Thursday, August 26, 2010

जीवन एक सागर..ज़िन्दगी एक नाव !

जीवन एक सागर..


ज़िन्दगी एक नाव,

हम हैं केवट और हमारा संघर्ष उसकी पतवार,

पतवार संभाले हम भी चल रहें हैं जीवन सागर में,

और करोडो लोग हमारे साथ.

न जाने कहाँ किनारा हैं इस सागर का,

किसी को भी नहीं हैं इसका एहसास.

किसी की नाव गोते खा रही ,

किसी को लहरों का मिल रहा हैं साथ.

कोई लेकर चल रहा अपनों को लेकर साथ,

कोई अकेला ही चप्पू चला रहा और कर रहा मंजिल की तलाश.



हर एक का बस एक लक्ष्य ,

जाना हैं इस सागर के पार,

कोई सीधी रखता हैं पतवार,

कोई हवायो के रुख को देख कर चल रहा अपनी चाल.

कोई तेज चप्पू चलता ,

कोई रखता अपनी मंद चाल.



कितने पीछे छूट रहे इस सफ़र पर,

कितनो का मिल रहा हैं साथ.



जीवन सागर में ज़िन्दगी नाव,

करती जाती कितने पड़ाव पार.



जारी हैं अनंत काल से ये सफ़र ,

पता नहीं कितनो ने पार किया ये सागर,

चलो चलो , आगे चलो ....

शायद हम भी हो जाए उस पार.

Friday, August 20, 2010

चौथा पड़ाव......समय सबसे बलवान

समय का चक्र अपनी गति से घूमता जाता हैं,
कभी सुख , कभी दुःख हर एक को दे जाता हैं.


हर ख़ुशी में ये बात याद रखो, ये पल भी बीत जायेगा !
समय का चक्र हैं, कभी भी पल बदल जायेगा.


दुःख के दिन जरा लम्बे लगते हैं ! घाव जरा धीरे सूखते हैं.
सुख के दिन जरा जल्दी बीतते हैं ! ज़िन्दगी के ये दो पहलू चलते रहते हैं.


समय अपनी गति से चलता रहता हैं !
न वो किसी के लिए रुकता हैं और न अपनी चाल मंद करता हैं.


उसको लिए सब बराबर हैं जगत में, वो किसी के लिए कोई फर्क नहीं करता हैं !
किसी को घाव , तो किसी को मरहम देकर रेत की तरह हर एक की मुट्ठी से फिसलता हैं.

Friday, July 23, 2010

तीसरा पड़ाव.........इच्छा का कोई अंत नहीं

" इच्छा का कोई अंत नहीं,

थोड़े से अब किसी का पेट भरता नहीं,

जो कुछ हैं उसमे अब किसी को संतोष नहीं,

और ज्यादा , ज्यादा की इस दौड़ का कही कोइ अंत नहीं.



जो हैं शायद वो कम हैं , और चाहिए !

मगर कितना चाहिए किसी को इसका पता नहीं.

सबकी की परेशानियों का शायद मूल यही.

और......... और......की इस अंधी दौड़ में,

ज़िन्दगी हर वक़्त सिसकती रही. "

Thursday, July 15, 2010

What is True Relationship?

A boy and a girl were playing together. The boy had a collection of marbles. The girl had some sweets with her. The boy told the girl that he will give her all his marbles in exchange for her sweets. The girl agreed.


The boy kept the biggest and the most beautiful marble aside and gave the rest to the girl. The girl gave him all her sweets as she had promised.

That night, the girl slept peacefully. But the boy couldn't sleep as he kept wondering if the girl had hidden some sweets from him the way he had hidden his best marble.


Moral of the story: If you don't give your hundred percent in a relationship, you'll always keep doubting if the other person has given his/her hundred percent.. This is applicable for any relationship like love, employer-employee relationship etc., Give your hundred percent to everything you do and sleep peacefully.

( I Don’t know who wrote this story, but one of my friend forwarded it to me and I really like it to share it with all my readers)

Wednesday, July 7, 2010

दूसरा पड़ाव ......अंतर्मन की यात्रा .............

