Saturday, August 20, 2011

जय हो अन्ना ! हम तुम्हारे आभारी हैं......

घुट घुट कर जीते रहे,


खून के आंसू पीते रहे.

जानते हुए भी खामोश थे,

गर्दन नीचे किये चलते रहे,

जानते थे बहुत कुछ गलत हो रहा हैं,

मगर आदतन खामोश रहे,

क्यों .....

शायद कौन पहल करे ,

यही सोच सोच कुड़ाते रहे,

फिर .....

एक दिन एक व्यक्ति ने हिम्मत दिखाई ,

विरोध का बिगुल फूँका ,

तो हमारे अन्दर सहमा कुचला और उपेक्षित इंसान जाग उठा.

सबको जैसे पंख लग गए.

एक एक के जुड़ने से सैलाब बन गया.

जनशक्ति का एहसास सरकार को भी हो गया.

जय हो अन्ना ! हम तुम्हारे आभारी हैं,

तुमने हमारे अन्दर के इंसान को जगा दिया.

( Suppot Anna Hajare, this veteran is fighting for us for our better tommorrow)

Tuesday, August 16, 2011

गाँधी तेरे देश में......

गाँधी तेरे देश में देख तेरे अन्ना का क्या हाल हो गया ?


तेरे रास्तो पर चल वो तिहाड़ जेल पहुच गया.

सच में आज तुम होते तो फूट फूट कर रोते,

अहिंसा के मार्ग पर चलना आपके देश में ही अब पाप हो गया.



Saturday, August 6, 2011

सपने और हकीकत ........

लडकपन में सोचते थे बड़े होंगे,


शहर जायेंगे और नौकरी करेंगे,

खूब पैसे कमाएंगे और

बढ़िया से जियेंगे.

बड़ा सा घर बनायेंगे ,

लम्बी सी कार खरीदेंगे,

दुनिया में सैर करने जायेंगे.

और लोगो को ठाठ दिखायेंगे,

बड़े हुए और शहर भी आये ,

नौकरी भी की मगर आगे के सपने पूरे नहीं हो पाए.

घर तो दूर की बात, किराये के मकान में रहते रहते बेहाल हो गए,

लम्बी सी गाड़ी तो कोसो दूर की बात जान पड़ी,

स्कूटर खरीदने के पैसे भी जमा नहीं हो पाए.

रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में ऐसे उलझे ,

घूमना तो दूर अपने गाँव भी जाने के लिए सोचने लगे.

सच में यही ज़िन्दगी हैं ................

( आगे की बात.... आप सब इतने समझदार हैं - खुद ही अपनी ज़िन्दगी में झांक लीजिये)

Tuesday, July 26, 2011

शुक्रिया .................


सबसे पहले शुक्रिया उस खुदा का जिसने मुझे इंसान बनाने की सोची,
फिर शुक्रिया मेरे माता पिता का, जो मुझे धरती पर लाये. 
और मेरी ज़िन्दगी को एक आकार दिया. 
शुक्रिया मेरे भाई बहनों का , जिनके होने से में अपने वजूद को समझ पाया. 
शुक्रिया मेरे शिक्षको का, जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया. 
शुक्रिया मेरे दोस्तों का जिन्होंने मुझे जिंदादिली सिखाई. 
शुक्रिया मेरे उन सब नाते रिश्तेदारों का जिन्होंने मुझे प्यार दिया. 
शुक्रिया मेरे सब जानने वालो का जिन्होंने मुझे कुछ न कुछ सिखाया. 
शुक्रिया मेरी पत्नी का जिसने मुझे मेरे महत्व का ज्ञान कराया. 
शुक्रिया मेरी बिटिया का जिसने मुझे फिर से जीना सिखाया.

(अपने ३३ वे जन्मदिन पर मैं उन सभी लोगो का शुक्रिया जो मुझे इस जीवन सफ़र में मिले हैं )

Wednesday, June 15, 2011

मेरी सौवी कविता ........बदलाव

जब तक हम नहीं बद्लेगे, दुनिया नहीं बदलेगी. 
जब हम बदलेंगे , तब ये दुनिया बदलेगी. 
बदलने और बदलवाने की ये आंधी ,हम से ही शुरू होगी , 
तब जाकर आगे बढेगी. 
एक एक के बदलने से, कारवां बनता जायेगा, 
एक दिन फिर ये कारवां , बदलाव का सुनहरा सैलाब लायेगा. 
तो बदलने की शपथ आज से ही लेनी होगी, 
कल तो आता नहीं कभी, अभी से शुरुवात करनी पड़ेगी. 
जो बुरा हैं वो बुरा हैं उसका विरोध करना ही पड़ेगा, 
जो अच्छा है उसको स्वीकार करना ही पड़ेगा. 
बनाना है दुनिया को अपने मुताबिक तो, 
कुछ तो यहाँ करना पड़ेगा. 

