Sunday, April 2, 2023

शब्द

 

लिख कम , पढ़ ज्यादा रहा हूँ आजकल ,

शब्दों की जादूगरी समझ रहा हूँ आजकल। 

 

शब्द पंक्ति दर पंक्ति बहुत कुछ कहते है ,

मगर, खाली स्थानों को भी समझ रहा हूँ आजकल। 

 

भावों को पिरोना आसान काम नहीं है ,

शब्दों का उचित चयन सीख रहा हूँ आजकल। 

 

जो लिखा है , उससे ज्यादा अनलिखा होता है ,

दो शब्दों के बीच फ़ासला समझ रहा हूँ आजकल। 

 

लिखे हुए को पढ़ना इक अलग बात है ,

लिखे हुए का मर्म समझ रहा हूँ आजकल। 

 

अभिव्यक्ति का वरदान है ये शब्द ,

कब, कैसे, क्यों,क्या- समझ रहा हूँ आजकल।  

 

तीर की मानिंद है ये शब्द ,

सार्थक संधान सीख रहा हूँ आजकल। 

Monday, March 27, 2023

मौसम

 

मौसम भी आजकल गजब फिरकी ले रहा है ,

इंसानी फितरत को बराबर टक्कर दे रहा है ,

बस अभी एक कमी रह गयी है  फिर भी ,

मौसम फिर भी बदलने की पूर्वसूचना दे रहा है। 

 

गिरगिटों ने अब रंग बदलना छोड़ दिया है ,

इंसानों ने उनसे ज्यादा रँग बदलना सीख लिया है ,

आरोप है उनका - वो सुरक्षा के लिये रंग बदलते है ,

इंसान तो फायदे के लिये रंग बदल रहा है। 

 

साँपो ने भी दुहाई देनी शुरू कर दी है ,

उनके डसने का असर कम हो रहा है ,

इंसानी जुबान में कही ज्यादा विष है अब ,

बिना घाव किये ही तार -तार कर रहा है। 

 

मिट्टी  के लिये बबूल उगाना आसान है अब ,

उर्वरा शक्ति का तो सब नाश हो रहा है ,

जिस पानी को बचाना चाहिये बूँद -बूँद ,

वही पानी जहर बन पाताल रिस रहा है। 

 

शुद्ध हवा की चाह मन में , भटक रहा है ,

न जाने किसको -किसको कोस रहा है ,

जिम्मेदारी किसके मत्थे डाले हालातों की ,

खुद को पाक साफ़ घोषित कर रहा हैं। 

Thursday, March 9, 2023

इक पहाड़न

  

बुराँश के फूलों की पंखुड़ियों से ,

उसके सुर्ख गुलाबी गाल ,

उलझी सी लटों को एक कपडे से ,

बाँध रखी हो जैसे गंगा की धार ,

चंचल हिरणी सी उकाव -हुलार में ,

थिरकते -ठुमकते उसके पाँव ,

मेहनत के पसीने से ढुलकती ,

एक बूँद मोती सी चमकती माथे पर ,

चेहरे पर एक अलग मुस्कान ,

इक पहाड़न उतर रही पहाड़ से ,

लेकर सिर पर इक पहाड़ ,

पहाड़ो में और क्या आयेगा हिस्से ,

हर जगह तो है उसके लिए पहाड़। 

 

धार -धार गूँजते है उसके गीत ,

आँसू बहते उसके गधेरे -गाढ़ ,

उसकी आहट पहचानते रास्ते ,

डुंग -डाव को सुनाती मन की बात ,

फुर्र से उड़ा देती चिंताओं को ,

जैसे गिरे एक डुंग क्षिणी में ,

सूपे में भरकर छाँट लेती हिस्से के ,

कुछ सुकून के पल ,

छटक देती बाकी बेकार,

साँझ होते समेट लेती सब ,

अपने पहलु में - सारा घर संसार। 

 

