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Friday, March 27, 2026

राम सेतु

सागर तट पर बैठे-बैठे दिन बीते तीन।

अनुनय विनय करें,याचक भये जगदीश ।।

दूर पार सीता शोक विहकल, ध्यान धरो रघुवीर।

जिद्द छोड़ो, राह दो - कहते रहे जगत परमवीर।।

 

क्रोध से भस्म कर दो, कहाँ गये वो तुणीर।

आँखे लाल तरेर कर, बोले लक्ष्मण वीर।।

जहाँ काम चले शांति से, क्यों व्यर्थ हो तीर।

धैर्य धरो लक्ष्मण तुम, समझाये कौशलधीश।।

 

सुनी न फिर भी समंदर ने, राम का धीरज छूटा।

तीन दिन क़ी प्रार्थना से भी, कलेजा न उसका रूँधा।।

धनुष उठाया , प्रत्यँचा चढ़ायी,  किया स्मरण अग्नि बाण का।

हलचल हुई समंदर में, ज्वार सा उठा जैसे सोते से जागा।।

 

त्राहिमाम -त्राहिमाम कह, उसने शीश नवाया।

सागर उचारा "प्रभु, आपका ही धर्म निभाया।।"

सुखाकर सागर को जगत को हानि होती।

रघुवर आपको जलचरो की हाय लगती।।

 

नल नील दो वानर कर देंगे आपका ये काम।

सेतुः बनेगा सौ योजन, हर शिला लिख आपका नाम।।

जलचर भी बच जायेंगे , होगी न कोई अवज्ञा। 

प्रभु , मैं बड़भागी , पहुँचाऊँ आपको लंका।।

 

सागर वचन सुनि राम तब, मन में शांति समायी।

नल-नील को बुलवा तुरंत, आज्ञा उन्हें सुनायी।।

"शिला-शिला पर नाम लिखो, हो मेरा यह काम।

सेतु बनेगा सुदृढ़ ऐसा, पार करेंगे हम धाम।।"

 

वानर-भालू जुट गए , हरषित मन अति धीर।

गिरि-शिखर तक तोड़ लाये, बल से सब रणवीर।।

जल पर तैरती शिलाएँ, देखे सकल जहान।

राम-नाम की महिमा से, हुआ सरल अभियान।।

 

दिन में रचता सेतु नया, रात करे विश्राम।

सौ योजन का सेतु बन, जग में हुआ राम नाम।।

गूँज उठा जयकारा फिर, "जय श्रीराम" का धाम।

लंका पथ अब सुलभ हुआ, बढ़े रघुवर श्रीराम।।

 

सागर भी तब शांत हुआ, देख प्रभु की लीला।

भक्ति, शक्ति संग जुड़ गई, पूर्ण हुई हर क्रीड़ा।।

सीता मिलन की आस लिए, बढ़ी अजेय राम सेना।

धर्म विजय का शंख बजा, काँपा लंका का कोना कोना।।

 

 अधर्म का विस्तार भले हो, क्षणिक उसका अभिमान है।

हर युग में अवतार हुआ है, यही सनातन प्रमाण है।।

जब भीतर श्रीराम जगें, और कर्म बने यज्ञ समान।

तब मानव क्या, प्रकृति भी झुके पूरा हो हर एक अरमान।।

 

सागर भी सीमा भूल जाएगा, पर्वत भी मार्ग बना देगा।

विश्वास अगर अडिग हो तेरा,पत्थर भी तैर उठा देगा।।

फिर बाधाएँ अर्थ खो देंगी, और भय का नाम मिटेगा।

तेरे भीतर का पुरुषार्थ ही, एक नया “राम सेतु” रचेगा।।