Friday, September 18, 2026

सार

 

गोया हसरतों की दौड़ है ,

उम्मीदों का तो दम फूल रहा है ,

सपनों की फेहरिस्त लंबी है ,

और शरीर बोल रहा है। 

 

समय और अक्ल की भेंट ,

सही समय पर होती तो ,

शायद कुछ और बात होती ,

अक्ल का अब अचार डल रहा है। 

 

दिल तो अब भी जोर मारता है ,

लाचार तो घुटनों का दर्द करता है ,

ख्वाइशें अकेले तो आती नहीं ,

तजुर्बों का सार संभाल लेता है। 

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