खुद पर भरोसा ज्यादा हो गया हैं,
दुसरो से उम्मीदे करना बंद कर दिया हैं .
जीवन पथ के इन रास्तो को ,
अकेले नापने की कवायद शुर कर दी हैं.

मेरे अन्दर खुद खुदा का अंश हैं,
"अहम् ब्र्ह्मष्मी "मंत्र की महता समझ आ गयी हैं.
लेकर साथ अपने अर्धांगिनी और बिटिया को,
जीवन युद्ध में यात्रा अपनी शुरू कर दी हैं.

न किसी से कोई बैर , न किसी से कोई गिला शिकवा,
जीवन पथ के अनजाने सफ़र में हर मुमकिन कोशिश शुरू कर दी हैं.
जीतना हैं इस जंग को हर हाल में ,
मन में ठान ली हैं.

निराशा के बादलो को अपनी उम्मीदों के सूरज से छठा दिया हैं,
विश्वास और संकल्प से हर परिस्थिति से मुकाबला करना हैं.
इश्वर के दिए इस वरदान "जीवन" को,
हर हाल में सार्थक करना हैं. 

Monday, July 5, 2010

पहला मील का पत्थर.............

पीछे मुड़कर देखने की आदत से अब तौबा कर ली हैं.
यादो को बाट  कर, अच्छी यादे सारी गठरी में भर ली हैं.
बुरी यादो को  तिलांजलि दे दी हैं.

जब से निकला हूँ अंतर्मन यात्रा पर,
सोचता हूँ दुनिया उतनी बुरी नहीं हैं.

दुसरो की कमियाँ खोजने से पहले ,
अपनी गिरेबान झाकने की हिम्मत आ गयी हैं.

लगता हैं अब सारा जहाँ मेरे लिए हैं.
एक चेहरे को खोजो, हजार अच्छे चेहरे बगल में ही खड़े हैं. 

अंतर्मन की इस यात्रा में , मैंने बुराईया निकलना छोड़ दिया हैं.
खुद की खोज में एक मील का पत्थर शायद मैंने छू लिया हैं.

Thursday, July 1, 2010

तलाश ..........

निकल पड़ा हूँ खुद को ढूँढने,
अंतर्मन को अपने टटोलने,
हर रोज़ पूछता हूँ खुद से सवाल,
आज कितनी की तुने खुद की तलाश,

यु ही तो रचा नहीं होगा खुदा ने मुझे,
सौंपा होगा कुछ न कुछ नेक काम.
बस उसी अंतर्मन की यात्रा को,
शुरू हो गया हैं मेरा अभियान.
 
 
न कोई गेरुआ वस्त्र, न कमंडल हाथ में ,
न कोई मंदिर मस्जिद के चक्कर ,
दिल मैं रखकर उस खुदा को,
रोज़ सांसारिक जीवन जी कर,
शुरू कर दी अपनी तलाश.........

Thursday, June 24, 2010

मैं कौन हूँ और मेरा मकसद क्या. ?

मैं कौन हूँ, मुझे मुझसे मेरी पहचान करा दे.
भीड़ में खड़ा हूँ, मैं सबसे अलग कैसे हूँ,
ऐ मेरे खुदा मुझे इतना तू बतला दे.
मैं जानता हूँ, तुने मुझे यू ही नहीं भेजा होगा धरती पर,
तू मुझे मेरे मकसद में लगा दे.

यू बेमकसद ज़िन्दगी गुजारी नहीं जाती,
कुछ कर गुजरने की चाहत जीने नहीं देती ,
मगर यू ही वक़्त गुजरता हैं हर रोज़,
मंजिल कौन सी हैं , कहाँ हैं इसका पता नहीं.

हर रोज़ टटोलता हूँ अपने आप को ,
मैं कौन हूँ और मेरा मकसद क्या.

Friday, June 11, 2010

मेरी विवशता .............

पिछले दो हफ्तों से कोई कविता नहीं लिख पाया इसलिए माफ़ी चाहता हूँ.


कोई विषय ऐसा दूंढ नहीं पाया जिस पर शब्दों का जाल बून सकू.

