अपने पापा की किसी बात पर दादी को रोते हुए देखकर,
पोता अपनी दादी के पास गया और बोला,
"दादी ! आपको पापा ने क्यूँ डाटा?
मम्मी तो रोज़ पापा से झगड़ती रहती हैं,
एक के बाद एक गलती करती हैं,
उनको तो पापा नहीं डाटते?"
दादी ने जवाब दिया
" बेटा, तेरी मम्मी पड़ी लिखी, समझदार हैं,
तेरे पापा उसपर तो गुस्सा नहीं होते हैं,
सारी भड़ास मुझ पर निकाल देते हैं.
मैं फिर भी उससे नाराज़ नहीं होती
क्यूंकि वो मेरा बेटा हैं
हर माँ की नियति यही हैं,
पाला पोसा बेटा एक दिन किसी को सौंप देना हैं,
और फिर यु ही घुट घुट कर जीना हैं."
निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
Monday, May 17, 2010
Saturday, May 15, 2010
कब आओगे ..........
(पाठको के अनुरोध पर अपनी ही पुरानी रचना को फिर से पोस्ट कर रहा हूँ. )
उसका आँगन गूजता था बच्चों के शोर से , वो दोड़ती थी बच्चों के पीछे
शोर से आसमान गूजता था .
बच्चों के साथ उस माँ का वक़्त यु ही गुजरता था,
माँ सोचती थी कब बच्चे बड़े होंगे और उसके सपने भी पूरे होंगे !
सोचते सोचते बच्चे कब बड़े हुए, उसको भी पता ना चला,
एक - एक कर सब निकल गए घर से एक दिन, उसका आँगन सूनसान हुआ!
आज वो संभालती है हर याद को , निहारती हैं अपनी दीवारों को,
तलाशती हैं हर जगह को जहाँ से उसके बच्चों की यादे जुडी पड़ी हैं.
वो यादों के सहारे ही आँखों के आँसू पीकर चुपचाप ज़माने से लड़ती हैं.
आती हैं कोई खबर दूर परदेश से बच्चों की तो आसूँ छलका देती हैं !
रात को सोने से पहले हर रोज़ प्राथना करती हैं ,
ना परेशां हो मेरे बच्चे, अपने बच्चों के बिछुडन का दर्द सहती हैं.
करती हैं कभी सवाल ज़िन्दगी से , फिर खामोश हो जाती हैं.
नियति को यही था मंजूर , पल्लू ढाके सो लेती हैं.
लगाती हैं जब हिसाब किताब ज़िन्दगी का, खोने का पलडा भारी पाती हैं.
हर रोज़ फिर आस में जीती हैं, उसके बिछड़े एक दिन तो आयेंगे.
काश कुछ ऐसा कर दे भगवान ,किल्कारिया फिर सुना दे भगवान, भर दे फिर उसका आँगन,
अब जहाँ सूनेपन की आवाज़ भी सुनाई देती हैं.
वो बुडी माँ का दर्द ना जाने भगवान भी नहीं सुनता हैं,
वो पथराई आँखों से आज भी हर जगह अपने बच्चों के निशान खोजती हैं.
बच्चे जब तक दर्द समझे , वो बिछुरन की आदी हो जाती हैं.
अब उसको कोई दर्द नहीं सालता , वो बैरागी हो जाती हैं.
मत करना भगवान किसी माँ को उसको बच्चों से दूर,ये सजा जीते जी मरने की हैं,
तेरा रूप हैं वो धरती पर , ये सजा हरगिज मंजूर नहीं हैं.
उसका आँगन गूजता था बच्चों के शोर से , वो दोड़ती थी बच्चों के पीछे
शोर से आसमान गूजता था .
बच्चों के साथ उस माँ का वक़्त यु ही गुजरता था,
माँ सोचती थी कब बच्चे बड़े होंगे और उसके सपने भी पूरे होंगे !
सोचते सोचते बच्चे कब बड़े हुए, उसको भी पता ना चला,
एक - एक कर सब निकल गए घर से एक दिन, उसका आँगन सूनसान हुआ!
आज वो संभालती है हर याद को , निहारती हैं अपनी दीवारों को,
तलाशती हैं हर जगह को जहाँ से उसके बच्चों की यादे जुडी पड़ी हैं.
