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Sunday, March 30, 2025

सैलरी



सैलरी तुम चाँद जैसी हो , 

पूर्णिमा पर आती हो , 

अमावस पर ख़त्म हो जाती हो , 

मगर अमावस से फिर , 

पूर्णिमा आने तक , 

वो इन्तजार हद तक गुजर जाता है, 

साँसे अटकी , जेब खाली , 

शरीर  हलकान रहता है।  

Wednesday, April 17, 2019

प्राइवेट कर्मचारी


घुटती ज़िन्दगी ,
बेदम साँसे ,
लड़खड़ाते कदम ,
टूटते शब्द
उनींदी  ऑंखें
आँखों के नीचे घेरे ,
माथे पर बल ,
लटका हुआ चेहरा ,
आधे अधूरे सपने ,
दौड़ता भागता जिस्म ,
थोड़ा छटपटाहट ,
थोड़ा बेचैनी ,
आधा अधूरा विश्वास ,
नकली सी हँसी ,
घबराया मन ,
कंधे पर लटकता बैग ,
हाथ में टिफ़िन ,
बड़बड़ाता मुँह ,
घडी पर नजर ,
ऑफिस से आता हुआ ,
एक प्राइवेट कर्मचारी।


Image source - Google 

Friday, March 8, 2019

मैं और मेरी नौकरी ( व्यंग्य कविता )




जब तुम मेरे पास नहीं थी ,
मैं तुम्हारे होने के सपने देखता था ,
सोचता था अक्सर ,
तुम मिल जाओगी ,
तो मेरा जीवन सुधर जायेगा ,
ज़िन्दगी की तमाम खुशियाँ मेरे ,
दामन में आ बिखरेंगी ,
और जीवन कितना सुहाना हो जायेगा। 

तुम आयी ,
जैसे मेरे पंखो को परवाज लग गए ,
सपने मेरे जैसे हकीकत में बदल गए ,
इज्जत में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई ,
हम भी क़ाबिलो की कतार में खड़े हो गए। 

मगर ,
धीरे धीरे न जाने क्यों तुमसे बेरुखी सी होने लगी ,
न जाने क्यों रोज चिंता की लकीरें माथे पर पड़ने लगी ,
उस मय्यसर की चाहत धीमी पड़ने लगी ,
अपने को रोज़ एक कैदखाने में बंद सा पाने लगा ,
रोज़ एक ही ढर्रे पर चलने से मन उकताने लगा। 

फिर ,
दिमाग में एक अलग फ़ितूर सा छाने लगा ,
हरदम अपने को ठगा सा महसूस होने लगा ,
समय तुम्हारे साथ कुछ ज्यादा गुजरने लगा ,
एक डर सा हरदम साया बनकर रहने लगा ,
"तुम बनी रहो " हर तिकड़म करने लगा। 

परिणाम ,
तुम्हे साथ लेकर चलना मजबूरी बन गयी ,
"तुम्हारे न होने" की सोचकर भी रूह घबराने लगी ,
घर-बार , रिश्ते -नाते सब दूर होने लग गए ,
समय की कमी अब हरदम सताने लगी ,
खुद को साबित करने की  ,
हर रोज़ एक नयी " जंग " होने लगी। 

अब ,
बने रहें दोनों हर हाल में ,
मैं तो तेरा बिना अधूरा ,
तेरी चाहत में खड़े है लोग कई ,
मन , बेमन - अब कोई मायने नहीं रखता मेरे लिए ,
"नौकरी " तू बनी रहना - यही प्रार्थना मेरी।