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Wednesday, February 18, 2026

उम्मीद

 

कुम्ल्हा जाता है शीत में ,

सर्द हवाओं के थपेड़े झेलता है ,

गिरा देता है पत्तियाँ सब ,

बसंत की उम्मीद में जी जाता है। 

 

पहली बसंत की हवा में ,

कपोल फूट पड़ती है ,

ठूँठ सा बना पड़ा था जो ,

पत्तियों से तन ढाँक लेता है। 

 

फिर खिलने लगते है फूल ,

कलरव होने लगता है ,

झूम -झूम कर बासंती हवा में ,

सर्द हवाओं का खौफ भूल जाता हैं। 

 

फिर आता है तपिश का मौसम ,

सूरज आग बरसाता है ,

मुरझा जाती है पत्तियाँ डाल डाल ,

चौमास के इंतजार में जी जाता हैं। 

 

पहली फुहार में रोम रोम ,

फिर से जैसे जी उठता है ,

अठखेलियाँ सा करता बूँदो संग ,

लहराता सावन के गीत गाता हैं। 

 

साल दर साल का चक्र यह ,

नये -नये अनुभव कराता है ,

घबराओ मत -नन्हे पौधों ,

जीवन का पाठ खुद सीख, बताता हैं।  

Friday, July 11, 2025

महत्व

 

रात ने कभी सुबह से शिकायत नहीं की ,

सुबह ने रात को कभी नहीं चिढ़ाया ,

दोनों को पता है महत्व इक दूजे का ,

इक दूसरे के बिना अस्तित्व कहाँ उनका। 

 

उतार -चढ़ाव भी तो ऐसे ही जीवन चक्र में ,

एहसासों के अनुभव से गुजरने का सफर सारा ,

मुक्कमल सफ़र -ऐ -ज़िन्दगी तो वही जहाँ में ,

कर्मफल जो मिला , जिसने दिल से स्वीकारा।