गोया हसरतों की दौड़ है ,
उम्मीदों का तो दम फूल रहा है ,
सपनों की फेहरिस्त लंबी है ,
और शरीर बोल रहा है।
समय और अक्ल की भेंट ,
सही समय पर होती तो ,
शायद कुछ और बात होती ,
अक्ल का अब अचार डल रहा है।
दिल तो अब भी जोर मारता है ,
लाचार तो घुटनों का दर्द करता है ,
ख्वाइशें अकेले तो आती नहीं ,
तजुर्बों का सार संभाल लेता है।
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