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Saturday, June 28, 2025

घर

 


जिसके किसी भी कोने में सुकून आ जाये ,

जिसके दीवारों से अपने बचपन की खुशबू आये ,

जिसके आँगन में अभी भी बचपन अटका हो ,

जिसके जर्रे जर्रे पर माता -पिता का अक्स नजर आये ,

जिसके हर कमरे की एक कहानी हो ,

जिसके दरख्तों पर छुपी कोई निशानी हो ,

जिसकी अलमारियों में बंद कई यादें हो ,

जिसकी दहलीज पर माँ का मन बसता हो ,

जिसकी फुलवारियों पर पिता की छाया हो ,

जिसकी नींव पर पूर्वजों का आशीर्वाद हो ,

वो " घर " होता है , बाकी तो  मकान होते है। 

Monday, September 18, 2023

गाँव और शहर

 

बहुत खूबसूरत दिखते है ये शहर ,

आसमां से बातें करती इमारतें ,

चौड़ी सड़कों पर सरपट भागती ,

लम्बी - चौड़ी , चमाचम गाड़ियाँ,

खिलते मुस्कराते बाज़ार गुलजार ,

लोगों के झुण्ड ही झुण्ड ,

सब अपने आप में व्यस्त ,

सजावट करीने की, फैशन हजार ।

 

एक मेरे गाँव का बाजार ,

मिलकर दूकान बस चार ,

फुरसत ही फुर्सत सबको ,

पूछ लेते है पूरा हाल समाचार ,

न भी हो पल्ले में , कल दे देना ,

सामान बैग में ठूँस देते है दूकानदार ,

चाय की एक छोटी सी टपरी पर ,

चार लोग ही नाप डालते है सारा संसार। 

 

अच्छा शहर भी है , गाँव भी सुन्दर,

न एक दूसरे से कमतर , न बेहतर ,

किसी को सुकूं गाँव में ,

किसी का सपना है शहर ,

दौड़ना सब जगह ही है पेट खातिर ,

अंतर बस इतना है ,

शहर चाहता है अब गाँव सा सुकून ,

और गाँव हो जाना चाहता है शहर। 

 

Thursday, November 30, 2017

उने रे , साल मी एक बार ( (कुमाउँनी कविता)



उने रे , साल मी एक बार 
खोल दिए आपुण घरे द्वार, 
बाँझ झन पड़िए दिए , 
जरूर अये साल मी एक बार।  

खौ मी अब सिसूण जाम गो , 
भेतर हेगी चौबाट , 
पाखेक पाथर चोर ही ल गो , 
बल्लियों में पड़ गे दरार।  

त्यर निशाणी उसकये छीन , 
करनि रोज़ त्यर इंतजार , 
फल - फूलो बोठो में बानर भे गी , 
लुके री मीन त्यर लीजी अनार।  

तु , जा ल छ , खूब तरक्की करिये , 
आपुण गौ -गाड़ नाम रोशन करिये ,
बस एक विनती छू , 
आपुण गौ- गाड़ झन भूलिए।  

उने रे ईज़ा , साल मी एक बार 
खोल दिए आपुण घरे द्वार, 
बाँझ झन पड़िए दिए , 
जरूर अये साल मी एक बार।