इक पहाड़न मुझे रोज़ दिखती है ,

चढ़ते-उतरते अपने हिस्से का पहाड़ ,

पहाड़ को भी झुकते देखता हूँ ,

उसके हौंसले के आगे कई बार ,

वो पहाड़न मुस्करा कर समझाती ,

जीवन का एक अनकहा सार ,

जैसे ,जहाँ भी, कैसा -जीवन हो ,

उकाव -हुलार करते रहो पार। 


कुमाउँनी शब्द और अर्थ :  

उकाव - चढ़ाई , हुलार - उतराई , ढुंग डाव- पत्थर

 

Friday, March 3, 2023

कुरक्षेत्र

  

आमने -सामने खड़ी थी ,

दोनों तरफ सेना अपार ,

अस्त्र -शस्त्र से लैस ,

कुरु वंश के सब आधार।

 

एक तरफ पांडव संग द्वारकादीश ,

दूसरी तरफ कौरव संग देवव्रत " भीष्म " ,

सज्ज हुई दोनों सेनाएँ , तैयार करने रण ,

नहीं दिख रहा  दूर -दूर तक कर्ण।

 

समय की कैसी अजब लीला है ,

लीलाधर खुद हाँक रहे अर्जुन का रथ ,

एक जिद्द ने झोंक दिया सब ,

अब क्या अर्थ और क्या अनर्थ।

 

शकुनि बत्तीसी निपोरे ,

सपना हुआ उसका साकार ,

निर्बुद्धि दुर्योधन समझे ,

सेना उसकी अपार।

 

जमघट लगा योद्धाओं का ,

धुआँ -धुआँ सा फैला चारों ओर,

कुरुक्षेत्र का आसमां हुआ विकराल ,

अजब शांति थी दोनों ओर।

 

वीर एक से बढ़कर एक ,

सज्ज हुए मरने -मारने दोनों ओर ,

हाय विधाता ! युद्ध ही बचा अंतिम विकल्प ,

बहेंगी नदियाँ खून की अब ,चहुँओर।

 

कुरुक्षेत्र की भी क्या नियति है ?

उसको कलेजा रखना होगा ,

गिरेंगे जब महावीर उसकी छाती पर ,

न जाने कितनी बार कलेजा फटना होगा।

 

एक तरफ सात अक्षोहिणी सेना ,

दूसरी तरफ ग्यारह अक्षोहिणी धुरंधर ,

पांच योजन की भूमि पर ,

तय हुआ -होगा युद्ध भीषणतम।

 

वक्त भी ठहर सा गया ,

देख रहा सब आँखे फाड़ ,

जीत -हार की चिंता नहीं उसे ,

गवाह बनना है उसे इस बार।

 

कुरुक्षेत्र अपनी किस्मत को रोये ,

इस महासमर में बहेगी खून की धार ,

उसके माथे ही लिखा जायेगा ,

यही लड़ा गया महायुद्ध एक बार।

 

महज एक शंखध्वनि दूर ,

दोनों ओर खड़े मतवाले थे ,

कुरुवंश के दो धड़े -देखो ,

कुरुक्षेत्र में आ डटे थे।

 

युद्ध तो फिर युद्ध है ,

क्रोध मति सब हर लेता हैं ,

क्या धर्म -क्या अधर्म फिर ,

सब कुछ नोच लेता हैं।

 

फिर जब युद्ध ही मात्र विकल्प बचा हो ,

शक्ति ही शांति का द्वार खोलेगी ,

इस महायुद्ध के बाद तो न जाने ,

धरती भी कितने दिनों का शोक करेगी।

 

न जाने कितने बच्चे अनाथ होंगे ,

न जाने कितने सुहाग उजड़ेंगे ,

कहाँ , किसको ,कब अब फिक्र है ,

सज गया मैदान -महाभारत तय हैं।

Sunday, February 19, 2023

पाँच ग्राम


गरजा दुर्योधन ,

" पाँच ग्राम तो क्या ?