वो यादों के सहारे ही आँखों के आँसू पीकर चुपचाप ज़माने से लड़ती हैं.
आती हैं कोई खबर दूर परदेश से बच्चों की तो आसूँ छलका देती हैं !
रात को सोने से पहले हर रोज़ प्राथना करती हैं ,
ना परेशां हो मेरे बच्चे, अपने बच्चों के बिछुडन का दर्द सहती हैं.
करती हैं कभी सवाल ज़िन्दगी से , फिर खामोश हो जाती हैं.
नियति को यही था मंजूर , पल्लू ढाके सो लेती हैं.
लगाती हैं जब हिसाब किताब ज़िन्दगी का, खोने का पलडा भारी पाती हैं.
हर रोज़ फिर आस में जीती हैं, उसके बिछड़े एक दिन तो आयेंगे.
काश कुछ ऐसा कर दे भगवान ,किल्कारिया फिर सुना दे भगवान, भर दे फिर उसका आँगन,
अब जहाँ सूनेपन की आवाज़ भी सुनाई देती हैं.
वो बुडी माँ का दर्द ना जाने भगवान भी नहीं सुनता हैं,
वो पथराई आँखों से आज भी हर जगह अपने बच्चों के निशान खोजती हैं.
बच्चे जब तक दर्द समझे , वो बिछुरन की आदी हो जाती हैं.
अब उसको कोई दर्द नहीं सालता , वो बैरागी हो जाती हैं.
मत करना भगवान किसी माँ को उसको बच्चों से दूर,ये सजा जीते जी मरने की हैं,
तेरा रूप हैं वो धरती पर , ये सजा हरगिज मंजूर नहीं हैं.
Friday, May 14, 2010
कुछ दिन .........................
कभी हालात ऐसे हो जाते हैं,
शब्द भी बयान करने के लिए छोटे हो जाते हैं,
दिमाग भी कुछ सोचने के लिए मना कर देता हैं,
दुनिया भी कुछ परायी सी लगने लगती हैं,
सब कुछ उलझा उलझा सा,
ज़िन्दगी अपनी होकर भी अपनी नहीं लगने लगती हैं.
तब कुछ इस तरह से दिल से आवाज़ आती हैं,
ऐ खुदा, क्यूँ मेरे साथ ये सब हो रहा हैं,
खुदा जवाब देता हैं - सब्र कर,
तेरे जो अच्छे दिन आने वाले हैं,
उसकी अहमियत को समझाने को कुछ दिन ऐसे भी बिताने पड़ेगे,
समय हमेशा एक सा नहीं रहता,
बस उसी को समझाने के लिए ये वक़्त भी जरुरी हैं.
शब्द भी बयान करने के लिए छोटे हो जाते हैं,
दिमाग भी कुछ सोचने के लिए मना कर देता हैं,
दुनिया भी कुछ परायी सी लगने लगती हैं,
सब कुछ उलझा उलझा सा,
ज़िन्दगी अपनी होकर भी अपनी नहीं लगने लगती हैं.
तब कुछ इस तरह से दिल से आवाज़ आती हैं,
ऐ खुदा, क्यूँ मेरे साथ ये सब हो रहा हैं,
खुदा जवाब देता हैं - सब्र कर,
तेरे जो अच्छे दिन आने वाले हैं,
उसकी अहमियत को समझाने को कुछ दिन ऐसे भी बिताने पड़ेगे,
समय हमेशा एक सा नहीं रहता,
बस उसी को समझाने के लिए ये वक़्त भी जरुरी हैं.
Thursday, May 6, 2010
One thought which keeps me positive everyday...............
"ज़िन्दगी में महत्वपूर्ण यह नहीं हैं की आज हम कहाँ पर खड़े हैं, महत्वपूर्ण यह हैं की हमारे आज के प्रयास हमें किस दिशा में ले जा रहें हैं क्यूंकि हमारा आज , हमारे बीते हुए कल की देन हैं जो हम अब बदल नहीं सकते और हमारा आने वाला कल हमारे आज की देन होगा. आज से ही जागिये और आने वाले कल के बारे में सोचिये की हमें कहाँ जाना हैं और हमारी मंजिल क्या हैं? "
"This is not very much important that where we are today , but this is very important that in which direction our today's efforts are aligning because our tommorrow will be the result of our today and our today is the result of our yesterday. Forget what happened in the past, awake today and start doing the things to make your tommorrow."
