ख्वाइशों की पतंग बनी
, मन की बनी डोर !
उड चला मन बावरा
, करने आसमान से होड़
!!
कभी बादलो से आंखमिचौली की
, कभी किरणों से नहाया
!
कभी शाखों से खुद को बचाया , कभी खुले मैदानों को निहारा !!
कहीं पर लहलहाते खेत देखे
, कहीं पर बंजर मैदान
!
आसमां छूती इमारते देखी
, कहीं झुग्गियों का ढेर
!!
किसी बूढ़े को पार्क में सिसकते देखा
, कही अलमस्त बच्चो का शोर
!
कही एकदम वीरानी देखी
, कही गाड़ियों की रेल
!!
ख्वाइशों की पतंग बनी
, मन की बनी डोर !
उड चला मन बावरा
, करने आसमान से होड़
!!
कहीं हिन्दू मुस्लिम को कहकहे लगाते सुना , कहीं भाई भाई को लड़ते हुए देखा !
कहीं दूर एक औरत को पल्लू डाले कोसो दूर से पानी लाते देखा
, कहीं नदियों के पानी को उफनते पाया
!!
कहीं भूख से बिलखते बच्चो को देखा
, कहीं पार्टियो के बचे हुए खाना का ढेर पाया
!
किसान को हताश देखा
, बिचौलियों को मौज उड़ाते देखा
!!
कहीं नेताओ की गलबहियां देखी , कहीं आग उगलते सुना
!
किसी रिश्वतखोर सरकारी अफसर को गरीब से पैसे लूटते भी देखा
!!
ख्वाइशों की पतंग बनी
, मन की बनी डोर !
उड चला मन बावरा
, करने आसमान से होड़
!!
गजब दुनिया के अजब निराले दृष्य देखे
, एक सेठ को पांच रुपये के लिए नौकर को पीटते देखा
!
वहीँ एक गरीब को मंदिर के दान पत्र में सौ का नोट डालते मुस्कराते पाया
!!
अपने गांव की गलियाँ भी घूम आया
, बचपन में एक पेड़ के तने में लिखा नाम ज्यो का त्यों पाया !
स्कूल को अपने पहचान नहीं पाया
, टिन के शेड से उसको तिमंजिला बिल्डिंग पाया
!!
उस मैदान का भी एक चक्कर लगा आया
, जहाँ भूख प्यास भूल कर दिनभर क्रिकेट खेलता था
!
मगर अखरोट के उस पेड़ को सूखा पाया
, जिसमे पत्थर मारकर अखरोटो को खाता था
!!
ख्वाइशों की पतंग बनी
, मन की बनी डोर !
उड चला मन बावरा
, करने आसमान से होड़
!!







