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Wednesday, March 18, 2026

चैत्र प्रतिपदा - नूतन वर्ष


शीत की कठोर धारा अब थम सी गई,

धरती के आँगन में फिर हँसी खिल गई।

वृक्षों के तन पर नव पल्लवों की चादर,

फूटे हैं कोंपल बन उमंगों के झरने अंदर।


मधु-गंध से भरा है आलोकित आकाश,

गूँज रहे हैं पंछियों के स्वर, मीठे सुवास।

स्नेह से भिगोता हर कण, हर शाख,

मानो कहता हो  "जीवन की नई आस !"


समृद्धि का संदेश लाए यह श्रीमान् मास,

भर दे प्राणों में अनुराग और उल्लास।

प्रतिपदा का प्रभात नव स्वप्न जगाए,

नववर्ष नहीं, नवजीवन मुस्काए।


हर कली बने कविता, हर पवन बने गान,

चैत्र में प्रकृति रचती अपना नया विधान।

जहाँ हर जीव में फिर विश्वास जगता है,

वहीं मानव मन पुनः प्रेम से भरता है।

Thursday, December 4, 2025

दिसंबर

 

सर्द शुरुआत हुई थी ,

सर्द ही अब समाप्त होगा ,

आलम - - दिसंबर ये है ,

जनवरी का लिया हुआ इक ,

अधूरा प्रण बरबस दिल पर ,

नोक की तरह चुभ रहा है। 

 

समझा रहा हूँ बार -बार ,

नये साल पर फिर दोहराऊँगा ,

यह साल तो बीत गया अब ,

कोशिश करूँगा अगले साल ,

प्रण को हरगिज निभाऊँगा ,

दिमाग हँस रहा है , कह रहा ,

मत करना कोई प्रण नये साल। 

Tuesday, December 26, 2017

कहानी - हर साल की

जनवरी आता है , नयी उम्मीदों को पंख लगाता है,  
फरवरी फर्र फर्र न जाने कब  बीत जाता है , 
मार्च सुहाना मौसम लेकर आता है, 
उम्मीदों को परवाज देते देते पहला तिमाही गुजर जाता है।    


अप्रैल में चहुँओर फूल खिल जाते है , 
मई में सूरज देवता आग बरसाते है , 
जून का महीना पसीना पोछने में बीत जाता है,   
आधा साल यूँ ही रीत जाता है।  

जुलाई में रिमझिम मानसून बरसता है , 
अगस्त में नदी - नालो में उफान होता है , 
सितम्बर नयी अंगड़ाई लाता है ,
साल के नौ महीने बीत गए - धीरे से कहता है।  

अक्टूबर में पेड़ो के पत्ते साख से झड़ जाते है , 
नवंबर में त्यौहार शुरू हो जाते है , 
दिसम्बर फिर सर्द हो जाता है , 
एक साल यूँ ही बीत जाता है।  

हर साल कुछ दे जाता है , 
हर साल कुछ ले जाता है , 
समय का चक्र है ,  
वक्त का पहिया चलता जाता है।   

Tuesday, December 19, 2017

कैलेंडर बदल रहा है


दीवार पर टंगा २०१७ का कैलेंडर , 
अब फड़फड़ा रहा है।  

जल्दी है उसको जगह खाली करने की , 
नए कलेवर में २०१८ आ रहा है।  

वक्त के आगे वो भी मजबूर है , 
यादो की पोटली बाँधे , अब उतर रहा है।  

उस कील को धन्यवाद कहिये , 
जो संभाले रखी थी इसको , 
अब उसी पर नए साल का , 
ये कैलेंडर चढ़ना है।  

आगे , बढिये - हर रोज़ ये कैलेंडर कहता है , 
खुद से काटकर एक नया दिन हमें देता है , 
यही नियति है शायद , 
वक्त यहाँ सबका बदलता है।  

Monday, December 28, 2015

मैं २०१५ हूँ, जाने से पहले कुछ कहना चाहता हूँ ...................





समय की मशाल अपने बड़े भाई २०१४ से लेकर मैं भी १ जनवरी को चला था !
सीने में ३६५ दिनों का समय आप सबके साथ बाँटने निकल पड़ा था !!

२६ जनवरी को राजपथ पर मोदी के साथ बराक ओबामा को बैठा पाया !
राजपथ पर नए भारत के उदय को अपनी आँखों से सराहा !!

फरवरी में भारत की राजनीती में एक बड़ा बदलाव आया !
केजरीवाल नाम का शख्श दिल्ली में भूचाल लाया !!

मार्च में युगपुरुष अटल बिहारी बाजपेई को भारत रत्न मिलने से मुझमे भी जोश आया !
अप्रैल में नेपाल  भूकंप के कहर से खुद को नहीं बचा पाया !!

मई और जून में सूर्य देवता का प्रकोप भारी था !
हर जगह मेघो के बरसने का इन्तजार था !!

जुलाई में कही घनघोर बारिश और कहीं सूखा था !
" डिजिटल इंडिया" का स्लोगन मेरे सामने ही अस्तिव्य में आया था !!

अगस्त में कंप्यूटर जगत के लिए खुशखबरी थी !
विंडोज 10 हर कंप्यूटर पर छाने को तैयार था !!

सितम्बर में मंगल पर पानी होने की पुष्टि हुई !
एक नए गृह पर जीवन बसाने की उम्मीद जगी !!

अक्टूबर आते आते सीरिया संकट गहरा गया !
मानवता के दुश्मनो को देखकर मैं भी कांप गया !!

नवम्बर में पेरिस नरसंहार हुआ !
इंसान को इंसान का दुश्मन बनते देख मैं बहुत शर्मिंदा हुआ !!

दिसम्बर आते आते मैं भी थक गया !
अब मेरा समय भी पूरा हुआ !!

अब समय की मशाल अपने छोटे भाई २०१६ को देने की बारी हैं !
जैसा बीता आपके साथ , अच्छा रहा - थोड़ा ख़ुशी और थोड़ा गम साझा कर गया !!

याद रखना मेरी अच्छी यादो को , बुरी यादों को मिटा देना !
सुख चैन और अमन से जीना २०१६ के साथ , कभी याद आऊं तो बस मेरे ऊपर पड़ी धूल हटा देना !!