Wednesday, April 21, 2010

कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं..............

कौन कहता हैं दुनिया बुरी हो गयी हैं, अब भी इंसानियत बची हुई हैं.


हर गली चौराहे पर इमान का झंडा बुलंद किये कुछ लोग अब भी  खड़े हैं .

थोडा भ्रस्टाचार , थोडा बैमानी , थोड़ी घूसखोरी और थोडा अत्याचार हैं तो क्या हुआ , अब भी इस दुनिया में बहुत ईमानदार बचे हुए हैं.

माना अब रावणों की तादाद ज्यादा हो गयी हैं , कुम्भ्कर्नो की रात लम्बी हो गयी हैं .
मगर अब भी कुछ राम बचे हुए हैं , धनुष बाण लिए खड़े हैं .

रिश्ते - नाते बैमानी हो गए हैं , हर तरफ स्वार्थ का राज हो गया हैं.
मगर अब भी कुछ भरत चुपचाप जी रहे  हैं.

माना की हर तरफ घुप्प अँधेरा छाया हैं , रौशनी की दूर दूर तक उम्मीद नहीं हैं .
मगर अब भी कुछ लोग दीये लेकर हर तरफ बिखरे पड़े हैं .

ना उम्मीदी का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ हैं . बस थोडा अँधेरा घना हो गया हैं .
बस अब जल्द ही ये अँधेरा छटने वाला हैं . सुबह की पहली किरण छटा बिखेरने को तैयार हैं.

मशाल थामे कुछ लोग आगे बड़ चले हैं, ये अँधेरा कटने वाला हैं .
आ जाओ की अब तुम्हारा साथ चाहिए क्यूंकि इस कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं .

Wednesday, April 14, 2010

सांझ ....................


जन्म लिया एक घर में, उसको खुशियों से आबाद किया.

बचपन गुजरा जैसे तैसे , घरवालो को परेशान न किया.

सोचा आगे सब कुछ अच्छा होगा, फिर एक दिन अपना मायका छोड़ा.


पहुची एक नए जहाँ में, सबको फिर अपना समझा.

छोड़ दिए सब अपने सपने , किसी के सपनो को अपना लिया.

कब बीत गयी जवानी , पता भी नहीं चला.

जिंदगी की उलझनों में खुद को भुला दिया.

अपना परिवार , अपने बच्चे - जीवन इन सब पर कुर्बान कर दिया.

जीवन कब बीत गया, पता भी न चला.

जिनके लिए जीवन अर्पण किया, एक एक कर सब छोड़ चले .

जीवन के इस साँझ में मुझे अकेला कर गए.

आज उस डूबते सूरज को निहारती हूँ,  ज़िन्दगी की साँझ में कितनी अकेली रह गयी हूँ.

Tuesday, April 13, 2010

पहाड़ो की सैर ...... ( Let us Visit the Hills)

वो सामने हिमालय हैं, दूर दूर तक बिखरा नीला आसमान.

बादलो से अठखेलिया करते ऊँचे पर्वत, फल फूलो से लदे ये उपवन.

कल कल करती बहती नदिया और हरे भरे पेड़ो से भरे ये जंगल.

झरनों से बहता निर्मल पानी , अमृत जैसा इनका जल.

बहती ठंडी हवा देखो, करती मन को कितना शीतल.

बाहे खोले बुला रहा ये सुन्दर मंजर, बिना तुम्हारे ये सब बेकार.

माना की तुम बहुत व्यस्त हो, कुछ कमाने के चक्कर में मस्त हो.

फिर भी फुर्सत के कुछ पल तो निकालो , आकर मेरी गोद में खेलो.

फिर कहोगे " अगर स्वर्ग हैं धरती पर, तो हैं वो यही पर."

 
( यह कविता समप्रित हैं उन सब पहाड़ी निवासियों को जो रोज़ी रोटी के चक्कर में शहरो में बसे हैं और उन लोगो को जो पहाड़ो से प्रेम करते हैं )

Monday, April 12, 2010

अगले जन्म मोहे बी पी ओ की नौकरी मत दीजियो..........

