Friday, November 18, 2011

विश्राम ...........

कुछ लिखने का मन क्यों नहीं करता, 
शब्दों को ढालने की कोशिश तो करता हूँ मगर, 
कुछ पंकित्यो के बाद कलम सरकती ही नहीं, 
शायद ये आजकल काम ज्यादा होने की थकावट हैं, 
या फिर मुझे ही कुछ नहीं सूझ रहा हैं, 
रचनात्मकता को जगाता तो हूँ हर रोज़, 
मगर किसी विषय पर टिकता क्यों नहीं हूँ. 
शायद मेरा कवि मन विश्राम कर रहा हैं. 
कुछ नए विषयो को टटोल रहा हैं. 
तब तक दुनियादारी के कुछ काम कर लेता हूँ. 
थोडा सा विश्राम लेकर फिर आपके साथ कुछ नया लाने की कोशिश करता हूँ.  

Monday, September 19, 2011

ये कैसी उलझन .......



बॉस कहता हैं ऑफिस तेरी पहली प्राथमिकता हैं,

क्यूंकि तेरी रोज़ी रोटी इसी से चल रही हैं.

आठ घंटे तो दिखाने के हैं, बाकी के घंटे काम करने से ही आगे दरवाजे खुलने हैं.

घर पर बीवी कहती हैं ,

घर तेरी पहली प्राथमिकता हैं , घर पर ज्यादा समय देना ज्यादा मह्त्वपूर्ण हैं.

दिमाग घनचक्कर की तरह घूम रहा हैं,

किस चीज़ को पहली प्राथमिकता दू,

उलझन बड़ी हैं, नौकरी और घर के बीच में ज़िन्दगी फंसी पड़ी हैं.

इस विषय पर लिखने को तो बहुत कुछ हैं मगर, यहाँ भी असमंजस हैं.


किसी एक पलड़े को भारी करने से अगले का अपने ऊपर ही गिरने भय हैं.

आप लोग खुद ही समझदार हैं ,

between the lines पढने में माहीर हैं.

खुद ही मर्म को समझ लीजियेगा,

अगर कोई रास्ता सूझे तो सबके साथ साझा जरुर करियेगा.

Sunday, September 18, 2011

डोर..

थामे डोर ज़िन्दगी की चले थे किस ओर ,


समय के थपेड़ो ने पंहुचा दिया किस ओर,

कुछ अपनी करनी और कुछ भाग्य के सहारे ,

देखो कहाँ से कहाँ पहुच गए हम लोग.

Saturday, September 17, 2011

मैं कौन हूँ .............

मैं जब पैदा होता हूँ, तो मेरे माँ-बाप मुझे अपने सपनो का सौदागर समझते हैं.


मैं थोडा बड़ा होता हूँ, तो स्कूल की फीस भरने के लिए माँ बाप को उदास देखता हूँ.

जैसे तैसे स्कूल से निकल कर कोलेज पहुचता हूँ, तो नए कपड़ो को तरसता हूँ.

माँ बाप की दो रोटी के जुगाड़ की कोशिशो को समझता हूँ.

उनके सपनो को पूरा करने के लिए मेहनत करता हूँ.

सरकारी नौकरी लग जाए तो परिवार को सहारा मिले,

सोच सोच कर हर फॉर्म भरता हूँ.

फिर थक हार कर प्राइवेट नौकरी की राह पकड़ता हूँ.

फिर हर साल नौकरी बदले तो कुछ पैसे मिले,

कही एक जगह टिक कर नहीं रहता हूँ.

बस के धक्के , बॉस की डांट और चलो कल अच्छा हो जायेगा,

की कशमकश में जवानी गुजारता हूँ.

थोडा जमने की कोशिश में शादी करता हूँ,

माँ बाप के सपनो को छोड़ अपनी दुनिया बसाने की कोशिश करता हूँ.

ऑफिस के टेंसन घर पर ले जाकर बीवी से झगड़ता हूँ.

बच्चो के आगमन से फिर नयी कल्पनाये बुनता हूँ.

उनके लिए रोटी , कपडा और मकान की जुगत बिठाने में लग जाता हूँ.

अपने आदर्श , अपनी कुंठाए गाहे बगाहे इज़हार कर लेता हूँ.

कभी लाइनों में लगे लोगो से , या कभी बस के धक्के मुक्को में ,

अपने गुस्से का इज़हार करता हूँ.

कभी किसी नेता की रैली में या कभी अन्ना हजारे के समर्थको ,

मैं ही शामिल होता हूँ.

जब अन्याय मेरे साथ होता हैं, मैं लोगो को उनके साथ न देने के लिए कोसता हूँ.

जब सड़क के किसी के साथ अन्याय होता हैं तो चुपचाप मैं ही खिसकता हूँ.

