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Thursday, March 5, 2026

सरहद की लकीरें

 

नादानों को क्या समझ सरहदों की,

सरहदें कभी कलरव रोक न सकीं,

हवाएँ, नदियाँ, पंछी — सब बेख़ौफ़ रहे,

सरहद तो बस इंसानों के डर की कीमत बनी,

कहता रहा इंसान खुद को सबसे अक्लमंद,

पर यह समझ न पाया अब तक ,

सबके हिस्से की यह धरती

अकेले उसकी कैसे हो गई?

 

कहते हैं — औरों से बचने के लिए

उसने समाज बनाकर रहना सीखा,

एक-दूसरे का हाथ थामकर

हर संघर्ष में जीना सीखा,

सीमित इच्छाओं में बाँटकर जीवन,

अपने अस्तित्व को बचाए रखा,

न जाने फिर उसी समाज में

सीमाएँ खींचने की अक्ल किसने दी?

 

चलो, मान लिया सीमाएँ ज़रूरी होंगी,

तो खींच दी गईं, नियम भी बन गए,

बिना इजाज़त प्रवेश पर पहरे बैठ गए,

कहा गया — अपनी हदो में ही रहो अब,

पर एक सवाल अब भी बाकी है ,

अगर लकीरें खींच ही दी थीं,

तो दूसरों की सरहदों में

नज़र गड़ाने की सीमा क्यों नहीं रखी?

 

शायद सरहदें ज़मीन पर नहीं,

इंसान के मन में खिंची हुई हैं,

जहाँ लालच की स्याही से

हर रोज़ नई लकीरें बनती हैं,

धरती तो आज भी सबकी है,

बस इंसान ही भूल गया है ,

कि आसमान की तरह

जीना भी बिना सरहदों के होता है।