Wednesday, December 9, 2020

अंतिम बैंच


वो कक्षा की अंतिम पँक्ति के बैंच ,

सबको ही लुभाते थे ,

आज़ादी थी वहाँ , किस्से तमाम बनते थे।

 

जब पढ़ाया जा रहा होता था ,

इतिहास का कोई महत्वपूर्ण पाठ ,

आँखे उनीदी सी हो जाती थी।

 

जब सुलझाया जा रहा होता था ,

गणित का कोई सवाल ,

आँखे बाहर मैदान में गड़ी होती थी।

 

जब विज्ञान शिक्षिका बताती थी ,

न्यूटन के नियम ,

वहाँ से सब पर नजर जाती थी।

 

जब अंग्रेजी के शिक्षक ,

बारी बारी से पढ़ने को कहते थे कोई लेसन ,

अंतिम बेंच तक आते आते लेसन ख़त्म हो जाता था।

 

किस्सागोई के तमाम हिस्से ,

इन्ही बेंचो में बनते थे ,

बदलाव के विचार यही पनपते थे।

 

वह अंतिम बेंच , महज एक बेंच नहीं थी

क्रांति स्थल था ,

खाली समय में सबका वही अड्डा था।

 

शोध करो तो पता लगता है ,

अंतिम बेंच पर बैठने वाले निठ्ठले , नकारा या कमजोर नहीं थे ,

असल में , दुनिया बदलने वाले यही बच्चे थे ।

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