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Monday, July 13, 2026

जेन ज़ी — नई सदी की आवाज़


जेन ज़ी की आँखों में, सपनों का आसमान है,

कंधों पर भविष्य का, एक विशाल जहान है।

निडर, बेख़ौफ़, तेज़ क़दमों से चलती ये पीढ़ी,

समय की धड़कनों में, इनकी ही पहचान है।

 

इनके हाथों में मोबाइल है, पर जड़ों से रिश्ता भी,

दादी की कहानियाँ हैं, और डिजिटल दुनिया भी।

ये जानते हैं मिट्टी की खुशबू का अर्थ क्या है,

और आकाश छूते सपनों की ऊँचाई भी।

 

भावनाएँ हैं इनमें, पर विवेक की लौ भी,

सिर्फ़ बहाव नहीं, दिशा चुनने की सोच भी।

लोग चाहे कह दें इन्हें लापरवाह या अलग,

पर हर निर्णय के पीछे, एक गहरी खोज भी।

 

ये प्रश्न करते हैं, पर उत्तर गढ़ते भी हैं,

रास्ते नहीं मिलते, तो नए रास्ते पढ़ते भी हैं।

हार को अंत नहीं, अनुभव मानते हैं,

और गिरकर फिर उठना, बेहतर समझते भी हैं।

 

ये वही पीढ़ी है, जो सीमाएँ तोड़ेगी,

विज्ञान, कला, विचारों से दुनिया जोड़ेगी।

एक शताब्दी की दिशा और दशा बदलने को,

अपनी मेहनत से नया इतिहास मोड़ेगी।

 

 

कल का सूरज इनके हाथों से उगेगा,

मानवता का सफ़र नई ऊँचाइयों तक पहुँचेगा।

जेन ज़ी कोई साधारण अध्याय नहीं है,

ये आने वाले युग का पहला सवेरा है।


Sunday, November 23, 2025

जेन ज़ी कविता

 

बातों ही बातों में कल मेरी बेटी बोली ,

पापा अब नई कवितायें लिखनी होगी ,

वैसे भी हमारी जेनेरशन कवितायें पढ़नी भूल रही ,

उनके हिसाब से अब लिखनी होंगी।

 

मन विचलित, मस्तिष्क परेशान ,

कहाँ से लाऊँ अब ये ज्ञान ,

मगर अब जुड़ना होगा तो ,

इस दौर की कवितायें लिखनी ही होंगी।

 

लगे हाथ उसने दे दिया एक सुझाव ,

आई का इस्तेमाल करो ,

प्रोम्प्ट देकर उससे अब ,

अपनी कवितायें रचने को कहो।

 

अब कवितायें भी आई लिख देगा ,

कवियों अब तुम्हारा क्या होगा ,

मानवीय संवेदनाओ को अब ,

आई अपने कृत्रिम भावों से सीचेंगा।

 

एक ही प्रोम्प्ट पर अलग -अलग रस की ,

वो झटपट नौ कवितायें रच  देगा ,

" आनन्द " तुम खेती करना सीखो अब ,

कवितायें तो तुमसे बेहतर आई लिख देगा।

Friday, September 12, 2025

ज़ेन -जी

 

अलग़ नहीं है ये हमसे ,

मगर तेवर थोड़ा जुदा है ,

कसूर इनका नहीं है ,

वक्त ही अब इनका है।

 

जोशोजुनूं से लबरेज ,

खून नया नया है ,

आंधी , तूफ़ान से नहीं डरने वाले ,

हवाओं का रुख मोड़ने वाले है।

 

तकनीक हाथों की कठपुतली ,

पहुँच में सारा जहान है ,

माकूल हवाओं का इन्तजार क्यों ,

आज ही समाधान है।

 

ये कल का आधार है ,

आज की कीमत जानते है ,

लगे भले ही थोड़े विद्रोही से ,

ये जंजीरें तोड़ना जानते हैं।

 

व्यावहारिकता इनके नस नस में ,

किताबी बातें सिर्फ ढकोसला है ,

वक्त बदला है , दौर बदला है ,

अपना हक़ सब जानते है।

 

बहुत आग है ,

तूफ़ान है इनके अंदर ,

मिल गया सही रास्ता ,

बदल सकते है ये सारा मंजर।

 

चिंता बस इक बात की है ,

किसी की कठपुतली मत बनना ,

सक्षम हो तुम सब मिलकर ही ,

आवाज हक़ में बुलंद रखना।