Sunday, December 26, 2010

हर साल ........

कुछ खट्टी कुछ मीठी यादे जोड़ कर,

हर साल यु ही चुपके से गुजर जाता है.

जब तक हम समझने लगते उस साल को,

दिसंबर सामने आ जाता हैं.

फिर नए साल के उत्साह में,

पुराने साल को भुला कर,

नए साल के लिए नए ताने बाने बुनते हैं,

नए सपनो को पूरा करने के लिए,

नए साल का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं.

फिर समय का पहिया घूमता जाता हैं,

कब बीत गया एक और साल ,

दिसंबर में याद आता हैं.

( Happy New Year -2011 )

Tuesday, November 16, 2010

सिसकिया लेती ज़िन्दगी ........

सुबह उठे , तैयार हुए और बैग पकड़ा और चल दिए.

दिन भर सर सर कहते बिताया और शाम को फिर बैग लेकर चल दिए.

बस में धक्का मुक्की के बाद पसीना पोछते हुए घर पहुच गए.

और निढाल होकर चारपाई में लेट गए.



बीवी ने कुछ पूछा तो झला दिए, बेटे ने एक सवाल पूछा तो उसको हड़का दिए.

मम्मी ने पूछा " बेटा ! क्या हुआ? "

उसको भी बिना कुछ बताये टी वी देखने बैठ गए.

रात का खाना खाया और फिर सो गए.



रोज़ की इस दिनचर्या से कम कितना उकता गए,

ज़िन्दगी जो कभी हमारी थी, सच में कितना पराया कर गए.

हफ्ते के छ दिन ऑफिस को दे दिए और सातवा दिन जिसे संडे कहते है ,

थकान मिटाने में गुजार दिए.



अब कहाँ बचा कुछ सोचने को, कुछ समय परिवार के साथ बिताने को,

सपने में भी कभी बॉस की डांट सुनायी देती हैं,

टार्गेट पूरा नहीं होने का डर रात को भी जगा देती हैं.

सच में ज़िन्दगी अब बस सिसकिया लेती हैं.................

Thursday, November 11, 2010

अब भी मेरे गाँव में ऐसा होता है....................

इस दिल्ली शहर में घर से दो मिनट भी निकलते हैं,

तो पहले ताला चाबी दूंदते हैं.

मेरे गाँव में हम दो दिन के लिए बाहर जाते हैं ,

तो पडोसी चाची को जरा घर देख देना कह खुला छोड़ जाते हैं.

इस शहर में पिछले दो सालो से रहते हुए भी में अपने पडोसी को नहीं जानता,

मेरे गाँव में अब भी कोई नया आ जाए तो,

उसे कोई भैया, कोइ चाचा , तो कोई ताऊ कह कर रिश्ता जोड़ते हैं.

यहाँ शहर में घूमने के लिए हम पार्क दूंदते हैं,

मेरे गाँव में हम कोई नया घर बने तो खुश होते हैं.

इस शहर में १०० मीटर भी जाना तो हम रिक्श्वा वाले को दूंदते हैं,

मेरे गाँव में हम कई किलोमीटर पैदल ही नाप लेते हैं.

इस शहर में बिना ए सी और पंखे के गुजारा नहीं होता,

मेरे गाँव में कोई घर पंखा लगाये तो हम हंसते हैं.

इस शहर में अब ओवेन में खाना बनाते हैं,

मेरे गाँव में चूल्हे में अब भी रोटिया सेंकते हैं.

इस शहर में स्कूल फाईव स्टार हो गए हैं,

मेरे गाँव की पाठशाला में अब भी बच्चे दरी में बैठ कर ख्वाब बुनते हैं.

इस शहर में पेड़ खोजने से मिलते हैं,

मेरे गाँव में अब भी जंगल में जाने से डरते है.

इस शहर में थोडा सर्दी जुकाम भी हो जाये तो डॉक्टर के पास जाते हैं.

मेरे गाँव में अब भी काडा पीकर काम चलाते हैं.

