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Thursday, January 14, 2021

नयी कविता

 

इंस्टाग्राम में चमकती तुम ,

फेसबुक पर इठलाती हो ,

व्हाट्सप्प पर आकर ,

गुमसुम क्यों हो जाती हो। 

 

सुना तो है 4 जी बड़ा अच्छा चलता है,

तुम्हारे शहर में ,

सब नेटवर्क के टावर भी खड़े है ,

मगर कॉल का जवाब देने में क्यों कतराती हो। 

 

अब तो कितना आसान हो गया सब ,

चिट्टी पत्री , छुप कर निहारना - सब पुरानी बातें है ,

अब तो कनेक्टेड रहते है हरदम ,

ज्यादातर ऑफलाइन क्यों रहती हो। 

 

इजहार करना कितना आसान हो गया अब ,

बिना शब्दों के भी काम चल जाता है ,

बने बनाये भाव व्यक्त हो जाते है ,

तुम इमोजी क्यों इस्तेमाल नहीं करती हो। 

Tuesday, July 9, 2019

डिजिटल युग ( हास्य )


डियर  शायद तुम उदास हो , 
क्यूंकि दो दिन से तुमने स्टेटस में कुछ डाला ही नहीं , 
डियर  शायद तुम कुछ दिनों से सजी संवरी नहीं , 
इंस्टाग्राम पर तुम्हारा कोई नया फोटो आया ही नहीं , 
शायद तुम्हे किसी के ऑनलाइन आने से डर लग रहा है , 
क्यूंकि व्हाट्सएप्प पर तुम्हारा लास्ट सीन घंटो से बदला ही नहीं।  

डियर  शायद तुम किसी बात से खफा हो , 
वर्ना फ़ोन स्विचड ऑफ तुम करती नहीं  , 
शायद कही घूमने भी नहीं जा पायी हो , 
फेसबुक में कुछ अपडेट आया ही नहीं।  
ट्विटर  पर फॉलोवर घटने लगे है , 
तुम्हारा ट्वीट अब वायरल होता ही नहीं।  


अब तो तुम्हारा हाल ऑनलाइन देखकर ही समझ लेता हूँ , 
फिर भी तुम कहती हो - मैं तुम्हारी  चिंता  नहीं करता हूँ।