"This is not very much important that where we are today , but this is very important that in which direction our today's efforts are aligning because our tommorrow will be the result of our today and our today is the result of our yesterday. Forget what happened in the past, awake today and start doing the things to make your tommorrow."
Monday, April 26, 2010
मैं और मेरी ज़िन्दगी .....................
ज़िन्दगी और मेरी कहासुनी चलती रहती हैं,
कभी वो मुझे कोसती हैं , कभी में उसको.
कभी वो मुझे शाबाशी देती हैं, कभी मैं उसको.
लुकाछिप्पी का खेल हम बरसो से खेल रहे हैं.
न वो हारने को तैयार और न मैं.
कभी वो आगे निकल जाती हैं तो कभी मैं.
मिल ही जाते हैं थोडा दूर चल कर हम फिर,
कभी वो मेरा मुहं चिडाती हैं और कभी मैं.
दोनों को पता हैं साथ साथ ही चलना हैं हमें,
एक के बिना दूसरे का गुजारा नहीं हैं,
फिर भी एहमियत समझाने को ,
कभी वो आगे निकल जाती हैं कभी मैं.
दोनों की मंजिल एक हैं फिर भी,
कभी वो जल्दबाजी दिखाती हैं और कभी मैं.
थक कर जब हम चूर हो जाते हैं कभी,
कभी वो मुझे संभालती हैं और कभी मैं.
इसी तरह से फिसलता हैं वक़्त हमारी मुट्ठी से,
कभी वो बेबसी से मेरा मूंह ताकती और कभी मैं.
कभी वो मुझे कोसती हैं , कभी में उसको.
कभी वो मुझे शाबाशी देती हैं, कभी मैं उसको.
लुकाछिप्पी का खेल हम बरसो से खेल रहे हैं.
न वो हारने को तैयार और न मैं.
कभी वो आगे निकल जाती हैं तो कभी मैं.
मिल ही जाते हैं थोडा दूर चल कर हम फिर,
कभी वो मेरा मुहं चिडाती हैं और कभी मैं.
दोनों को पता हैं साथ साथ ही चलना हैं हमें,
एक के बिना दूसरे का गुजारा नहीं हैं,
फिर भी एहमियत समझाने को ,
कभी वो आगे निकल जाती हैं कभी मैं.
दोनों की मंजिल एक हैं फिर भी,
कभी वो जल्दबाजी दिखाती हैं और कभी मैं.
थक कर जब हम चूर हो जाते हैं कभी,
कभी वो मुझे संभालती हैं और कभी मैं.
इसी तरह से फिसलता हैं वक़्त हमारी मुट्ठी से,
कभी वो बेबसी से मेरा मूंह ताकती और कभी मैं.
Wednesday, April 21, 2010
कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं..............
कौन कहता हैं दुनिया बुरी हो गयी हैं, अब भी इंसानियत बची हुई हैं.
हर गली चौराहे पर इमान का झंडा बुलंद किये कुछ लोग अब भी खड़े हैं .
थोडा भ्रस्टाचार , थोडा बैमानी , थोड़ी घूसखोरी और थोडा अत्याचार हैं तो क्या हुआ , अब भी इस दुनिया में बहुत ईमानदार बचे हुए हैं.
माना अब रावणों की तादाद ज्यादा हो गयी हैं , कुम्भ्कर्नो की रात लम्बी हो गयी हैं .
मगर अब भी कुछ राम बचे हुए हैं , धनुष बाण लिए खड़े हैं .
रिश्ते - नाते बैमानी हो गए हैं , हर तरफ स्वार्थ का राज हो गया हैं.
मगर अब भी कुछ भरत चुपचाप जी रहे हैं.
माना की हर तरफ घुप्प अँधेरा छाया हैं , रौशनी की दूर दूर तक उम्मीद नहीं हैं .
मगर अब भी कुछ लोग दीये लेकर हर तरफ बिखरे पड़े हैं .
ना उम्मीदी का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ हैं . बस थोडा अँधेरा घना हो गया हैं .