इस शहर से लोग मेरे गाँव में ट्रेकिंग करने के लिए जाते हैं,

मेरे गाँव के लड़के उच्चे उच्चे पहाड़ो को बात बात में नाप आते हैं.



( मैं मूलत उतराखंड के अल्मोड़ा जिले के छोटे से गाँव कोटूली से तालुक रखता हूँ जो जीविका चलाने के लिए दिल्ली में रह रहा हूँ.)

Wednesday, November 10, 2010

एक कदम

" तू चल तो सही अपने कदम,

हर हालत में कही न कही पहुच ही जायेगा.

बैठा रहेगा एक जगह पर तो,

वही पर रह जायेगा.

कदम छोटे ही भले ही चल,

मगर कदमो को रुकने मत दे,

नदी की तरह खुद अपने रास्ते बना लेगा.

कदमो को गर जरुरत पड़े तो थोडा विश्राम दे,

मगर एक जगह पर टिक अपने मंजिल से अपने को दूर मत कर.

चल चला चल ......कदमो से अपने कितनो के लिए रास्ते बनाता चल. "

Thursday, November 4, 2010

शुभ दीपावली

“प्रकाश के इस त्यौहार में,

जगमग रहे जीवन.

तिमिर का नाश हो,

फैले उजियारा सर्वत्र,

आशाओं के दीप जले,

उम्मीदों के गुलशन खिले,

जीवन का हर पल महके,

हर पल में खुशियों के दीप जले. "

Monday, November 1, 2010

दिल्ली मेट्रो + राजीव चौक = सांस लेने को जगह नहीं .........

कल ऑफिस से घर को निकला. ६:१५ पर ओखला स्टेशन से मेट्रो पकड़ी और आराम से सेंटर सेक्त्रैअत पंहुचा. फिर उधर से कश्मीरी गेट के लिए मेट्रो पकड़ी , थोडा भीड़ थी. राजीव चौक पर जैसे ही मेट्रो का गेट खुला , लगा जैसे तूफ़ान आ गया हैं. पहले तो उतरने वालो की धक्का मुक्की और फिर चड़ने वालो ने ऐसा कोहराम मचाया की पूरे कोच में सांस लेने की लिए जगह नहीं बची. जिन लोगो को न्यू दिल्ली उतरना था, वो कश्मीरी गेट पर ही उतर पाए.

इ.श्रीधरन साहब का आरामदायक सफ़र दिन पर दिन दर्दनाक होता जा रहा हैं, कुछ अहितियात नहीं बरते गए तो कुछ दिन बाद ये खबरें आएँगी की राजीव चौक से ट्रेन में चढ़ कर कुछ लोगो के दम घुटने से मौत हो गयी.

मेट्रो ट्रेन को मेट्रो ट्रेन ही रहने दे, लोकल ट्रेन न बनाये. अगर आप सोचे की राजीव चौक से ट्रेन पकड़नी हैं तो सावधान हो जाये. बेहतर हैं बस से ही घर चले जाए.

Sunday, October 31, 2010

पार्क ........

पार्क में खेल रहे एक दादा पोते को में बड़े ध्यान से देख रहा था. अचानक पोता दौड़ते दौड़ते गिर पड़ा और रोने लगा , दादा बेंच में बैट्ठे रहे तो पोता उनकी तरफ देख कर फिर जोर जोर से रोने लगा. अबकी बार दादा ने उसकी तरफ से अपना ध्यान हटाया और पेड़ की पत्तियों को गिनने की एक्टिंग करने लगे. पोता उठा और दादा के पास आ गया और फिर से रोने लगा और दादा की उंगली पकड़ के उस जगह ले गया जहा वो गिरा था. दादा ने उस जगह पर जो गड्ढा बना था उसको बगल से मिटटी ले कर भर दिया और बोले, " बेटा, अब इस जगह कोई बच्चा नहीं गिरेगा. " बच्चे ने भी देखा देखि अपनी नन्ही उंगलियों से मिटटी ला कर दल दी और खुश हो गया.


