Monday, March 11, 2013

कारवां चलना चाहिए ........

हुंकार से पर्वतो को कंपा दे, 
अपने हाथो से नदियों का रुख मोड़ दे , 
गर्जना से जो बादलो को हटा दे , 
धधकती आग को जो पल भर में बुझा दे , 
पलक झपकते जो पहाड़ो को नाप दे , 
हालातो को जो अपने लिए मोड़ दे , 

अन्याय के लिए जो खुद को कुर्बान करने से न डरे , 
वो युवा अब हमें चाहिए और एक नहीं हजारो चाहिए , 
देश को सँभालने के लिए अब युवा चाहिए , 
बहुत हो चूका अब सब्र , 
देश हमारा हैं और हमें इसको सवारना हैं , 
एक नहीं पूरा रेला चाहिए , 

नौजवानों को अब हुंकार भरनी चाहिए , 
हर हालत में अब ये तस्वीर बदलनी चाहिए।
देश की तकदीर का  फैसला हमें ही करना हैं , 
क्यूंकि इसका भविष्य हमें ही तय करना हैं , 
अतीत से सबक लेकर वर्तमान हमसे ही बनना हैं , 
भविष्य रहे सुरक्षित हाथो में आज ही हमें तय करना हैं। 

जो जहां हैं,  जैसा हैं - मुमकिन कोशिश होनी चाहिए , 
कल कभी आता नहीं , अभी और इसी पल से शुरुवात होनी चाहिए , 
जो गलत हैं वो गलत हैं - कहने का साहस होना चाहिए , 
अन्याय और अत्याचार के खिलाफ जंग मुखर होनी चाहिए . 
ये धरती हमारी हैं और इस पर हमारा हक़ होना चाहिए . 

कारवां ये परिवर्तन का अब चलना चाहिए , 
राह कठिन भले ही हो , बढते चलना चाहिए , 
एक लक्ष्य के लिए सब युवा अब चलने चाहिए . 

Friday, February 22, 2013

एक अधूरी कविता ..........

बहुत दिनों से कोई कविता नहीं लिखी, 
आज सुबह से ही सोच रहा था , 
आज किसी न किसी विषय पर कविता लिखूंगा , 
सुबह घर से चला तो सोचा , 
ऑफिस पहुचने से पहले कोई न कोई विषय पर ध्यान केन्द्रित कर ही लूँगा , 
बस में चल दिया और अगले एक घंटे  में दिमाग को खूब दौड़ाया , 
किसी विषय पर तो अपने शब्दों का जाल से बुनू 
किसी एक विषय में दो चार पंकित्यो  से आगे नहीं सोच पा रहा था,  
घर परिवार से दुनियादारी तक ,  अपने देश से लेकर दुनिया तक, 
कल्पनाओ से लेकर यथार्थ तक , 
चाँद तारो से लेकर सागर के तल तक , 
सब सोच रहा था, 
ऑफिस पंहुचा तो ऐसा उलझा  की , 
अपनी ज़िन्दगी ही कविता लग रही थी , 
सोचा अभी थोडा काम निपटा लेता हूँ , 
अब लौटते हुए दिमाग लगाऊंगा , 
लेकिन लौटते हुए दिमाग की हालत ऐसी हो गयी थी, 
बस में जाते ही सो गया , 
मेरे घर के स्टैंड पर कंडक्टर ने आवाज देकर उतारा था, 
घर पहुच कर टीवी और बीवी बच्चो की दुनिया में खो गया , 
खाना खाया और कुछ इधर उधर की बाते की , 
रजाई तान के सो गया . 
एक कविता रचने की जो सुबह से सोच रहा था , 
अब शायद मेरे सोने के बाद , 
मेरे खर्राठे से रोशन हो रही थी। 

Tuesday, January 22, 2013

दुनिया बदल गयी हैं...


