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Wednesday, March 13, 2019

आओ , चुनाव -चुनाव खेलते है




तेरे हाथ गंदे ,
मेरे हाथ साफ़ ,
तेरे कुर्ते में दाग ,
मेरा कुर्ता साफ़। 

तेरा खानदान ऐसा ,
मेरा खानदान बेदाग़ ,
तेरे पास दस बँगले ,
मेरे पास सरकारी मकान। 

तू महाझूठा ,
मैं सच्चा,
तू मेरे लिए जहर उगल ,
मैं तुझे गालियाँ ।   

तू उलझाये रख जनता को किसी बात पर ,
मैं नया मुद्दा खोजता हूँ ,
तू जीत , या मैं जीतू ,
तू मेरा ध्यान रखना और मैं तेरा रखता हूँ। 

जनता का ध्यान कहीं,
असल मुद्दों पर न चला जाये ,
चल रोज़ नया बखेड़ा करते है ,
आओ , मिलकर चुनाव -चुनाव खेलते है। 

चित्र साभार - गूगल 

Saturday, June 30, 2018

माननीय


ये कौन लोग है ?
कहाँ से आते है ?
समझ नहीं आता , 
ये क्या कुछ अलग खाते है ?

हममें से ही तो थे कल तक ,
फिर अचानक क्यों खास हो जाते है ,
कुर्सी मिलते ही इतना क्यों बदल जाते है ?

कुछ दोष शायद , 
कुर्सी में होगा ,
काठ की इस रचना में , 
कुछ तो जादू टोना होगा। 

कुर्सी जाते ही फिर कैसे खिसयाने लगते है , 
द्वारे द्वारे हाथ जोड़े ,
फिर न जाने शर्म,
कहाँ बेच खा आते है।  

बातों और वादों का जाल फिर फैलाते है , 
चाँद तक सड़क पहुँचाने का जिम्मा उठाते है , 
कपडा , रोटी और मकान को तरसती जनता को ,
अपने  अनर्गल प्रलापों से लुभाते है।  

ये कौन लोग है ?
कहाँ से आते है ?
गिरगिट की तरह रंग बदलने की , 
कला कहाँ से लाते है।  

Friday, February 17, 2017

मतदान बाद , गणना से पहले



नींद उडी हैं नेताओ की , 
ई वी एम  में बंद हो गयी किस्मत।  

कुछ अब सोच रहे जीत गए तो कैसे कमायेंगे ? 
हार गए तो पाँच साल कैसे बितायेंगे ? 

बड़ी कशमकश चल रही हैं , 
ज़िन्दगी नीरस सी लग रही हैं।  

वादों -इरादों के पोस्टरों को जला  दिया हैं , 
अब किसी के हाथ न पड़े , छुपा दिया हैं।  

हर मतदाता को शक की निगाह से देख रहे हैं , 
लिया तो इन्होंने  मुझसे से हैं , वोट पता नहीं - किसे दिया हैं ? 

नेताजी के कट नहीं रहे दिन रात , 
चेले अब भी दिलासा दे रहे हैं - जीतोगे बस आप।  

नेता जी ने अब विपक्षी उम्मीदवारों से भी दोस्ती कर ली हैं , 
अपने भाषणों में उसकी खिल्ली पर माफी माँग ली हैं।  

समझौता हो गया है - तुम जीते तो हमारा भी काम करना , 
हम जीते तो तुम हमें अपना भाई ही समझना।  

दोनों अब साथ साथ कहकहे लगाते हैं , 
चेले दोनों के साथ में अब पार्टी उड़ाते हैं।  

इन्तजार में दिन कट रहे हैं , 
ख्याली पुलाव रोज़ बन रहे हैं।

एक दिन का राजा - मतदाता ,
अपने काम धंधे , रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लग जाता हैं।