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Monday, June 1, 2020

सर्वश्रेष्ठ कविता



वह एक कविता लिखना चाहती थी ,
एक सर्वश्रेष्ठ कविता ,
कब से ,
बचपन में भी उसने सोचा ,
कलम भी उठायी ,
कुछ सपने लिखे ,
खुले आसमान के ,
नीले समंदर के ,
आजाद हवा के ,
फिर थोड़ा बड़ी हुई ,
तो वह फाड़ दी ,
फिर उसने कलम उठायी ,
जब वह ब्याह कर एक ,
अनजान से घर में गयी ,
अब उसने लिखा ,
प्यार का सपना ,
सपनो का घर ,
और छुपा दी वो कविता ,
फिर हाथ लगी वो कविता उसके ,
पढ़ी उसने दो चार बार जी भरकर ,
फिर तोड़ मोड़कर ,
डाल दी रद्दी के टोकरे पर ,
सालो बाद उसको फिर फुर्सत मिली ,
जब वो फिर से तनहा थी ,
सोचा उसने ,
आज लिखती हूँ वो कविता ,
जिसे वह लिखना चाहती थी उम्र भर ,
अब उसके पास शब्द भी थे ,
अनुभव भी था ,
भाव भी थे ,
लेकिन चार पंक्तियों से ,
आगे बढ़ पायी ,
लिखना बहुत कुछ चाह रही थी ,
मगर शायद लिखने में ,
वो पल ढूंढ रही थी ,
जो उसके अपने थे ,
वह तो वही लिखना चाह रही थी ,
मगर जाने कुरेदने पर भी ,
उसको वो नहीं मिल रहे थे ,
लगता है वो कविता अधूरी ही रह जायेगी ,
वो कविता जो सर्वश्रेष्ठ हो सकती थी ,
लेकिन चार पंक्तियों से ,
आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही थी ?
और वह कलम हाथ में पकडे ,
शून्य में जाने क्या झाँक रही थी ?
उसने बस अभी ये लिखा था , 
खुले आसमान की वो आजाद नन्ही सी परी , 
समेटना चाहती थी - समंदर को अपने आँचल में , 
हवाओ को अपने जुड़े में गुथकर , 

फूलो सा महकना और चिड़ियों सा उड़ना चाहती थी।  

Monday, March 7, 2016

नारी शक्ति



नारी शक्ति अपरम्पार , तुझसे ही जीवन आधार ! 
तू ही दुर्गा , तू ही काली - तेरे रूप हजार !!

तू शक्तिस्वरूपा , धैर्यमूर्ति , त्याग का हैं पर्याय !
प्यार की परिभाषा तुझसे , रिश्तो को देती हैं आयाम !! 

एक जीवन में कई जीवन जीती हैं एक नारी !
अपने दुःखो को भूलकर मुस्कराती हैं एक नारी !!

माँ रूप में जगतजननी , पत्नी रूप में पथ प्रदर्शक !
बहन रूप में स्नेह की छाया , बेटी रूप में कुल की इज्जत !!

शब्दों की अपनी सीमा हैं , तेरी महिमा उससे परे !
नारी को जो सम्मान न दे , उसका जीवन  नरक तले !!

नारी शक्ति अपरम्पार , तुझसे ही जीवन आधार ! 
तू ही दुर्गा , तू ही काली - तेरे रूप हजार !!