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Wednesday, March 18, 2026

चैत्र प्रतिपदा - नूतन वर्ष


शीत की कठोर धारा अब थम सी गई,

धरती के आँगन में फिर हँसी खिल गई।

वृक्षों के तन पर नव पल्लवों की चादर,

फूटे हैं कोंपल बन उमंगों के झरने अंदर।


मधु-गंध से भरा है आलोकित आकाश,

गूँज रहे हैं पंछियों के स्वर, मीठे सुवास।

स्नेह से भिगोता हर कण, हर शाख,

मानो कहता हो  "जीवन की नई आस !"


समृद्धि का संदेश लाए यह श्रीमान् मास,

भर दे प्राणों में अनुराग और उल्लास।

प्रतिपदा का प्रभात नव स्वप्न जगाए,

नववर्ष नहीं, नवजीवन मुस्काए।


हर कली बने कविता, हर पवन बने गान,

चैत्र में प्रकृति रचती अपना नया विधान।

जहाँ हर जीव में फिर विश्वास जगता है,

वहीं मानव मन पुनः प्रेम से भरता है।