दो चार पंक्तियों से आगे नहीं बड पाया ,

विषय बहुत हैं मन करता हैं सब पर लिखता जाऊ,

मगर कुछ ऑफिस की टेंशन, कुछ और की चिंता,

शब्दों को पिरोने नहीं दे रही,

सुकून से सोच सकू कुछ, हालात कुछ ऐसे बन नहीं रहें.

कविता लिखने के लिए अभी कुछ भी नहीं.


मगर शब्दों की कुलबुलाहट मुझे चैन से रहने भी नहीं देगी,
भावनाओ का ज्वार लेकर में फिर वापस आऊंगा कुछ शब्दों को फिर सार्थक करूँगा.

Tuesday, June 1, 2010

बहन की विदाई ..........

अपनी बहन को शादी के दिन विदा करते हुए,

कितना अपने दिल को समझाया था !

आँखों की कोरे गीली नहीं होने दूंगा ,
रह रह कर मन को समझाया था !

मगर जब विदाई की बेला आई ,
तो खुदबखुद आंसू छलक आये !

उसके साथ बिताये वो हर पल आँखों में तैर गए.
दुनिया की रीत के आगे हम भी झुक गए !

हमारी छोटी सी गुडिया हमें छोड़ के चली गयी ,
हम आँखों में पानी लिए मुस्कराते रह गए !

बचपन से उसकी जवानी तक हम उसके रक्षक बने रहे,
एक दिन फिर एक अनजान से सफ़र पर उसको अकेला विदा कर गए.

(यह कविता समप्रित है सब भाई बहनों को, जिनके बीच स्नेह और प्यार कहा अटूट बंधन होता हैं. )

Monday, May 17, 2010

बेबसी ...........

अपने पापा की किसी बात पर दादी को रोते हुए देखकर,
पोता अपनी दादी के पास गया और बोला,
"दादी ! आपको पापा ने क्यूँ डाटा?
मम्मी तो रोज़ पापा से झगड़ती रहती हैं,
एक के बाद एक गलती करती हैं,
उनको तो पापा नहीं डाटते?"
दादी ने जवाब दिया
" बेटा, तेरी मम्मी पड़ी लिखी, समझदार हैं,
  तेरे पापा उसपर तो गुस्सा नहीं होते हैं,
  सारी भड़ास मुझ पर निकाल देते हैं.
  मैं फिर भी उससे नाराज़ नहीं होती
 क्यूंकि वो मेरा बेटा हैं
 हर माँ की नियति यही हैं,
 पाला पोसा बेटा एक दिन किसी को सौंप देना हैं,
 और फिर यु ही घुट घुट कर जीना हैं." 

Saturday, May 15, 2010

कब आओगे ..........

(पाठको के अनुरोध पर अपनी ही पुरानी रचना को फिर से पोस्ट कर रहा हूँ. )

उसका आँगन गूजता था बच्चों के शोर से , वो दोड़ती थी बच्चों के पीछे

शोर से आसमान गूजता था .

बच्चों के साथ उस माँ का वक़्त यु ही गुजरता था,
माँ सोचती थी कब बच्चे बड़े होंगे और उसके सपने भी पूरे होंगे !

सोचते सोचते बच्चे कब बड़े हुए, उसको भी पता ना चला,
एक - एक कर सब निकल गए घर से एक दिन, उसका आँगन सूनसान हुआ!

आज वो संभालती है हर याद को , निहारती हैं अपनी दीवारों को,
तलाशती हैं हर जगह को जहाँ से उसके बच्चों की यादे जुडी पड़ी हैं.

वो यादों के सहारे ही आँखों के आँसू पीकर चुपचाप ज़माने से लड़ती हैं.
आती हैं कोई खबर दूर परदेश से बच्चों की तो आसूँ छलका देती हैं !

रात को सोने से पहले हर रोज़ प्राथना करती हैं ,
ना परेशां हो मेरे बच्चे, अपने बच्चों के बिछुडन का दर्द सहती हैं.

करती हैं कभी सवाल ज़िन्दगी से , फिर खामोश हो जाती हैं.
नियति को यही था मंजूर , पल्लू ढाके सो लेती हैं.

