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Wednesday, December 25, 2019

न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है





जब कभी अपनी हारो की सोचता हूँ , 
उस एक जीत के आगे सब फीका नजर आता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है। 

कभी शिकायतों का पुलिंदा जब खोलूं  , 
रहमतो का पलड़ा ज्यादा भारी नजर आता है  ,
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

छाया हो घुप्प अँधेरा राहो में , 
टिमटिमाता कोई जुगनू नजर आता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब देखता हूँ मानवता पर संकट के बादल , 
किसी फ़रिश्ते का किस्सा पढ़ने में आ जाता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

देकर कभी थोड़ा निराशा के बादल , 
फिर किरणों से आकाश भर देता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब भी उठने लगता है विश्वास उस पर , 
उसका कोई चमत्कार आँखों के आगे आ जाता है  , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

रिश्तो से जब मन भर भर जाता है , 
कोई अजनबी सा रहनुमा बन खड़ा मिलता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब कभी अपने वजूद पर संशय   ,
उम्मीदों , दुआओं और आशाओ का अम्बार नजर आता है, 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है। 

उठ ही जाती है कलम बार बार , 
जब भावनाओ का ज्वार उठता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  



फोटो आभार - उमेश मेहरा ( मेरा छोटा भाई ), इसी छायाचित्र ने मुझे ये पंक्तियाँ लिखने के लिए विवश किया।  

Friday, September 22, 2017

युग कवि - श्री रामधारी सिंह दिनकर को शत नमन।

मानव अपनी इच्छाशक्ति से , पहाड़ भी डिगा सकता हैं , रसातल समंदर के जाकर , मोती भी पा सकता हैं। गर ठान ने इक बार मन में , सभी चुनौतियाँ छोटी हैं , गर कदम उठा ले एक बार , सात लोक भी नाकाफी हैं। पहचान खुद को , अपनी राह बना , चलचलाचल फिर , कर्मो से खुद को ' महा मानव बना'। कह गए 'दिनकर ' बार बार ये , दीप्तिमान , हो प्रज्वल्लित , जीवन एक आहुति है , प्राणो में अपने तू ज्योत जगा। (हिंदी कविता के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के जन्मदिन - २३ सितम्बर पर श्रदांजलि स्वरुप लिखी चंद पंक्तियाँ)

Thursday, December 22, 2016

कवि और कविता

जो देखता हूँ , वो लिखता हूँ !
शब्दो को आड़े तिरछे - आगे पीछे पिरोता हूँ !!

जो महसूस होता हैं !
शब्दो के जरिये बयां करता हूँ !!

अपने को कवि नहीं कहता  !
फिर भी कविताये लिखने का प्रयास करता हूँ !!

खालिस कवि तो विरला होता हैं !
वो शब्दो को मोती बना कविता को पिरोता हैं !!

कल्पना को अपनी शब्दो में जीवंत करता हैं !
एक  एक शब्द से पूरा सार गढ़ता हैं !! 

कभी भावनाओ के अतिरेक में बह कर विद्रोही सा लगता हैं !
कभी किसी विषय पर आँखों के कोरे गीली कर देता हैं !!

कवियों का संसार भी अजब हैं !
हर कोई दिल से यायावर और मस्तमौला हैं !!

हर चीज में उन्हें कविता सूझ जाती हैं !
ज़िन्दगी की  इस आपाधापी में भी  कलम बेबाक चलती हैं !!

Wednesday, October 5, 2016

बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं


झूठे को बढ़ावा , सच को अनदेखा करने का !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं      !!

देश के लिए शहीद होने वालो के लिए चुप्पी , देशद्रोही की मौत पर हंगामा  करने का !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं    !!

समाज को जो सुधारने चलता हैं उसके पीछे कोई नहीं , फरेबी और मक्कारो के पीछे भीड़ !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!

 माँ -बाप के सुझावों की अनदेखी , पराये लोगो की सलाह को बच्चो को लेते देखा हैं !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!  

परिवार के बीच एक छत के नीचे ख़ामोशी को पसरा देखा, फोन पर मायावी दुनिया में शोर होते देखा हैं !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!

विषय की जानकारी भले ही शून्य हो , मगर ताल ठोककर अपनी राय देते सुना हैं !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!

शेरो को झुण्ड में और गीदड़ो को दहाड़ते सुना हैं !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!

कर्मयोगी का तिरस्कार और कामचोरों को पुरुष्कार लेते देखा हैं !
बड़ा अजीब चलन चलते देखा हैं !!