लोग कहते हैं दुनिया बदल गयी हैंमगर मैं जब सोचता हूँ
लगता हैं दुनिया तो जस की तस हैं
हमने अपने जीने के अंदाज को बदल लिया हैं
सूरज आज भी पूरब से ही निकलता है
पानी का स्वाद और रंग आज भी वैसा ही हैं
हवा आज भी दिखाई नहीं देती , 
पेड़ आज भी छाया और फल देते हैं
पत्थर आज भी चुपचाप पड़े रहते हैं
इंसान आज भी अमर नहीं हैं
फिर बदला क्या.........?
हमने अपनी ज़िन्दगी को सरल बना लिया हैं 
पैदल की जगह गाड़ियाप्लेन या रेल बना लिए हैं 
सन्देश भेजने के लिए कबूतरों से इन्टरनेट पर  गए हैं .
सोने के लिए डनलप के गद्दे बिछा तो लिए, आँखों से नींद गायब हो गयी हैं.
कल तक दादी अम्मा की कहानी सुनते थे, अब टीवी , फिल्मो से काम चला लेते हैं ,
बीमारी जो कल तक इक्का दुक्का थी, अब हजार कर दी हैं .
खाना बनाने के लिए चूल्हे से ओवेन बना लिए हैं 
दीये को अब हमने अलविदा कह बल्ब में  गए
ऐसा नहीं हैं की सबकी ज़िन्दगी बदल गयी
आज भी कुछ लोग पुरातन जीवन जी कर भी खुश हैं
हम सब कुछ हासिल करने के बावजूद भी दुखी
बदली दुनिया नहीं हैंबदले हैं हम....
जहाँ जीते थे १०० साल अब उम्र अपनी ६० कर ली हैं 
तो जीवन तो हर जगह तेज कर लियामगर अपने दिन भी तो उसी हिसाब से कम कर लिए हैं
अब इसी को दुनिया बदलना कहते हैं , तो शायद दुनिया बदल बहुत  गयी हैं ...

Wednesday, January 9, 2013

चंडी ............


दुम्रलोचन , चंद- मुंड और रक्तबीजो की फिर फ़ौज खड़ी हो गयी , 
मच रहा चारो ओर हाहाकार , 
तुझे छोड़ अपना रूप एक बार फिर से , 
लेना होगा चंडी का अवतार। 
मिल के एक बार फिर देना होगा सरस्वती और लक्ष्मी को , 
तुझको शक्तियां अपार , 
तुझे ही अब रण में उतरना होगा , 
करना होगा दुराचारियो का संहार , 
फिर से बताना पड़ेगा एक बार फिर , 
अबला  रणचंडी भी हैं , 
काल भी उसके आगे लाचार , 
तुझे तलवार और खडग से खुद अपनी रक्षा करनी होगी , 
धृतरास्ट बन गए सब , कृष्णा ने ले लिया संन्यास . 
मान मर्दन करने के लिए , तू हो जा  सिंह पर सवार . 

Wednesday, December 26, 2012

अलविदा 2012 ....


फिर एक नए साल की स्वागत को पलके बिछाए खड़े हम
2012 को अलविदा कहने को कितने उतावले हम
कितनी खट्टी मीठी यादे पीछे छोड़
लो आने वाला हैं एक नया साल आपके सामने
सपनो को फिर पंख लगे गए
नए साल के लिए अरमान फिर हरे हो गए
जनवरी से शुरू होता हर साल , दिसंबर में आकर रुक जाता हैं
फिर कैलेंडर हमारा नया जाता हैं
हर गुजरता साल हमारे जीवन का एक कम हो जाता हैं
हम अपनी उम्र में एक साल और जोड़कर
फिर आगे बढ जाते हैं
हर साल हमारा यूँ ही गुजर जाता हैं
चलो ! 2012 का अध्याय ख़त्म कर आगे बड़ते हैं
2013 का तहेदिल से स्वागत करते हैं
लगायेंगे हिसाब किताब कभी इन बीते सालो का
जब कभी फुर्सत के कुछ पल हमारे पास होंगे
अभी तो भागमभाग की इस ज़िन्दगी में
बस कैलेंडर को बदल लेते हैं
आओ ! फिर से एक नए साल में प्रवेश करते हैं

नए साल की सभी को हार्दिक शुभकामनाये