इस बात से मुझे अपनी सुबह की घटना याद आ गयी जब मेरी बिटिया एक झूले से गिर पड़ी और मैंने अपनी बिटिया को समझाने के लिए झूले को दो चार हाथ पैर मारे और बोला, " ले बेटा , इसने आपको गिराया, मैंने इसको मार दिया. हिसाब किताब बराबर. "

अब मुझे अपने समझाने और उस बुजुर्ग के समझाने में अंतर समझ आ गया. मैं मन ही मन मुस्कराता रह गया.

Monday, October 18, 2010

बचपन से सीखो ज़िन्दगी जीना..

" काश ! खुदा मुझसे कहता किसी रोज़,


बता तुझे सीखना हो अपनी बीती ज़िन्दगी से ,

तो वो क्या होगा?

मैं कहता खुदा से,

"मुझे फिर से मुझे मेरे बचपन में पंहुचा दे,

इस ज़िन्दगी की दौड़ भाग से,

थोड़ी सी आज़ादी दिला दे.

न सुकून हैं यहाँ, बस दौड़ हैं आगे और आगे की ,

मुझे मेरे बचपन के वो अल्हड दिन फिर दिला दे.

छोटी छोटी बातो में रूठने और बिना किसी बात पर,

जोर जोर से ठहाके लगाना फिर से सीखा दे.

यु बिना काम के घंटो घूमना फिरना ,

बिना सोचे समझे दिल की बात कहलाना सिखा दे.

बिना किसी भेदभाव के किसी से दोस्ती कर लेना,

माँ की डाट को एक कान से सुनकर दूसरी कान से निकालना सीखा दे.

पापा अगर किसी बात पर लगा भी तमाचा तो,


अगले ही पल फिर उनसे किसी बात के लिए जिद करना सीखा दे.

आगे क्या होगा , कैसे होगा की फिक्र छोड़ बस उस वक़्त में जीना सीखा दे. "

Monday, September 20, 2010

बिना बात के फासले .....

" कुछ ही दिन हुए तो उनसे हाल चाल न पूछे हुए,


बस फिर फासला बढता गया.

हम क्यों करे पहल ,

वो क्यूँ नहीं कर सकते !

दिन यू ही फिसलते चले गए.

कुछ भी न हुआ था दरम्यान,

बस दूरियों के फासले बढते चले गए.

कुछ भी हो, अपनों से बात करते रहिये,

कभी काम की तो कभी यु ही कर लीजिये,

दूरियां बिना बात की यु न बढेगी,

दुनिया में कभी भी अपनों की कमी न खलेगी. "

Monday, September 13, 2010

" आज हिंदी दिवस हैं,-१४ सितम्बर "

" आज हिंदी दिवस हैं, "


सुबह जागते ही अपनी पत्नी को कहा ,

हैप्पी हिंदी दिवस.

थोड़ी देर में अपनी गलती का एहसास हो गया,

हिंदी दिवस पर भी हैप्पी हिंदी दिवस बोल गया.

हिंगलिश का ये कैसा असर हो गया हैं हम पर,

मात्र भाषा ही भूल गए हम सब.

हर आदमी चाहता हैं,

बस उसको अंग्रेजी आ जाये,

हिंदी तो लोकल लोग बोलते हैं,

हम इंग्लिश बन जाए.

इस सम्रद्ध भाषा के अब कम ही ज्ञानी रह गए हैं,

कुछ लोग अँगरेज़ और कुछ हिंगलिश हो गए हैं.

कितनी बड़ी बिडम्बना हैं,

अपनी राज्यभाषा को मनाने के लिए ,

हमें उसका दिवस मनाना पड़ रहा हैं.

मेरे जैसे कट्टर हिंदी समर्थक भी,

अब हिंगलिश बोलने में शान समझ रहे है.

हिंदी तड़प रही हैं अपने ही नौनिहालों के बर्ताव से,

धीरे धीरे दम तोड़ रही हैं हिंगलिश और इंग्लिश के प्रभाव से.