बस अब जल्द ही ये अँधेरा छटने वाला हैं . सुबह की पहली किरण छटा बिखेरने को तैयार हैं.
मशाल थामे कुछ लोग आगे बड़ चले हैं, ये अँधेरा कटने वाला हैं .
आ जाओ की अब तुम्हारा साथ चाहिए क्यूंकि इस कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं .
हर गली चौराहे पर इमान का झंडा बुलंद किये कुछ लोग अब भी खड़े हैं .
थोडा भ्रस्टाचार , थोडा बैमानी , थोड़ी घूसखोरी और थोडा अत्याचार हैं तो क्या हुआ , अब भी इस दुनिया में बहुत ईमानदार बचे हुए हैं.
माना अब रावणों की तादाद ज्यादा हो गयी हैं , कुम्भ्कर्नो की रात लम्बी हो गयी हैं .
मगर अब भी कुछ राम बचे हुए हैं , धनुष बाण लिए खड़े हैं .
रिश्ते - नाते बैमानी हो गए हैं , हर तरफ स्वार्थ का राज हो गया हैं.
मगर अब भी कुछ भरत चुपचाप जी रहे हैं.
माना की हर तरफ घुप्प अँधेरा छाया हैं , रौशनी की दूर दूर तक उम्मीद नहीं हैं .
मगर अब भी कुछ लोग दीये लेकर हर तरफ बिखरे पड़े हैं .
ना उम्मीदी का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ हैं . बस थोडा अँधेरा घना हो गया हैं .
बस अब जल्द ही ये अँधेरा छटने वाला हैं . सुबह की पहली किरण छटा बिखेरने को तैयार हैं.
मशाल थामे कुछ लोग आगे बड़ चले हैं, ये अँधेरा कटने वाला हैं .
आ जाओ की अब तुम्हारा साथ चाहिए क्यूंकि इस कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं .
Wednesday, April 14, 2010
सांझ ....................
जन्म लिया एक घर में, उसको खुशियों से आबाद किया.
बचपन गुजरा जैसे तैसे , घरवालो को परेशान न किया.
सोचा आगे सब कुछ अच्छा होगा, फिर एक दिन अपना मायका छोड़ा.
पहुची एक नए जहाँ में, सबको फिर अपना समझा.
छोड़ दिए सब अपने सपने , किसी के सपनो को अपना लिया.
कब बीत गयी जवानी , पता भी नहीं चला.
जिंदगी की उलझनों में खुद को भुला दिया.
अपना परिवार , अपने बच्चे - जीवन इन सब पर कुर्बान कर दिया.
जीवन कब बीत गया, पता भी न चला.
जिनके लिए जीवन अर्पण किया, एक एक कर सब छोड़ चले .
जीवन के इस साँझ में मुझे अकेला कर गए.
आज उस डूबते सूरज को निहारती हूँ, ज़िन्दगी की साँझ में कितनी अकेली रह गयी हूँ.
Tuesday, April 13, 2010
पहाड़ो की सैर ...... ( Let us Visit the Hills)
वो सामने हिमालय हैं, दूर दूर तक बिखरा नीला आसमान.
बादलो से अठखेलिया करते ऊँचे पर्वत, फल फूलो से लदे ये उपवन.
कल कल करती बहती नदिया और हरे भरे पेड़ो से भरे ये जंगल.
झरनों से बहता निर्मल पानी , अमृत जैसा इनका जल.
बहती ठंडी हवा देखो, करती मन को कितना शीतल.
बाहे खोले बुला रहा ये सुन्दर मंजर, बिना तुम्हारे ये सब बेकार.
माना की तुम बहुत व्यस्त हो, कुछ कमाने के चक्कर में मस्त हो.
फिर भी फुर्सत के कुछ पल तो निकालो , आकर मेरी गोद में खेलो.
फिर कहोगे " अगर स्वर्ग हैं धरती पर, तो हैं वो यही पर."
Monday, April 12, 2010
अगले जन्म मोहे बी पी ओ की नौकरी मत दीजियो..........
घर वाले जब सोते हैं, मेरी सुबह तब होती हैं.
रात के अँधेरे में मेरी शिफ्ट शुरू होती हैं.