सुई की नोक के बराबर जमीन नहीं दूँगा ,

जो करना है , कर लो केशव ,

तनिक भी अब अपने फ़ैसले से नहीं हटूँगा। "

 

शांतिदूत कृष्ण बोले ,

"विचार कर ले दुर्योधन ,

इस निर्णय पर अब सब कुछ निर्भर होगा ,

कुरुवंश का भविष्य अब इसी पर तय होगा ,

हठ छोड़ , संयम दिखा ,

आज अपना बड़प्पन दिखा ,

देख , कोई कुरु तुझसे सहमत नहीं है ,

बालहठ छोड़ , शांति अपना। "

 

भोंहे तन गयी , आँखे हुई लाल ,

विवेक मर गया दुर्योधन का ,

बोला शब्द विकराल ,

" दुःशासन , बाँध लो इस दूत को ,

यही इस सबका मूल हैं  ,

रणछोड़ यह , ग्वाला है ,

ढोंगी , पाखंडी , डरपोक,

पांडवो का रखवाला है। "

 

"रुक दुर्योधन ,

क्या अनर्थ करने वाला है ,

क्या तू जानता नहीं ,

सामने खड़ा वो सबका काल है। "

भीष्म ने क्रोध से कहा।

 

" पितामह , आप चाहे तो पाला बदल लो ,

अब आपके बूढ़े प्राणों में जान नहीं है ,

धनुष में वो तान नहीं है ,

इस बाँसुरी बजैये से व्यर्थ डरते हो ,

ला जंजीरें दुःशासन , हाथ बढ़ा ,

जहाँ जन्मा था ये कृष्ण , आज वही पहुँचा। "

 

" आजा दुर्योधन , ला दुःशासन ,जंजीरें ला ,

बाँध सकता है तो आज बाँध के दिखा ,

मति फेर दी है काल ने तेरी ,

तू खुद का दुश्मन आज बना ,

शांति के अंतिम प्रयास को ,

तूने आज विफल किया ,

रणचंडी खप्पर लेकर नाचेगी अब ,

दुर्योधन ! युद्ध तेरे अब नाम हुआ।“

 

कुरु सभा में ये कैसा वज्रपात हुआ ,

बाँधने चले उसको जो निराकार हुआ ,

धृतरास्ट्र की अंधी आँखे ,

क्या ये नजारा देख पाती ,

भरे दरबार केशव का अपमान हुआ।

 

केशव ने ज्यू -ज्यू आकार ऊँचा किया ,

कुरु सभा में हाहाकार मचा ,

विदुर और भीष्म हाथ जोड़े ,

दुःशासन लाचार हुआ,

प्रकाश फ़ैल गया सभा में ,

हतप्रभ से ,ठगे से -मौन सब ,

बोले चक्रधारी गोवेर्धन मधुसूदन ,

“सुन दुर्योधन , युद्ध तू आज ही हार गया ,

मेरी जगहँसाई न हो ,

मैं सिर्फ इसलिये आया था ,

रोक सकता था मैं युद्ध ,

कल मुझपर ये लाँछन न आये ,

मूढ़बुद्धि , युद्ध कोई समाधान नहीं ,

शांति से फूल खिलते है ,

अच्छा , अब कुरुक्षेत्र में मिलता हूँ,

युद्ध तो अभी ख़त्म कर देता ,

चक्र से अपने सब धुआँ कर देता ,

लेकिन फिर कोई अर्थ नहीं रह जायेगा ,

धर्म -अधर्म की लड़ाई से जग मरहूम रह जायेगा ,

महाभारत होगी अब कुरुक्षेत्र में ,

तू कुरु वंश का कलंक कहलायेगा।“

 

विदुर खामोश , भीष्म लाचार ,

कर्ण -शकुनि हर्षाये अपार ,

धृतरास्ट्र की मति ह्रास ,

कुरुक्षेत्र में तय हो गया ,

होगा भयंकर नर -सँहार ,

रोक न पाए चक्रधारी भी ,

कोशिश की थी अंतिम बार,

कुरुसभा साक्षी बनी,

विफल हुआ अंतिम प्रयास।

Thursday, February 16, 2023

क्यों

 

