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Monday, June 13, 2016

दौड़




'आनंद' इस संसार में लगी हुई दौड़ !
भाग रहे हैं सब बेतहाशा - पता नहीं  किस ओर !!

गरीब दौड़ रहा रोटी की खातिर , अमीर दौड़ रहा और अमीरी  की खातिर !
कोई दौड़ रहा  दौलत की खातिर , कोई दौड़ रहा और इज्जत की खातिर !!

मध्यम वर्ग किंकर्तव्यविमूढ़ सा हैं , उसे कुछ नहीं सूझ रहा !
थोड़ा हैं , और थोड़े के लिए वो भी जूझ रहा !!

सबकी दौड़ का मकसद अपना अपना , इंसानियत की खातिर कोई दौड़े, मुश्किल हैं ढूँढना !
इस दौड़ में कोई कुचल रहा , कोई कराह रहा और कोई डींगे हांक रहा  !!

लक्ष्य क्या हैं और कहाँ पहुँचना हैं ? यक्ष प्रश्न हैं किसी को नहीं पता हैं  !
आत्मा कचोटती हैं हर दिन , फिर भी अगले दिन दौड़ में शामिल होना हैं !!

हर कोई इस दौड़ में बस आगे - और आगे रहने का मंसूबा पाले हैं !
कुचले चाहे नैतिक मूल्य कितने ही , दौड़ में बस आगे रहना हैं !!

कुछ लोग इस अंधी दौड़ से किनारे हो गए हैं ,  जीवन के सच्चे अर्थ को समझ गए हैं !
जिंदगी  तो बस वही जी रहे हैं , बाकी सब दौड़ में दौड़े जा रहे  हैं !!