घर वाले जब सोते हैं, मेरी सुबह तब होती हैं.
रात के अँधेरे में मेरी शिफ्ट शुरू होती हैं.
उल्लुओ की तरह रात रात बहर जागकर, हालत मेरी खस्ता हो गयी हैं.
अपने घर पर ही में पराया हो गया हूँ, पड़ोसियों के लिए में गुमशुदा हो गया हूँ.
फ़ोन पर बात करते करते अब कान भी घरघराने लग गए हैं.
अंग्रेजो से बात करते करते हिंदी भी भूल गए हूँ.
क्या करू ! इस नौकरी का, मम्मी की रोटी में भी बर्गर की खुशबू ढूँढने लगा हूँ.
अर्ज़ सुन ले ! भगवन मेरी - अगले जन्म इन बी पी ओ से छुटकारा दिला देना.
दिन की किसी नौकरी का मेरे लिए इंतज़ाम कर देना.

( यह कविता समप्रित हैं सभी लोगो को जो कॉल सेंटर में नौकरी करते हैं)

Friday, April 9, 2010

बेबसी ........

तंग आकर एक दिन उसने इस्तीफा लिख ही लिया,
चदने लगा ऑफिस की सीडिया ,
तब उसे अपने बच्चे की कही बात का ख्याल आया, "पापा मुझे इस महीने साइकिल दिला देना."
और माँ की कही बात याद आई, "बेटा ! तू ही सहारा हैं अब घर का" !
पत्नी का वो ताना याद आया, " कब खरीद के दोगे एक वाशिंग मशीन ?"
फिर बहन की शादी का ख्याल आया.
उठे कदम फिर रुक गए, ऊपर बढते कदम ठिटक गए !
वो वापस अपनी कुर्सी पे आ गया, फाईल्स  की ढेर में फिर खो गया.

Thursday, April 8, 2010

छोड़ आये हम वो गलियाँ ...............................

आँगन छूटा, गाँव छूटा , पीछे छूटा वो परिवेश !
छूट गयी बचपन की वो गलियाँ, जो गूंजता था हर रोज़ !
पीछे रह गयी सब वो यादों,  जब हम चल दिए थे इक रोज़ !
बेफिक्री के वो दिन अब कितने आते याद,
काश ! फिर लौट आते वो दिन जहाँ सिर्फ हमारा था राज !
चंद कागज़ के टुकडो को इकट्ठा करने के लिए,
क्या क्या खो दिया हमने आज आता हैं याद !
कहती हैं वो गलियाँ आज, आ जाओ मेरे प्यारो ,
फिर से करो हमें आबाद !
हम नहीं बदले आज भी, तुम कितने बदल गए हो आज !

Monday, March 29, 2010

आओ नयी शुरुवात करे.....................

कितनी बार दिल ने चाहा बदल लेते हैं चलो राह, उठे कदम न जाने कितनी बार थम गए !
शायद इसलिए हम जहा थे वही रह गए,हमारे साथी जिन्होंने हिम्मत की- कहाँ थे कहाँ पहुच गए.

शिकवा उनकी तरक्की से नहीं हैं, हम दिल से काम लिए और वो दिमाग की कहे सुनते गए.
उन्होंने हर अवसर को पहचाना , हम अवसर गवाते बदते रहें.

अब भी दिमाग कहता हैं, वक़्त अभी गुजरा नहीं .
जो बीत गया उसको भुला, चुन अभी भी अपनी राह.

और सरपट उस पर भाग,राह पकड़ ही लेगा एक दिन,
उस दिन होगा तुझको खुद पर नाज़.

हम सबकी यही कहानी हैं,आपबीती फिर सुनानी हैं.
क्यूँ न हम मिसाल बने, अपनी नज़रों में ही महान बने.

खुद फक्र कर सके अपनी ज़िन्दगी पर, अपनी कहानी खुद क्यूँ न लिखे.
आओ की अब भी वक़्त ठहरा हैं हमारे लिए, एक नयी शुरुवात करे.

भ्रमो के मायाजाल को काटे , खुद पर यकीन करे.
चुने अपनी राह वही , जो खुद को लगे सबसे सही.

Friday, March 26, 2010

रुकना नहीं , झुकना नहीं.