अतीत और भविष्य के ,

मध्य एक संधिबिंदु आज पर ,

हतप्रभ सा मैं खड़ा हूँ ,

आश्चर्य ये है न अतीत पर ,

और न भविष्य पर ,

मेरा कोई नियंत्रण ,

मैं दोनों के बारे में ही ,

अपने आज में  ,

सोचता रहता हूँ।

 

आज को अभी ही ,

बेहतर किया जा सकता है ,

भूत -भविष्य से निकलकर ,

जीया जा सकता है ,

मगर अक्सर ये नहीं होता ,

और इस “क्यों “ का ,

उत्तर नहीं होता मेरे पास।

 

 

Friday, January 20, 2023

दो दोस्त

ओहो , कैसे हो यार तुम , 

बिल्कुल बदल गए हो , 

कितने दुबले -पतले थे , 

अब तो जैसे कुप्पा हो गए हो , 

कितने घुँघराले हुए करते थे तुम्हारे बाल , 

अब तो बस अधपके से आधे हो गए है , 

क्या हुआ तुम्हारे चेहरे के तेज को , 

गालों के गड्डे भर से गए है , 

वो जोशो -जूनून कहाँ गायब हो गया , 

हर बात पर दुनिया बदलने की बात करने वाला ,

क्यों खोया -खोया सा है ? 

औरों से सुनता रहता हूँ , 

तुम्हारी कामयाबियों के कहानियाँ , 

फक्र से कहता हूँ , 

कई बरस पहले ,हम सच्चे दोस्त थे।  


अरे यार , बताओ तो सही , 

क्या -क्या किया इतने सालों में , 

सुना है खूब तरक्की कर लिए हो , 

लेकिन चेहरे पर वो सुकून क्यों नहीं है , 

लाइफ तो सेटल होगी यार तुम्हारी , 

सब कुछ तो अब तुम्हारे पास है , 

हमारा क्या है यार , 

वही हड्डी , वही खाल है , 

जिस लकीर को पकड़े थे , 

बस उसी पर अटके है , 

लोग असफलताों का टैग जरूर देते है , 

मगर हम जानते है , 

हम बड़े सुकून से हैं , 

तुम मंजिल की तलाश में थे , 

पा लिये और दुआ है - आगे बढ़ो , 

तुम्हे पता है हमारी फितरत की , 

सफर का पूरा लुफ्त लेकर , 

तुमने चाहा तो ,

मिलेंगे फिर हम कहीं न कहीं।  

Sunday, January 1, 2023

संधान

 

कैसे मान लूँ अभी से हार , जब तरकश में कई तीर बाकी है।

अभी तो बस अभ्यास शुरू किया है ,संधान अभी बाकी हैं ।1। 

 

छल ले कितना ही दुनिया , मेरे हौंसलो में कोई कमी नहीं है। 

इन्तजार करूँगा अपनी बारी का , कोशिश मेरी जारी हैं।2।

 

कितना इम्तेहान लेगा वक्त भी , सब्र की मेरी भी इंताह नहीं है।

बदलने की तो फितरत है तेरी , मुझे भी कहाँ ,कोई जल्दी हैं।3।

 

बिछे होंगे मेरी राहों में काँटे , मुझे छालों की कहाँ परवाह है।

तपा रहा हूँ खुद को , इल्म है मुझे - असली संघर्ष अभी बाकी हैं।4।

 

ऐसा नहीं है कि हाथ पर हाथ रखकर बैठा हूँ , आत्म -निरीक्षण जारी है। 

हौंसले का धनुष , क्षमताओं का तरकश, विश्वास के तीर -तराश जारी हैं।5।

 

कश्मकश हर कदम पर , परिस्थितियों का बोझ भारी है। 

जीवन पथ बतलाता है , जीतने के लिए हारना भी जरुरी हैं।6।

 

लक्ष्य पता है - पहुँचने का भी अटल और अडिग इरादा है।

पीछे खींचे है कुछ कदम , लम्बी छलाँग के लिए ये भी जरुरी हैं।7।