मैं कौन हूँ .............मैं आम आदमी हूँ.

Sunday, September 11, 2011

खुदी को साबित.........

इतेफाक से मिली ये ज़िन्दगी, खुदा की नियामत हैं

खुदी को साबित करने का एक अवसर हैं.


निशाँ इतने छोड़ जाने हैं इस धरा पर,

लोग कहे की हाँ ! आया था एक आदमी ज़मी पर.

ज़िन्दगी को जीना हैं इस तरह से,

जिंदगानी से कोई शिकवा न रह जाए,

लोगो का इतना काफिला हो रुखसती के समय की,

खुदा को भी तुझ पर गुमान हो जाए.

यूँ तो अरबो जीवन यहाँ हैं, लेकिन कुछ ऐसा कर गुजर,

की जब पलटे तू ही पन्ने अपने जीवन की किताब के,

फक्र से तेरा सीना चोडा हो जाये.



Saturday, August 20, 2011

जय हो अन्ना ! हम तुम्हारे आभारी हैं......

घुट घुट कर जीते रहे,


खून के आंसू पीते रहे.

जानते हुए भी खामोश थे,

गर्दन नीचे किये चलते रहे,

जानते थे बहुत कुछ गलत हो रहा हैं,

मगर आदतन खामोश रहे,

क्यों .....

शायद कौन पहल करे ,

यही सोच सोच कुड़ाते रहे,

फिर .....

एक दिन एक व्यक्ति ने हिम्मत दिखाई ,

विरोध का बिगुल फूँका ,

तो हमारे अन्दर सहमा कुचला और उपेक्षित इंसान जाग उठा.

सबको जैसे पंख लग गए.

एक एक के जुड़ने से सैलाब बन गया.

जनशक्ति का एहसास सरकार को भी हो गया.

जय हो अन्ना ! हम तुम्हारे आभारी हैं,

तुमने हमारे अन्दर के इंसान को जगा दिया.

( Suppot Anna Hajare, this veteran is fighting for us for our better tommorrow)

Tuesday, August 16, 2011

गाँधी तेरे देश में......

गाँधी तेरे देश में देख तेरे अन्ना का क्या हाल हो गया ?


तेरे रास्तो पर चल वो तिहाड़ जेल पहुच गया.

सच में आज तुम होते तो फूट फूट कर रोते,

अहिंसा के मार्ग पर चलना आपके देश में ही अब पाप हो गया.



Saturday, August 6, 2011

सपने और हकीकत ........

लडकपन में सोचते थे बड़े होंगे,


शहर जायेंगे और नौकरी करेंगे,

खूब पैसे कमाएंगे और

बढ़िया से जियेंगे.

बड़ा सा घर बनायेंगे ,

लम्बी सी कार खरीदेंगे,

दुनिया में सैर करने जायेंगे.

और लोगो को ठाठ दिखायेंगे,

बड़े हुए और शहर भी आये ,

नौकरी भी की मगर आगे के सपने पूरे नहीं हो पाए.

घर तो दूर की बात, किराये के मकान में रहते रहते बेहाल हो गए,

लम्बी सी गाड़ी तो कोसो दूर की बात जान पड़ी,

स्कूटर खरीदने के पैसे भी जमा नहीं हो पाए.

रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में ऐसे उलझे ,

घूमना तो दूर अपने गाँव भी जाने के लिए सोचने लगे.

सच में यही ज़िन्दगी हैं ................

( आगे की बात.... आप सब इतने समझदार हैं - खुद ही अपनी ज़िन्दगी में झांक लीजिये)

Tuesday, July 26, 2011

शुक्रिया .................


सबसे पहले शुक्रिया उस खुदा का जिसने मुझे इंसान बनाने की सोची,
फिर शुक्रिया मेरे माता पिता का, जो मुझे धरती पर लाये. 
और मेरी ज़िन्दगी को एक आकार दिया. 
शुक्रिया मेरे भाई बहनों का , जिनके होने से में अपने वजूद को समझ पाया. 
शुक्रिया मेरे शिक्षको का, जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया. 
शुक्रिया मेरे दोस्तों का जिन्होंने मुझे जिंदादिली सिखाई. 
शुक्रिया मेरे उन सब नाते रिश्तेदारों का जिन्होंने मुझे प्यार दिया. 
शुक्रिया मेरे सब जानने वालो का जिन्होंने मुझे कुछ न कुछ सिखाया. 
शुक्रिया मेरी पत्नी का जिसने मुझे मेरे महत्व का ज्ञान कराया. 
शुक्रिया मेरी बिटिया का जिसने मुझे फिर से जीना सिखाया.