रुकना नहीं , झुकना नहीं.
मुड़ना नहीं, थकना नहीं.
रख अर्जुन सी नज़र लक्ष्य पर ,
और तुझे कुछ देखना नहीं .

डिगाए तुझे कोई कितना ,
रोड़े कितने अटकाए कोई .
रुख मोड़ना हैं हवायो का तुझे,
हर बाधा को हंस के सहना हैं तुझे.
हर मुस्किल को ठोकर मारता चल ,
लक्ष्य की तरफ कदम बदाता चल.

कोई रोके , कोई टोके ,
कोई चाहे कुछ भी कहे .
अपने दिल को समझाता चल,
अपनी धून पर बस चले चल चला चल.
कोई तेरा साथ न दे ,
कोई परवाह मत कर ,
अपने होसले को तलवार बना ,
हर मुश्किल को काटता चल.

यही दुनिया तुझे सलाम करेगी ,
जब तू मंजिल को पायेगा .
झुकेगी तेरी आगे ये दुनिया,
अपनी मेहनत का फल तू पायेगा.

Monday, March 22, 2010

रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी....

रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी,
कुछ रुलाती,कुछ हंसाती ज़िन्दगी.
धीरे धीरे मंजिल की तरफ बढ रही ज़िन्दगी,
कितनो को पीछे छोड़ते हुए,
कितने नए लोगो को अपना बनाती हुई,
रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी,
एक मंजिल को पा लिया तो,
दूसरी मंजिल ले कर तैयार खड़ी ज़िन्दगी,
हर रोज़ कही न कही फ़साये रखती हैं ज़िन्दगी.
जितना इसे समझो उतना उलझाती हैं ज़िन्दगी,
रफ्ता रफ्ता कट रही हैं ज़िन्दगी.

Wednesday, March 17, 2010

बड़ी उलझन हैं कैसे सुलझाऊ !

बड़ी उलझन हैं कैसे सुलझाऊ !
मन को क्या कह के समझाऊ !
सोचा क्या था ज़िन्दगी में !
हो क्या रहा हैं कैसे समझाऊ !
नौकरी से मिले कुछ फुरसत तो !
कही एकांत में जाकर कुछ सोचु !
बचपन बीते बरसो बीते गए !
जवानी के दिन भी बस यु ही कट रहे !
कल के अच्छे के चक्कर में,
बरसो न जाने कहा खो गए.
चाहकर भी अब वो दिन नहीं ला सकता ,
फिर दिल को ही समझाता हूँ !
जो हैं अभी तेरे पास उसी में खुश हो ले,
कल की फिक्र छोड़, बीते कल कI चोला उतार !
बस आज को जी ले.

Thursday, February 25, 2010

Every day is a gifted day............

When I do wake up in the morning,
I thanks to god to give me another day,
A new day for my life,
A new day to fulfill my dreams,
A new day to do a lot,
A new day to live more,
One more day to realize me,
I am the special,
I am his child.
………..When the day passed,
I again thanks to GOD,
For making my day,
For giving me experience,
For making me more wise,
For learning some good things,

How many days I had passed,
I have grown as a man,
But I always pray to GOD,
For making my each day,
This will keep me alive,
Every day and each day.

Friday, February 5, 2010

ज़िन्दगी को एक मिसाल बना...........

यूं तो बीत ही जाएगी ज़िन्दगी सबको पता हैं,
मगर फिर तेरे और औरो में अंतर क्या रह गया !
ज़िन्दगी जब मांगेगी हिसाब किताब कभी,
कुछ तो बताने लायक रहे तेरे पास.
कुछ न कर पाने का एहसास तब बहुत सताएगा,
ज़िन्दगी का ये अनमोल उपहार यूं ही व्यर्थ चला जायेगा.
कुछ तो कर के जा अभी भी वक्त ठहरा हैं तेरे लिए,
उम्र के किसी भी पड़ाव पर खड़ा हैं भले तू,
अपने सपनो को फिर से हवा लगा !
जो करने की तमन्ना दम तोड़ गयी सीने में,
उनको फिर पंख लगा.
मत सोच दुनिया क्या सोचेगी , लोग क्या कहेगे ?
अपनी ज़िन्दगी को एक मिसाल बना.

Thursday, January 21, 2010

मेरे तीन दशक ............