Sunday, June 5, 2011

बाबा जी का सत्याग्रह ...

बाबा जी ने कसम खाई, 
भ्रष्टाचार मिटाना हैं, 
विदेशो में पड़ा सारा काला धन, 
अपने देश में लाना हैं. 
रामलीला मैदान में आकर हुंकार जोरो से भरी, 
सरकार ने भी अपनी कुटिल चाल चली, 
बाबा के सत्याग्रह को ना जाने किसकी नजर लगी, 
दो दिन में ही सरकार ने दमन का चाबुक चलाया, 
बाबाजी ने महिला वेश में अपने को छुपाया, 
जैसे तैसे बाबाजी अपने धाम पहुचे, 
सरकार को खूब खरी खोटी सुना कर, 
फिर अनशन पर बैठे, 
न जाने कौन सही हैं और कौन गलत, 
आम आदमी अब ये सोचे ! 

Monday, May 30, 2011

क्या गम और क्या ख़ुशी ?

गम और ख़ुशी कुछ नहीं होता संसार में, 
बस भावनाओ का ज्वार और दिल का  बहकावा होता हैं. 
हमारे अनुसार हो गया तो ख़ुशी हो जाती हैं, 
हमारे अनुसार नहीं हुआ तो गम हो जाता हैं. 
अब ये हमारे दिल का छलावा नहीं हैं तो क्या हुआ? 
कुछ पल बीत जाने का बाद दिल को ही लगता हैं, 
जो ख़ुशी हैं उसमे भी कुछ गम हैं , 
और जो गम हैं वो भी ठीक हैं. 
गम और ख़ुशी के बीच ही झूलता रहता हैं मन, 
उलझा कुछ सुलझा बहकता रहता हैं मन. 

Friday, May 27, 2011

Life = Birth +……………………………….+Death


Life is a journey,
Begins with birth ,
End with death,
But in between Birth and death,
Every dot is ours and only ours,
How we convert these dots in to what,
This all depends on us.
Convert these dots into yours choice,
Add more dots as you can,
Convert every dot in to memorable page,
Make your life a readable book,
Set some path to pave others. 

Wednesday, May 18, 2011

You are not alone in the world …………….


When you are sad,
Remember you are not alone in the world.
When you are happy ,
Remember you are not alone in the world.
When the time against you,
Remember there are millions like you,
When everything is going in your way,
Remember there are thousands like you.
 One thing is sure in all times,
You are blessed with this beautiful life,
Which comes after journey of millions mile,
This is true that we are alive,
Whatever the time and whatever the situation,
Remember we are the special child.
But don’t forget to remember,
You are not alone in the world. 

Thursday, May 5, 2011

अप्रैल से लगाव....

अप्रैल का महिना हर नौकरीशुदा आदमी के लिए खास होता हैं, 
साल भर की उसकी मेहनत का इनाम उसे मिलता हैं, 
इसी आस में  वो ग्यारह महीने काट देता हैं, 
अप्रैल आएगा तो नयी खुशियों की सौगात लायेगा. 
कितने सब्जबाग वो जनवरी से देखने शुरू कर देता हैं, 
कल्पना में बड़े हुए पैसो का हिसाब किताब लगाना शुरू कर देता हैं, 
अप्रैल हर साल आता हैं और चला जाता हैं, 
देकर उसे कुछ मूंगफली के दाने, बादाम की आस अपने साथ ले जाता हैं. 
उसके सपनो में फिर तुषारापात होता हैं, 
" और बढ़िया काम करो " बॉस की ये बात सुन सुनकर , 
अपनी ज़िन्दगी के तमाम साल यूँ ही गुजार देता हैं. 

इन्क्रीमेंट ....


वो अपने इन्क्रीमेंट को लेकर नाखुश दिखा, 
रात भर सोचा और सुबह बॉस के पास पंहुचा, 
दिल की सारी भड़ास निकालने के बाद , 
बॉस को इस्तीफे देने की बात कहकर , 
चुपचाप अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. 

थोड़ी देर सोचने के बाद फिर बॉस से टाइम माँगा, 
और फिर बॉस से मिलने चल दिया. 
बॉस  ने उसको कोफी पिलाई और कहां, 
" हाँ ! अब बताओ तुम्हे क्या कहना हैं, "
उसने एक सांस में अपने साथियों के उससे ज्यादा सैलरी  बड़ने का जिक्र किया , 
और पुछा , " सर, मैंने भी तो साल भर मेहनत से काम किया फिर मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों किया?"
बॉस ने उत्तर दिया, " तुम अपनी सैलरी कम बढने से नाखुश हो या दुसरो की तुमसे ज्यादा बड़ी हैं, इससे परेशान हो.
मेरे हिसाब से तुम्हारी सही बड़ी हैं, तुम ही बताओ तुमने साल भर में ऐसा क्या किया, 
जो मैं कह सकू की तुम औरो से अलग हो.
इस साल कुछ असाधारण करके दिखाओ , अगले साल तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर दूंगा "
वो बॉस की बात सुनकर मर्म समझ गया, पिछले दो साल में ३ बॉस को बदलते देख चुका, 
चुपचाप सीट से उठा , और फिर से अपने काम में लग गया. 