(अपने ३३ वे जन्मदिन पर मैं उन सभी लोगो का शुक्रिया जो मुझे इस जीवन सफ़र में मिले हैं )

Wednesday, June 15, 2011

मेरी सौवी कविता ........बदलाव

जब तक हम नहीं बद्लेगे, दुनिया नहीं बदलेगी. 
जब हम बदलेंगे , तब ये दुनिया बदलेगी. 
बदलने और बदलवाने की ये आंधी ,हम से ही शुरू होगी , 
तब जाकर आगे बढेगी. 
एक एक के बदलने से, कारवां बनता जायेगा, 
एक दिन फिर ये कारवां , बदलाव का सुनहरा सैलाब लायेगा. 
तो बदलने की शपथ आज से ही लेनी होगी, 
कल तो आता नहीं कभी, अभी से शुरुवात करनी पड़ेगी. 
जो बुरा हैं वो बुरा हैं उसका विरोध करना ही पड़ेगा, 
जो अच्छा है उसको स्वीकार करना ही पड़ेगा. 
बनाना है दुनिया को अपने मुताबिक तो, 
कुछ तो यहाँ करना पड़ेगा. 

Sunday, June 5, 2011

बाबा जी का सत्याग्रह ...

बाबा जी ने कसम खाई, 
भ्रष्टाचार मिटाना हैं, 
विदेशो में पड़ा सारा काला धन, 
अपने देश में लाना हैं. 
रामलीला मैदान में आकर हुंकार जोरो से भरी, 
सरकार ने भी अपनी कुटिल चाल चली, 
बाबा के सत्याग्रह को ना जाने किसकी नजर लगी, 
दो दिन में ही सरकार ने दमन का चाबुक चलाया, 
बाबाजी ने महिला वेश में अपने को छुपाया, 
जैसे तैसे बाबाजी अपने धाम पहुचे, 
सरकार को खूब खरी खोटी सुना कर, 
फिर अनशन पर बैठे, 
न जाने कौन सही हैं और कौन गलत, 
आम आदमी अब ये सोचे ! 

Monday, May 30, 2011

क्या गम और क्या ख़ुशी ?

गम और ख़ुशी कुछ नहीं होता संसार में, 
बस भावनाओ का ज्वार और दिल का  बहकावा होता हैं. 
हमारे अनुसार हो गया तो ख़ुशी हो जाती हैं, 
हमारे अनुसार नहीं हुआ तो गम हो जाता हैं. 
अब ये हमारे दिल का छलावा नहीं हैं तो क्या हुआ? 
कुछ पल बीत जाने का बाद दिल को ही लगता हैं, 
जो ख़ुशी हैं उसमे भी कुछ गम हैं , 
और जो गम हैं वो भी ठीक हैं. 
गम और ख़ुशी के बीच ही झूलता रहता हैं मन, 
उलझा कुछ सुलझा बहकता रहता हैं मन. 

Friday, May 27, 2011

Life = Birth +……………………………….+Death


Life is a journey,
Begins with birth ,
End with death,
But in between Birth and death,
Every dot is ours and only ours,
How we convert these dots in to what,
This all depends on us.
Convert these dots into yours choice,
Add more dots as you can,
Convert every dot in to memorable page,
Make your life a readable book,
Set some path to pave others. 

Wednesday, May 18, 2011

You are not alone in the world …………….


When you are sad,
Remember you are not alone in the world.
When you are happy ,
Remember you are not alone in the world.
When the time against you,
Remember there are millions like you,
When everything is going in your way,
Remember there are thousands like you.
 One thing is sure in all times,
You are blessed with this beautiful life,
Which comes after journey of millions mile,
This is true that we are alive,
Whatever the time and whatever the situation,
Remember we are the special child.
But don’t forget to remember,
You are not alone in the world. 

Thursday, May 5, 2011

अप्रैल से लगाव....

अप्रैल का महिना हर नौकरीशुदा आदमी के लिए खास होता हैं, 
साल भर की उसकी मेहनत का इनाम उसे मिलता हैं, 
इसी आस में  वो ग्यारह महीने काट देता हैं, 
अप्रैल आएगा तो नयी खुशियों की सौगात लायेगा. 
कितने सब्जबाग वो जनवरी से देखने शुरू कर देता हैं, 
कल्पना में बड़े हुए पैसो का हिसाब किताब लगाना शुरू कर देता हैं, 
अप्रैल हर साल आता हैं और चला जाता हैं, 
देकर उसे कुछ मूंगफली के दाने, बादाम की आस अपने साथ ले जाता हैं. 
उसके सपनो में फिर तुषारापात होता हैं, 
" और बढ़िया काम करो " बॉस की ये बात सुन सुनकर , 
अपनी ज़िन्दगी के तमाम साल यूँ ही गुजार देता हैं.