हिमालय की गोद में जन्मा, ऊँचे ऊँचे पहाड़ो के नीचे पला ,
ठंडी हवा के झोंके के अहसास के बीच , बेफिक्र मेरा बचपन गुजरा !
पढाई की खातिर फिर घर छोड़ा , घर से अलग हुआ ज़िन्दगी बनाने के खातिर,
फिर हमेशा से एक अलगाव सा रहा.
पढाई खत्म की एक बार फिर से लगा, फिर से बचपन जीयूँगा अपने गाँव में !
मगर भविष्य की खातिर शहर आना हुआ.
इन कंक्रीट के जंगलो से पाला पड़ा तो , समझ मे आ गया !
ज़िन्दगी के मायने जो सीखे थे कभी मम्मी की कहानियो में,
कथायो और हकीकत में फर्क समझ मे आ गया.
अब ज़िन्दगी की हकीकत ये हैं , न शहर के रहे और न गाँव के हम.
समझ नहीं आता क्यूँ भाग रहे हैं लोग यहाँ, सुकून का एक फुरसत कहाँ.
हम भी लग गए हैं भीड़ के पीछे , आगे सब धुंधला -धुंधला सा !
कहते तो हैं ज़िन्दगी बनती हैं इस शहर में, मगर ज़िन्दगी हैं कहाँ.
इसी पशोपेश में कट रही हैं ज़िन्दगी ,बस यही हैं तीन दशक की मेरी कहानी.

Tuesday, January 19, 2010

क्या लिखूं..................

कवि नहीं हूँ जो विचारो के सागर में गोते लगा कर,
कल्पनाओ में उड़ान भर कर,
शब्दों की माला पिरोउ ,
लेखक नहीं हूँ, जो शब्दों का मकडजाल बुनू.
आम आदमी हूँ सीमित शब्दकोष से खेलता हूँ,
जब भी लिखने बैठता हूँ,
दिमाग सवाल करता हैं - क्या लिखूं.
महंगाई और बेरोज़गारी ने बुरा हाल किया हैं,
भ्रस्टाचार से सारा जग बेहाल हैं,
रिश्तो के मायने सारे बदल गए हैं,
दोस्ती सिर्फ मतलब तक सिमट गयी हैं.
नौकरी की उलझन और दो जून की रोटी में दुनिया उलझ सी गयी हैं.
समय की कमी सबको पास हो गयी हैं,
दो चार मीट्ठे बोल किसी से सुनने के लिए,
अब पैसे देकर महफ़िल सजाने की रियात हो गयी हैं.
मजबूरी का फायदा दुनिया उठाने में लगी हैं,
आदमी को आदमी से शिकायत होने लगी हैं.
ऐसे हालत में कलम भी साथ छोड़ देती हैं,
क्या लिखू , पढने वाले कहाँ हैं?
सारे लोग तो व्यस्त हैं,
फिर लिख कर क्या करू ?

Tuesday, January 5, 2010

चल पड़े हम...........

चल पड़े हम ज़िन्दगी की राहों में, अब जो भी होगा देख लेंगे.
कल क्या होगा इसको पीछे छोड़ के,बस आज को जीने के लिए.
कल का कोई अफ़सोस नहीं, कल की कोई परवाह नहीं .
आज जो हैं बस उसी को जीने के लिए.
न किसी से कोई शिकवा हैं अब, मिटा के सबसे दुश्मनी .
चल पड़े हैं हम ज़िन्दगी की राहों में,बस ज़िन्दगी को जीने के लिए.
कोई रोके , कोई टोके अब कोई परवाह नहीं, निकल पड़े हैं अपनी मन की करने .
खुद को जो अच्छा लगे बस उसी को करने के लिए.
खुद के लिए मुकाम बनाने के लिए, चिंतायों की चंगुल से आज़ाद होके .
निकल पड़े हैं ज़िन्दगी को अपना बनाने के लिए.
राहों को खुद तलाशने के लिए, मंजिलो पर अपने निशान छोड़ने के लिए.
ज़िन्दगी की राहों में खुद अपना नाम लिखने के लिए.
कल क्या होगा इसको पीछे छोड़ के,बस आज को जीने के लिए.