निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
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Thursday, July 23, 2026
Friday, January 16, 2026
ज़िन्दगी का पंचनामा
शब्दों में "शोर " हो चला हूँ ,
शहरों
में "दिल्ली " हो चला हूँ ,
माँग
रही है हिसाब किताब ज़िन्दगी ,
"उम्मीद"
का लॉलीपॉप थमा रहा हूँ।
देहरी
छोड़ी, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा,
दोस्त
छोड़े , परिवार छोड़ा ,
कुछ
बड़ा करने के चक्कर में ,
"शहरों
" में धक्के खा रहा हूँ।
जीविका
के लिये " नौकरी " में हूँ ,
जी
-हुजूरी से उकता गया हूँ ,
ज़िन्दगी
कट रही है नौ से छः के फेर में ,
रविवार
को ही जैसे हफ्ता जी रहा हूँ।
"धोखे
" की इक ज़िन्दगी गुजर रही है ,
सुलझने
की बजाय और उलझ रही है ,
भ्रम
है फुर्सत मिलेगी आगे चलकर,
उम्र
धीरे धीरे उम्रदराज हो रही है।
Wednesday, April 17, 2019
प्राइवेट कर्मचारी
घुटती ज़िन्दगी ,
बेदम साँसे ,
लड़खड़ाते कदम ,
टूटते शब्द
उनींदी ऑंखें
आँखों के नीचे घेरे ,
माथे पर बल ,
लटका हुआ चेहरा ,
आधे अधूरे सपने ,
दौड़ता भागता जिस्म ,
थोड़ा छटपटाहट ,
थोड़ा बेचैनी ,
आधा अधूरा विश्वास ,
नकली सी हँसी ,
घबराया मन ,
कंधे पर लटकता बैग ,
हाथ में टिफ़िन ,
बड़बड़ाता मुँह ,
घडी पर नजर ,
ऑफिस से आता हुआ ,
एक प्राइवेट कर्मचारी।
Image source - Google
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Friday, March 8, 2019
मैं और मेरी नौकरी ( व्यंग्य कविता )
जब तुम मेरे पास नहीं थी ,
मैं तुम्हारे होने के सपने देखता था
,
सोचता था अक्सर ,
तुम मिल जाओगी ,
तो मेरा जीवन सुधर जायेगा ,
ज़िन्दगी की तमाम खुशियाँ मेरे ,
दामन में आ बिखरेंगी ,
और जीवन कितना सुहाना हो जायेगा।
तुम आयी ,
जैसे मेरे पंखो को परवाज लग गए ,
सपने मेरे जैसे हकीकत में बदल गए ,
इज्जत में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई ,
हम भी क़ाबिलो की कतार में खड़े हो गए।
मगर ,
धीरे धीरे न जाने क्यों तुमसे बेरुखी
सी होने लगी ,
न जाने क्यों रोज चिंता की लकीरें माथे
पर पड़ने लगी ,
उस मय्यसर की चाहत धीमी पड़ने लगी ,
अपने को रोज़ एक कैदखाने में बंद सा
पाने लगा ,
रोज़ एक ही ढर्रे पर चलने से मन उकताने
लगा।
फिर ,
दिमाग में एक अलग फ़ितूर सा छाने लगा
,
हरदम अपने को ठगा सा महसूस होने लगा
,
समय तुम्हारे साथ कुछ ज्यादा गुजरने
लगा ,
एक डर सा हरदम साया बनकर रहने लगा
,
"तुम बनी रहो " हर तिकड़म
करने लगा।
परिणाम ,
तुम्हे साथ लेकर चलना मजबूरी बन गयी
,
"तुम्हारे न होने" की सोचकर
भी रूह घबराने लगी ,
घर-बार , रिश्ते -नाते सब दूर होने
लग गए ,
समय की कमी अब हरदम सताने लगी ,
खुद को साबित करने की ,
हर रोज़ एक नयी " जंग " होने
लगी।
अब ,
बने रहें दोनों हर हाल में ,
मैं तो तेरा बिना अधूरा ,
तेरी चाहत में खड़े है लोग कई ,
मन , बेमन - अब कोई मायने नहीं रखता
मेरे लिए ,
"नौकरी " तू बनी रहना - यही
प्रार्थना मेरी।
Wednesday, November 9, 2016
ऐ ! सैलरी , जरा धीरे धीरे गुजर। ( सभी वेतनभोगी कर्मचारियों को समर्पित)
तेरे इन्तजार में न दिन देखा-न रात ,
अब आयी हैं तो जरा ठहर !
मुझे तेरे होने का एहसास तो होने दे ,
कुछ वक्त तो मेरे साथ गुजार ले !
तेरे आने की आहट से ही दिल सुकून से भर जाता
हैं ,
तेरे जाने पर दिल मेरा जार जार रोता हैं !
जब तक तू मेरे साथ रहती हैं ,
मेरा हर दिन होली , रात दिवाली होती हैं !
तेरे चले जाने के बाद ,
हर दिन बेरंग और रात अमावस होती हैं !
तू तो इतरा कर चली जाती हैं ,
तुझे इल्म नहीं हैं शायद , उसके बाद मुझपर क्या
बीतती हैं ? !
तेरे फिर से आने के ख्यालो से जी लेता हूँ ,
हर रोज़ जी और मर लेता हूँ !
अब आना -तो थोड़ी फुरसत लेकर आना,
कुछ दिन और रुककर मुझे ज़िंदा होने का एहसास करा
जाना !
तेरी बाट जोहूंगा ,
हो सके तो समय पर आ जाना !
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