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Saturday, June 28, 2025

घर

 


जिसके किसी भी कोने में सुकून आ जाये ,

जिसके दीवारों से अपने बचपन की खुशबू आये ,

जिसके आँगन में अभी भी बचपन अटका हो ,

जिसके जर्रे जर्रे पर माता -पिता का अक्स नजर आये ,

जिसके हर कमरे की एक कहानी हो ,

जिसके दरख्तों पर छुपी कोई निशानी हो ,

जिसकी अलमारियों में बंद कई यादें हो ,

जिसकी दहलीज पर माँ का मन बसता हो ,

जिसकी फुलवारियों पर पिता की छाया हो ,

जिसकी नींव पर पूर्वजों का आशीर्वाद हो ,

वो " घर " होता है , बाकी तो  मकान होते है। 

Sunday, January 19, 2025

घर और माँ


 जब तक माँ थी , 

मेरा भी एक घर था , 

जब तक माँ थी , 

मेरे ऊपर आसमां था ,

जब तक माँ थी , 

पैरों तले मेरी भी जमीं थी , 

जब तक माँ थी , 

मैं बहुत लायक था , 

अब माँ नहीं है , 

मैं एक मकान में रहता हूँ ,

आसमां में कई सुराख़ है ,

गिरता पड़ता रहता हूँ , 

बहुत उबड़ खाबड़ जमीं पर,

और दुनिया ने मुझपर , 

नालायक का ठप्पा लगा दिया,

मेरा आधा शायद , 

माँ के साथ ही चला गया।