उल्लुओ की तरह रात रात बहर जागकर, हालत मेरी खस्ता हो गयी हैं.
अपने घर पर ही में पराया हो गया हूँ, पड़ोसियों के लिए में गुमशुदा हो गया हूँ.
फ़ोन पर बात करते करते अब कान भी घरघराने लग गए हैं.
अंग्रेजो से बात करते करते हिंदी भी भूल गए हूँ.
क्या करू ! इस नौकरी का, मम्मी की रोटी में भी बर्गर की खुशबू ढूँढने लगा हूँ.
अर्ज़ सुन ले ! भगवन मेरी - अगले जन्म इन बी पी ओ से छुटकारा दिला देना.
दिन की किसी नौकरी का मेरे लिए इंतज़ाम कर देना.
( यह कविता समप्रित हैं सभी लोगो को जो कॉल सेंटर में नौकरी करते हैं)
रात के अँधेरे में मेरी शिफ्ट शुरू होती हैं.
उल्लुओ की तरह रात रात बहर जागकर, हालत मेरी खस्ता हो गयी हैं.
अपने घर पर ही में पराया हो गया हूँ, पड़ोसियों के लिए में गुमशुदा हो गया हूँ.
फ़ोन पर बात करते करते अब कान भी घरघराने लग गए हैं.
अंग्रेजो से बात करते करते हिंदी भी भूल गए हूँ.
क्या करू ! इस नौकरी का, मम्मी की रोटी में भी बर्गर की खुशबू ढूँढने लगा हूँ.
अर्ज़ सुन ले ! भगवन मेरी - अगले जन्म इन बी पी ओ से छुटकारा दिला देना.
दिन की किसी नौकरी का मेरे लिए इंतज़ाम कर देना.
( यह कविता समप्रित हैं सभी लोगो को जो कॉल सेंटर में नौकरी करते हैं)
Friday, April 9, 2010
बेबसी ........
तंग आकर एक दिन उसने इस्तीफा लिख ही लिया,
चदने लगा ऑफिस की सीडिया ,
तब उसे अपने बच्चे की कही बात का ख्याल आया, "पापा मुझे इस महीने साइकिल दिला देना."
और माँ की कही बात याद आई, "बेटा ! तू ही सहारा हैं अब घर का" !
पत्नी का वो ताना याद आया, " कब खरीद के दोगे एक वाशिंग मशीन ?"
फिर बहन की शादी का ख्याल आया.
उठे कदम फिर रुक गए, ऊपर बढते कदम ठिटक गए !
वो वापस अपनी कुर्सी पे आ गया, फाईल्स की ढेर में फिर खो गया.
चदने लगा ऑफिस की सीडिया ,
तब उसे अपने बच्चे की कही बात का ख्याल आया, "पापा मुझे इस महीने साइकिल दिला देना."
और माँ की कही बात याद आई, "बेटा ! तू ही सहारा हैं अब घर का" !
पत्नी का वो ताना याद आया, " कब खरीद के दोगे एक वाशिंग मशीन ?"
फिर बहन की शादी का ख्याल आया.
उठे कदम फिर रुक गए, ऊपर बढते कदम ठिटक गए !
वो वापस अपनी कुर्सी पे आ गया, फाईल्स की ढेर में फिर खो गया.
Thursday, April 8, 2010
छोड़ आये हम वो गलियाँ ...............................
आँगन छूटा, गाँव छूटा , पीछे छूटा वो परिवेश !
छूट गयी बचपन की वो गलियाँ, जो गूंजता था हर रोज़ !
पीछे रह गयी सब वो यादों, जब हम चल दिए थे इक रोज़ !
बेफिक्री के वो दिन अब कितने आते याद,
काश ! फिर लौट आते वो दिन जहाँ सिर्फ हमारा था राज !
चंद कागज़ के टुकडो को इकट्ठा करने के लिए,
क्या क्या खो दिया हमने आज आता हैं याद !
कहती हैं वो गलियाँ आज, आ जाओ मेरे प्यारो ,
फिर से करो हमें आबाद !
हम नहीं बदले आज भी, तुम कितने बदल गए हो आज !
छूट गयी बचपन की वो गलियाँ, जो गूंजता था हर रोज़ !
पीछे रह गयी सब वो यादों, जब हम चल दिए थे इक रोज़ !
