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Friday, January 16, 2026

ज़िन्दगी का पंचनामा

 

शब्दों में "शोर " हो चला हूँ ,

शहरों में "दिल्ली " हो चला हूँ ,

माँग रही है हिसाब किताब ज़िन्दगी ,

"उम्मीद" का लॉलीपॉप थमा रहा हूँ।

 

देहरी छोड़ी, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा,

दोस्त छोड़े , परिवार छोड़ा ,

कुछ बड़ा करने के चक्कर में ,

"शहरों " में धक्के खा रहा हूँ।

 

जीविका के लिये " नौकरी " में हूँ ,

जी -हुजूरी से उकता गया हूँ ,

ज़िन्दगी कट रही है नौ से छः के फेर में ,

रविवार को ही जैसे हफ्ता जी रहा हूँ।

 

"धोखे " की इक ज़िन्दगी गुजर रही है ,

सुलझने की बजाय और उलझ रही है ,

भ्रम है फुर्सत मिलेगी आगे चलकर,

उम्र धीरे धीरे उम्रदराज हो रही है।

Wednesday, April 17, 2019

प्राइवेट कर्मचारी


घुटती ज़िन्दगी ,
बेदम साँसे ,
लड़खड़ाते कदम ,
टूटते शब्द
उनींदी  ऑंखें
आँखों के नीचे घेरे ,
माथे पर बल ,
लटका हुआ चेहरा ,
आधे अधूरे सपने ,
दौड़ता भागता जिस्म ,
थोड़ा छटपटाहट ,
थोड़ा बेचैनी ,
आधा अधूरा विश्वास ,
नकली सी हँसी ,
घबराया मन ,
कंधे पर लटकता बैग ,
हाथ में टिफ़िन ,
बड़बड़ाता मुँह ,
घडी पर नजर ,
ऑफिस से आता हुआ ,
एक प्राइवेट कर्मचारी।


Image source - Google