जय हो इन्क्रीमेंट की ! जय हो बॉस की ! 

Wednesday, May 4, 2011

रोज़ सुबह........

रोज़ सुबह सवाल करती हैं ज़िन्दगी मुझसे, 
आज नया क्या करेगा ? 
रोज़ शाम फिर मुझे कचोटती है, 
यूँ ही गवा दिया फिर तुने दिन एक नया. 
ये जदोजहद न जाने कितने सालो से रोज़ होती हैं. 
मैं रोज़ रात को फिर अगले दिन को यादगार बनाने की कसम खाता हूँ, 
अगले दिन फिर रात को अपने को वही पाता हूँ. 

Wednesday, April 27, 2011

असमंजस ..................

छोटा सा टॉप और जींस पहनकर , 
वो बस में सफ़र कर रही थी, 
कही से कुछ न दिख जाये, 
बार बार टॉप और जींस को एडजस्ट कर रही थी, 
फिर अपने आस पास के लोगो की घूरती निगाहों से, 
बचने का प्रयास कर रही थी. 

मैं ये सब माजरा देख रहा था, 
लड़की को फैशन के चक्कर में, 
परेशान होते देख रहा था. 
अब ये दुनिया के साथ चलने की कवायद थी उसकी, 
या यार दोस्तों से पीछे रहने का डर उसे सता रहा था. 
कुछ भी कारण हो वो खुद को बड़ी असहज पा रही थी. 

Sunday, April 17, 2011

अहम ब्रह्म्ष्मी .........

जब भी तू हो उदास, मन भर आये होकर कोई बात.


दुनिया जब बेगानी सी लगने लगे,

अपने से जब थोडा भरोसा डगमगाने लगे,

हर चीज़ जब बुरी लगने लगे, किसी काम में मन न लगे,

तसल्ली से किसी एकांत जगह पर बैठ ,

बस थोडा आँख से आंसू निकाल,

और फिर जब थोडा मन हल्का हो जाए,

तो एक मंत्र रख याद,

दस बार खुद से " अहम ब्रह्म्ष्मी " बोल डाल,

खुद को खुदा की एक सम्पूर्ण रचना मान,

याद कर वो लोग, जो बिना कुछ होते हुए भी हंस कर जी रहें हैं,

याद कर वो लोग, जो तेरे पीछे खड़े हैं.

याद कर अपनी माँ का तेरे लिए वो लाड प्यार,

याद कर पिता का वो डांट में तेरे लिए आशीर्वाद,

तू खुद में पूरा हैं , तुझमे में कोई कमी नहीं हैं,

बस थोडा हालातो का धोखा हैं, और समय नहीं तेरे साथ.

मगर ये भी कितने पल ठहरेगा , तेरे सोचने मात्र से ही काफूर हो जायेगा,

फिर से तू खड़ा होगा, लेकर अपने सपनो को साथ.

चल- चला - चल तेरे आगे सारा नीला आकाश.

Wednesday, April 13, 2011

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं...

किताबो में बहुत पढ़ा की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,


जब तक अपने छोटे से गाँव में रहा ,

तो यकीनन लगता था की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,

दुसरे गाँव में भी किसी एक घर में कुछ अच्छा या बुरा होता था,

तो जाने अनजाने खबर हो ही जाती थी,

ख़ुशी की खबर से अच्छा लगता था तो दुःख की खबर में बुरा लगता था.

मगर जब से शहर आया हूँ,

ये उक्ति बेमानी सी लगती हैं,

दस सालो से जिस जगह में रहता हूँ,

अपने पडोसी को मैं खुद नहीं जानता हूँ.

उसके सुख दुःख में शरीक होने की बात तो दूर,

मैं उसका नाम तक नहीं जान पाया हूँ.

अपना घर और ऑफिस के अलावा,

सामाजिक होने का अर्थ मैं भूल सा गया हूँ.

मुझे भी अब तक समझ नहीं आया ,

की मैं भी ऐसा क्यूँ हो गया हूँ.

कहते हैं, " इन बड़े शहरो के ईट सीमेंट के दीवारों के पीछे ,

बहुत पढ़े लिखे और समझदार लोग रहते हैं."

मगर अब भी मैं ," मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,"

का अर्थ इस दिल्ली शहर में रोज़ ढूँढता हूँ.