बेफिक्री के वो दिन अब कितने आते याद,
काश ! फिर लौट आते वो दिन जहाँ सिर्फ हमारा था राज !
चंद कागज़ के टुकडो को इकट्ठा करने के लिए,
क्या क्या खो दिया हमने आज आता हैं याद !
कहती हैं वो गलियाँ आज, आ जाओ मेरे प्यारो ,
फिर से करो हमें आबाद !
हम नहीं बदले आज भी, तुम कितने बदल गए हो आज !
Monday, March 29, 2010
आओ नयी शुरुवात करे.....................
कितनी बार दिल ने चाहा बदल लेते हैं चलो राह, उठे कदम न जाने कितनी बार थम गए !
शायद इसलिए हम जहा थे वही रह गए,हमारे साथी जिन्होंने हिम्मत की- कहाँ थे कहाँ पहुच गए.
शिकवा उनकी तरक्की से नहीं हैं, हम दिल से काम लिए और वो दिमाग की कहे सुनते गए.
उन्होंने हर अवसर को पहचाना , हम अवसर गवाते बदते रहें.
अब भी दिमाग कहता हैं, वक़्त अभी गुजरा नहीं .
जो बीत गया उसको भुला, चुन अभी भी अपनी राह.
और सरपट उस पर भाग,राह पकड़ ही लेगा एक दिन,
उस दिन होगा तुझको खुद पर नाज़.
हम सबकी यही कहानी हैं,आपबीती फिर सुनानी हैं.
क्यूँ न हम मिसाल बने, अपनी नज़रों में ही महान बने.
खुद फक्र कर सके अपनी ज़िन्दगी पर, अपनी कहानी खुद क्यूँ न लिखे.
आओ की अब भी वक़्त ठहरा हैं हमारे लिए, एक नयी शुरुवात करे.
भ्रमो के मायाजाल को काटे , खुद पर यकीन करे.
चुने अपनी राह वही , जो खुद को लगे सबसे सही.
शायद इसलिए हम जहा थे वही रह गए,हमारे साथी जिन्होंने हिम्मत की- कहाँ थे कहाँ पहुच गए.
शिकवा उनकी तरक्की से नहीं हैं, हम दिल से काम लिए और वो दिमाग की कहे सुनते गए.
उन्होंने हर अवसर को पहचाना , हम अवसर गवाते बदते रहें.
अब भी दिमाग कहता हैं, वक़्त अभी गुजरा नहीं .
जो बीत गया उसको भुला, चुन अभी भी अपनी राह.
और सरपट उस पर भाग,राह पकड़ ही लेगा एक दिन,
उस दिन होगा तुझको खुद पर नाज़.
हम सबकी यही कहानी हैं,आपबीती फिर सुनानी हैं.
क्यूँ न हम मिसाल बने, अपनी नज़रों में ही महान बने.
खुद फक्र कर सके अपनी ज़िन्दगी पर, अपनी कहानी खुद क्यूँ न लिखे.
आओ की अब भी वक़्त ठहरा हैं हमारे लिए, एक नयी शुरुवात करे.
भ्रमो के मायाजाल को काटे , खुद पर यकीन करे.
चुने अपनी राह वही , जो खुद को लगे सबसे सही.
Friday, March 26, 2010
रुकना नहीं , झुकना नहीं.
रुकना नहीं , झुकना नहीं.
मुड़ना नहीं, थकना नहीं.
रख अर्जुन सी नज़र लक्ष्य पर ,
और तुझे कुछ देखना नहीं .
डिगाए तुझे कोई कितना ,
रोड़े कितने अटकाए कोई .
रुख मोड़ना हैं हवायो का तुझे,
हर बाधा को हंस के सहना हैं तुझे.
हर मुस्किल को ठोकर मारता चल ,
लक्ष्य की तरफ कदम बदाता चल.
कोई रोके , कोई टोके ,
कोई चाहे कुछ भी कहे .
अपने दिल को समझाता चल,
अपनी धून पर बस चले चल चला चल.
कोई तेरा साथ न दे ,
कोई परवाह मत कर ,
अपने होसले को तलवार बना ,
हर मुश्किल को काटता चल.