Saturday, September 11, 2010

रास्ते से एक दिन खुदा जा रहे थे......

रास्ते से एक दिन खुदा जा रहे थे,

मुझे देख कर आँख चुरा रहे थे,

मैं भी कम न था,

पकड़ ही लिया अगले नुक्कड़ पर,

बैठा दिया एक चाय के खोमचे पर,

कुछ इधर उधर की बाते की,

फिर मैं लाइन पर आ ही गया,

पूछ ही डाला सवाल खुदा से,

जिससे एक बार तो खुदा भी सकपका गया,

मैंने पूछा , " अपनी ही बनायीं दुनिया में,

यु छुपे- चुप्प घूम रहे हो "

चाय का घूँट शायद गले में ही अटक गया,

दर्द उनकी आँखे में आ गया,

" सोच कर क्या बनायीं थी मैंने दुनिया,

ये हाल क्या हो गया.

दुनिया बनाने से थोडा थक कर सो गया था,

लेकिन अंदाज़ा न था, इतनी देर में सब कुछ बदल जायेगा,

रचनाकार को खुद ही आसरा दूंदना भारी हो जायेगा."

मैंने सोचा अब अपना दर्द बता कर क्यूँ परेशान खुदा को करू,

खुद ही संभल जाऊंगा, खुदा को चाय के चुस्कियो के बीच ही छोड़ दिया.



 

चल खुदा, मेरे साथ चल...

" चल खुदा, मेरे साथ चल, तुझे तेरी ही दुनिया दिखाता हूँ.


तुने जो भी सोचा था, हकीकत में दिखाता हूँ.

तुने तो सबको एक सा बनाया था, मगर फर्क कितना , समझाता हूँ.

कोई तो भूखा मरे , और कही खजाने भरे पड़े.

तुने तो सबको प्यार करना सीखाया, मगर यहाँ तो भाई भाई से लड़े.

तुने कितने जतन से बनाई दुनिया, मगर तेरे ही बन्दे इसकी तस्वीर बदले.

तुने तो एक धर्म बनाया मानवता का, यहाँ तो कितने पंथ बने.

अब तो तुझे भी कई नाम दे दिए, एक तू निरंकार अब तेरे हजारो नाम हुए.

तुझे बंद कर इट के दरवाजो में, तेरे नाम से कितने घर जले.



चल खुदा ! मेरे साथ चल, तुझे तेरी ही दुनिया दिखाता हूँ.

जो तेरा नाम रोज़ ले, मुशीबत में वो ही पड़े,

जो करे आज तमाशा , हाथ दुनिया उसी को जोड़े.

सच में तुने भी रचना करने के बाद इस दुनिया की सुध नहीं ली.

सब कुछ बना दिया है अच्छा, ये सोच आँखे मूद ली.

तेरे ही बन्दों ने देख तेरी दुनिया की हालत बदल दी. "

Thursday, September 9, 2010

कागजो की आपबीती ....( दूसरा भाग)

सुनकर करेंसी नोट के कागज़ की दास्तान,

सारे हो गए हैरान,

जिसे सारे अब तक बड़ा खुशकिस्मत समझ रहे थे,

उसी पर अब सारे तरस खा रहे थे,

अश्रुपूर्ण नयनो को लेकर जब वो नीचे उत्तरी,

चुपचाप जाकर अपनी सीट पर बैठी,

जो अब तक उसे ललचाई नज़रो से देख रहे थे,

अब वो बगले झांक रहे थे.

हर चीज़ जो चमकती है, सोना नहीं होती ,

एक दुसरे के कान में कह रहे थे.

वो भी अपनी बिरादरी की ही हैं,

उसके दुःख में सारे शरीक हो रहे थे.

किसी की किस्मत और हैसियत से जलो मत,

वो भी आग में तप कर उस जगह काबिज़ हुआ हैं.

सब अपनी अपनी जगह राजा हैं,

सबका अपना अलग अलग रास्ता,

जिसका जो काम उसी को भाता हैं,

हर ख़ुशी के पीछे दर्द का बड़ा सैलाब हैं.

