी एक सीमा हैं , तुम उससे परे !
हे ! मानवता के अग्रदूत - अब्दुल , तुम "कलाम" को सही अर्थ दे गए !!  

Saturday, July 25, 2015

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं .....




चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
 हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!

थोड़ा बचपन को फिर से जीते है और थोड़ा बिना बात के खिलखिलाते हैं !
कुछ दोस्तों को फ़ोन लगाते हैं और वही बचपन के नाम से उसे चिड़ाते हैं !!

कुछ देर यूँ ही टहलते हैं , यादो के गलियारों के गोते लगाते हैं !
समझदारी और अनुभव को परे रखकर , बच्चो के साथ दौड़ लगाते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!


अपनी चम्पक , चाचा चौधरी  और साबू की दुनिया को बच्चो के कार्टून नेटवर्क में खोजते हैं !
बारिश में अपने को थोड़ा भिगोते हैं और कपड़ो में थोड़ा मैल लगाकर रुआंसा सा मुहं बनाते हैं !!

ऑफिस से किसी दिन बंक मारते हैं और यूँ ही निठल्ले होकर बाजार घुमते हैं !
जिसके साथ कुछ गिले शिकवे थे , कभी उसे गले लगाते हैं !!

भूल गए जो खेल बचपन के , जरा उसे खेलते हैं !
कंचे , पतंगबाजी , गुल्ली डंडा , खो खो और कबड्डी में जरा फिर हाथ आजमाते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!

अपने जो रूठ गए हैं , उन्हें मनाते हैं !
वो हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण पन्ना हैं , उन्हें याद कराते हैं !!

कल की चिंता को दूर रख किसी दिन तो अपने लिए जीते हैं !
वही अल्हड़पन , वही बेबाकी और ज़िंदादिली किसी दिन जीते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!


Saturday, July 18, 2015

क्रांति की ज्वाला .....


"वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! 

बदलना हैं हमें सब कुछ अब हमने ठान ली हैं!
यूं घिसट घिसट कर जीने से ज़िन्दगी नहीं जीनी !!

राह में आएंगे रोड़े और पहाड़ भी !
कितनी बार साँस भी फूलेगी और दम तोड़ेगा हौंसला भी !! 

मगर यूँ देखते रहने से हालात बदलने वाले नहीं !
हाथ पर हाथ रखे रहने से कुछ सुधरने वाला नहीं !!

वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! 

रावणो को भी अब सोचना होगा,कुम्भकर्णो को नींद से जागना होगा !
हर एक को अब राम बनना होगा !!

माना लम्बी लड़ाई हैं , मगर कदम तो उठाना होगा !
घुप्प अँधेरी रात है  दीया तो जलाना होगा !!

बदलना होगा सबको , अपने अंदर के इंसान को जगाना होगा !
खुद के अंदर की कुंठा को शोलो से दहकाना होगा !! 

सुधर जाओ नरकासुरो अब, माँ बहने सब जाग गयी हैं !
होश में आओ हुक्मरानो , जनता हिसाब मांगना सीख गयी हैं !!

वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! "

Wednesday, July 15, 2015

कैसे है ? बढ़िया !

एक मित्र मिले रास्ते में , हाथ मिलाया और पूछा ," कैसे हैं ?"  !
हमने भी वही रटा रटाया दिया जवाब - " बढ़िया , आप सुनाओ "  !!

फिर बातचीत का दौर शुरू हुआ और पंद्रह मिनट तक चला !
हमने ऑफिस से बात शुरू की , मोहल्ले वालो की टांग खींची !!

थोड़ी राजनीती की  ऐसी तैसी करी , फिर थोड़ा सोसाइटी में हो रहे बदलावों की फिक्र करी !
"अच्छा यार संडे को फुर्सत से बात करते हैं " कहकर हाथ मिलाया और अपने घर की राह पकड़ ली. !!


घर आया , थोड़ा सुस्ताया और सोचा , " जब इतना कुछ हो रहा हैं , तो कैसे कोई बढ़िया हो सकता हैं ?" !
नौकरी का मेरे कल का भरोसा नहीं , कोई कुछ मदद करेगा ऐसे मेरे करम नहीं !!

बच्चों को कुछ सँस्कार दे सकूँ , इसके लिए फुर्सत नहीं !
राजनीति में कुछ असर असर डाल सकूँ , चुनाव के दिन वोट मैं  डालता नहीं !!

कुछ अपने भविष्य के बारे में सोचूं , कुछ सूझता नहीं !
खर्चे बढ़ गए हैं अब सैलरी से कुछ होता नहीं !!

सामाजिकता मेरी फेसबुक और व्हाट्सप्प में सिमट गयी हैं , पडोसी को में जानता नहीं !
सेहत के लिए कुछ करने की सोचूं तो पार्क मेरे घर के नजदीक कोई हैं नहीं !!

मिलावटी खाना खा खाकर  बीमार सा हो गया हूँ , ताज़ी हवा के लिए पेड़ पौधे नहीं !
अब आपसे पूछता हूँ , " कैसे हैं आप ? " , बढ़िया हूँ कहना नहीं !!