Showing posts with label school days. Show all posts
Showing posts with label school days. Show all posts

Wednesday, December 9, 2020

अंतिम बैंच


वो कक्षा की अंतिम पँक्ति के बैंच ,

सबको ही लुभाते थे ,

आज़ादी थी वहाँ , किस्से तमाम बनते थे।

 

जब पढ़ाया जा रहा होता था ,

इतिहास का कोई महत्वपूर्ण पाठ ,

आँखे उनीदी सी हो जाती थी।

 

जब सुलझाया जा रहा होता था ,

गणित का कोई सवाल ,

आँखे बाहर मैदान में गड़ी होती थी।

 

जब विज्ञान शिक्षिका बताती थी ,

न्यूटन के नियम ,

वहाँ से सब पर नजर जाती थी।

 

जब अंग्रेजी के शिक्षक ,

बारी बारी से पढ़ने को कहते थे कोई लेसन ,

अंतिम बेंच तक आते आते लेसन ख़त्म हो जाता था।

 

किस्सागोई के तमाम हिस्से ,

इन्ही बेंचो में बनते थे ,

बदलाव के विचार यही पनपते थे।

 

वह अंतिम बेंच , महज एक बेंच नहीं थी

क्रांति स्थल था ,

खाली समय में सबका वही अड्डा था।

 

शोध करो तो पता लगता है ,

अंतिम बेंच पर बैठने वाले निठ्ठले , नकारा या कमजोर नहीं थे ,

असल में , दुनिया बदलने वाले यही बच्चे थे ।

Wednesday, December 26, 2018

नवोदय तुझे प्रणाम




ऐ मेरे स्कूल तुझे शुक्रिया नहीं कहूंगा ,
क्यूंकि तुम मुझसे अलग कभी हुए ही नहीं ,
तुझे ही जीता हूँ मैं आज भी ,
मन तो तेरे आँगन छोड़ आया था तभी। 

तेरी आँगन की मिटटी की महक ,
आज भी याद है मुझे ,
तेरी दीवारों पर मेरे लिखे शब्द ,
पता है मेरी याद में छुपाये है कही। 

मेरी शैतानियों को याद कर ,
सिसकता है तेरा रोम रोम भी ,
मेरी खिलखिलहाट गूंजती है ,
तेरे गलियारे में आज भी। 

हाँ , ज़िन्दगी के सफर में बहुत आगे निकल गया हूँ ,
तेरे नाम की विरासत जो लिए चल रहा हूँ ,
बढूंगा और आगे बढूँगा ,
सीखा तेरे आँगन से ही। 

मगर , ये तुझे भी पता है ,
और मुझे भी ,
हम दोनों कभी न अलग हुए थे , न होंगे
बस तू मेरी यादों को संभाले रखना ,
मैं तेरे नाम का परचम लहराता हूँ कहीं। 

बस तेरे जर्रे जर्रे को प्रणाम करना चाहता हूँ ,
नमन हर कण कण को करता हूँ ,
एहसानमंद हूँ तेरा हर पल ,
बस खुद को ' नवोदयन ' करना चाहता हूँ। 


Saturday, December 1, 2018

मेरे स्कूल की ईमारत



खंडहर हो गया बचपन ,
बस कुछ निशान बाकी है ,
नवनिर्माण के लिए देखो ,
एक इतिहास दफ़न हो गया। 

ये दीवारे जो कभी बोलती थी ,
ये गलियारा जो गुंजायमान था ,
इन खम्बो ने सिसकियाँ सूनी थी कभी ,
इन दीवारों की सेल्फो में किताबे सजी थी। 

जमींदोज हो गयी ये ईमारत ,
जो कभी हमारे लिए महल हुआ करती थी ,
जर्रे जर्रे पर लिखी हुई थी हमारे सपनो की कवायद ,
आज सुनसान अपने हालात पर रो रही थी। 

लेकिन ये तो शास्वत सत्य है ,
एक न एक दिन इसे ढहना ही था ,
नव निर्माण के लिए रास्ता देना ही था ,
एक इतिहास बनना ही था। 

शुक्रिया और नमन जर्रे जर्रे को ,
खुद ढहकर हमें बना दिया ,
हमारे सपनो को पूरा करते करते ,
देखो पत्थर भी गिरकर हमारे दिल में "घर " कर गया।


फोटो आभार - ओम , ज न वि भूतपूर्ण छात्र