Friday, September 3, 2010

कागजों की आपबीती ..........

कागजों के एक सेमीनार में,


सब करेंसी नोट की किस्मत से जल रहे थे,

सब अपनी अपनी बारी से अपनी किस्मत का रोना रो रहे थे,

अखबार वाला कागज़ अपनी दुविधा बता रहा था,

किताबो का कागज़ अपने पर पड़ी धूल को हटा रहा था.

लेकिन सब करेंसी नोट के कागज़ की बोलने की बारी का इंतज़ार कर रहे थे,

आखीर में करेंसी नोट का कागज़ सजा धजा मंच पर पहुचने को तैयार हुआ ,

मंच तक पहुचने के छोटे से रास्ते में ही हजारो ने उसको ललचाई नजरो से घूरा.

छीना झपटी से बचता बचाता वो मंच तक पंहुचा.

तालियों की गूँज से उसका बड़ा स्वागत हुआ.

वो सहमा सहमा माइक तक जा ही पंहुचा,

" मुझे यु मत देखो ललचाई नज़रों से,

अब कुछ भी बचा नहीं हैं मुझमे,

कितने लोगो के पास रह कर गुजरी हूँ में,

गिनती भी कम पड़ गयी हैं गिनने में,

तुम सब मेरी किस्मत पर जल रहे हो,

मगर हकीकत बिलकुल उलटी हैं,

मैं तुम्हे खुशकिस्मत समझती हूँ,

तुम किसी एक के पास रहकर सजती तो हो,

मैं तो कभी इस हाथ में, कभी उस हाथ में,

कभी किसी की तिजोरी में, कभी किसी के जेब में.

एक जगह कभी टिक नहीं सकती,

किसी को अपना कह नहीं सकती,

मुझ पर घर तोड़ने के आरोप लगते हैं,

भाई भाई आपस में मेरे लिए लड़ते हैं.

मुझे ही दुनिया वाले सबसे बड़ा समझते हैं.

सारे दुनिया के बुरे काम मुझसे ही होते हैं.

लोगो को मुझे पाने के लिए दिन रात एक करते देखती हूँ,

बच्चो को उनके अपनों से दूर होते सोचती हूँ,

में न चाहते हुए भी सबमे शरीक हूँ,

मुझसे पूछो तो में सबसे गरीब हूँ. "

सब स्तब्ध रह गए नोट की आपबीती सुन कर,

सन्नाटा पसर गया सारे हॉल पर.
 
(फिर क्या हुआ, अगले भाग में ................पढते रहिये )

Thursday, August 26, 2010

जीवन एक सागर..ज़िन्दगी एक नाव !

जीवन एक सागर..


ज़िन्दगी एक नाव,

हम हैं केवट और हमारा संघर्ष उसकी पतवार,

पतवार संभाले हम भी चल रहें हैं जीवन सागर में,

और करोडो लोग हमारे साथ.

न जाने कहाँ किनारा हैं इस सागर का,

किसी को भी नहीं हैं इसका एहसास.

किसी की नाव गोते खा रही ,

किसी को लहरों का मिल रहा हैं साथ.

कोई लेकर चल रहा अपनों को लेकर साथ,

कोई अकेला ही चप्पू चला रहा और कर रहा मंजिल की तलाश.



हर एक का बस एक लक्ष्य ,

जाना हैं इस सागर के पार,

कोई सीधी रखता हैं पतवार,

कोई हवायो के रुख को देख कर चल रहा अपनी चाल.

कोई तेज चप्पू चलता ,

कोई रखता अपनी मंद चाल.



कितने पीछे छूट रहे इस सफ़र पर,

कितनो का मिल रहा हैं साथ.



जीवन सागर में ज़िन्दगी नाव,

करती जाती कितने पड़ाव पार.



जारी हैं अनंत काल से ये सफ़र ,

पता नहीं कितनो ने पार किया ये सागर,

चलो चलो , आगे चलो ....

शायद हम भी हो जाए उस पार.