लगाती हैं जब हिसाब किताब ज़िन्दगी का, खोने का पलडा भारी पाती हैं.
हर रोज़ फिर आस में जीती हैं, उसके बिछड़े एक दिन तो आयेंगे.

काश कुछ ऐसा कर दे भगवान ,किल्कारिया फिर सुना दे भगवान, भर दे फिर उसका आँगन,
अब जहाँ सूनेपन की आवाज़ भी सुनाई देती हैं.

वो बुडी माँ का दर्द ना जाने भगवान भी नहीं सुनता हैं,
वो पथराई आँखों से आज भी हर जगह अपने बच्चों के निशान खोजती हैं.

बच्चे जब तक दर्द समझे , वो बिछुरन की आदी हो जाती हैं.
अब उसको कोई दर्द नहीं सालता , वो बैरागी हो जाती हैं.

मत करना भगवान किसी माँ को उसको बच्चों से दूर,ये सजा जीते जी मरने की हैं,
तेरा रूप हैं वो धरती पर , ये सजा हरगिज मंजूर नहीं हैं.

Friday, May 14, 2010

कुछ दिन .........................

कभी हालात ऐसे हो जाते हैं,

शब्द भी बयान करने के लिए छोटे हो जाते हैं,

दिमाग भी कुछ सोचने के लिए मना कर देता हैं,
दुनिया भी कुछ परायी सी लगने लगती हैं,

सब कुछ उलझा उलझा सा,
ज़िन्दगी अपनी होकर भी अपनी नहीं लगने लगती हैं.

तब कुछ इस तरह से दिल से आवाज़ आती हैं,
ऐ खुदा, क्यूँ मेरे साथ ये सब हो रहा हैं,

खुदा जवाब देता हैं - सब्र कर,
तेरे जो अच्छे दिन आने वाले हैं,

उसकी अहमियत को समझाने को कुछ दिन ऐसे भी बिताने पड़ेगे,
समय हमेशा एक सा नहीं रहता,
बस उसी को समझाने के लिए ये वक़्त भी जरुरी हैं.

Thursday, May 6, 2010

One thought which keeps me positive everyday...............

"ज़िन्दगी में महत्वपूर्ण यह नहीं हैं की आज हम कहाँ पर खड़े हैं, महत्वपूर्ण यह हैं की हमारे आज के प्रयास हमें किस दिशा में ले जा रहें हैं क्यूंकि हमारा आज , हमारे बीते हुए कल की देन हैं जो हम अब बदल नहीं सकते और हमारा आने वाला कल हमारे आज की देन होगा. आज से ही जागिये और आने वाले कल के बारे में सोचिये की हमें कहाँ जाना हैं और हमारी मंजिल क्या हैं? "

"This is not very much important that where we are today , but this is very important that in which direction our today's efforts are aligning because our tommorrow will be the result of our today and our today is the result of our yesterday. Forget what happened in the past, awake today and start doing the things to make your tommorrow."

Monday, April 26, 2010

मैं और मेरी ज़िन्दगी .....................

ज़िन्दगी और मेरी कहासुनी चलती रहती हैं,
कभी वो मुझे कोसती हैं , कभी में उसको.
कभी वो मुझे शाबाशी देती हैं, कभी मैं उसको.
लुकाछिप्पी  का खेल हम बरसो से खेल रहे हैं.
न वो हारने को तैयार और न मैं.
कभी वो आगे निकल जाती हैं तो कभी मैं.
मिल ही जाते हैं थोडा दूर चल कर हम फिर,
कभी वो मेरा मुहं चिडाती हैं  और कभी मैं.
दोनों को पता हैं साथ साथ ही चलना हैं हमें,
एक के बिना दूसरे का गुजारा नहीं हैं,
फिर भी एहमियत समझाने को ,
कभी वो आगे निकल जाती हैं कभी मैं.
दोनों की मंजिल एक हैं फिर भी,
कभी वो जल्दबाजी दिखाती हैं और कभी मैं.
थक कर जब हम चूर हो जाते हैं कभी,
कभी वो मुझे संभालती हैं और कभी मैं.
इसी तरह से फिसलता हैं वक़्त हमारी मुट्ठी से,
कभी वो बेबसी से मेरा मूंह ताकती और कभी मैं.