यही दुनिया तुझे सलाम करेगी ,
जब तू मंजिल को पायेगा .
झुकेगी तेरी आगे ये दुनिया,
अपनी मेहनत का फल तू पायेगा.
मुड़ना नहीं, थकना नहीं.
रख अर्जुन सी नज़र लक्ष्य पर ,
और तुझे कुछ देखना नहीं .
डिगाए तुझे कोई कितना ,
रोड़े कितने अटकाए कोई .
रुख मोड़ना हैं हवायो का तुझे,
हर बाधा को हंस के सहना हैं तुझे.
हर मुस्किल को ठोकर मारता चल ,
लक्ष्य की तरफ कदम बदाता चल.
कोई रोके , कोई टोके ,
कोई चाहे कुछ भी कहे .
अपने दिल को समझाता चल,
अपनी धून पर बस चले चल चला चल.
कोई तेरा साथ न दे ,
कोई परवाह मत कर ,
अपने होसले को तलवार बना ,
हर मुश्किल को काटता चल.
यही दुनिया तुझे सलाम करेगी ,
जब तू मंजिल को पायेगा .
झुकेगी तेरी आगे ये दुनिया,
अपनी मेहनत का फल तू पायेगा.
Monday, March 22, 2010
रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी....
रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी,
कुछ रुलाती,कुछ हंसाती ज़िन्दगी.
धीरे धीरे मंजिल की तरफ बढ रही ज़िन्दगी,
कितनो को पीछे छोड़ते हुए,
कितने नए लोगो को अपना बनाती हुई,
रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी,
एक मंजिल को पा लिया तो,
दूसरी मंजिल ले कर तैयार खड़ी ज़िन्दगी,
हर रोज़ कही न कही फ़साये रखती हैं ज़िन्दगी.
जितना इसे समझो उतना उलझाती हैं ज़िन्दगी,
रफ्ता रफ्ता कट रही हैं ज़िन्दगी.
कुछ रुलाती,कुछ हंसाती ज़िन्दगी.
धीरे धीरे मंजिल की तरफ बढ रही ज़िन्दगी,
कितनो को पीछे छोड़ते हुए,
कितने नए लोगो को अपना बनाती हुई,
रफ्ता रफ्ता कट रही ज़िन्दगी,
एक मंजिल को पा लिया तो,
दूसरी मंजिल ले कर तैयार खड़ी ज़िन्दगी,
हर रोज़ कही न कही फ़साये रखती हैं ज़िन्दगी.
जितना इसे समझो उतना उलझाती हैं ज़िन्दगी,
रफ्ता रफ्ता कट रही हैं ज़िन्दगी.
Wednesday, March 17, 2010
बड़ी उलझन हैं कैसे सुलझाऊ !
बड़ी उलझन हैं कैसे सुलझाऊ !
मन को क्या कह के समझाऊ !
सोचा क्या था ज़िन्दगी में !
हो क्या रहा हैं कैसे समझाऊ !
नौकरी से मिले कुछ फुरसत तो !
कही एकांत में जाकर कुछ सोचु !
बचपन बीते बरसो बीते गए !
जवानी के दिन भी बस यु ही कट रहे !
कल के अच्छे के चक्कर में,
बरसो न जाने कहा खो गए.
चाहकर भी अब वो दिन नहीं ला सकता ,
फिर दिल को ही समझाता हूँ !
जो हैं अभी तेरे पास उसी में खुश हो ले,
कल की फिक्र छोड़, बीते कल कI चोला उतार !
बस आज को जी ले.
मन को क्या कह के समझाऊ !
सोचा क्या था ज़िन्दगी में !
हो क्या रहा हैं कैसे समझाऊ !
नौकरी से मिले कुछ फुरसत तो !
कही एकांत में जाकर कुछ सोचु !
बचपन बीते बरसो बीते गए !
जवानी के दिन भी बस यु ही कट रहे !
कल के अच्छे के चक्कर में,
बरसो न जाने कहा खो गए.
चाहकर भी अब वो दिन नहीं ला सकता ,
फिर दिल को ही समझाता हूँ !
जो हैं अभी तेरे पास उसी में खुश हो ले,
कल की फिक्र छोड़, बीते कल कI चोला उतार !
बस आज को जी ले.
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