बेमतलब ज़िंदगी को कोसते रहे ,
कभी वक्त की मार या किस्मत का रोना रोते रहे ,
थी अपनी गलतियाँ ,
ज़िन्दगी को बदनाम करते रहे।
कितनी उपजाऊ थी वो जमीन,
जिसके ऊपर थोड़ा कंकड़ -पत्थर बिखरे थे ,
वो पड़े थे ताकि मिट्टी न उड़े ,
हम उसे बंजर कहते रहे।
हर कदम पर मौके देती रही ज़िन्दगी ,
हम अपने गुरुर में जीते रहे ,
जब तक समझ आया फलसफा ,
हम बहुत दूर निकल गए।
ढूंढते रहे ज़िन्दगी में ख़ुशी ,
मिली भी खुशियाँ अनेको ,
बिना जिये उनको , और ख़ुशी की चाहत में
भटकते रह गए।
ज़िन्दगी तो चाहती थी ,
हमारे हर पल में शरीक होना ,
हमें गुरुर था अपने "मैं" होने का ,
उसको "बेवफा " का तमगा लगाते रहे।
कभी वक्त की मार या किस्मत का रोना रोते रहे ,
थी अपनी गलतियाँ ,
ज़िन्दगी को बदनाम करते रहे।
कितनी उपजाऊ थी वो जमीन,
जिसके ऊपर थोड़ा कंकड़ -पत्थर बिखरे थे ,
वो पड़े थे ताकि मिट्टी न उड़े ,
हम उसे बंजर कहते रहे।
हर कदम पर मौके देती रही ज़िन्दगी ,
हम अपने गुरुर में जीते रहे ,
जब तक समझ आया फलसफा ,
हम बहुत दूर निकल गए।
ढूंढते रहे ज़िन्दगी में ख़ुशी ,
मिली भी खुशियाँ अनेको ,
बिना जिये उनको , और ख़ुशी की चाहत में
भटकते रह गए।
ज़िन्दगी तो चाहती थी ,
हमारे हर पल में शरीक होना ,
हमें गुरुर था अपने "मैं" होने का ,
उसको "बेवफा " का तमगा लगाते रहे।