Friday, March 12, 2021

ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना

जंगल के बीचोबीच  ,

बाँज के पेड़ के नीचे ,

छाँव में ,

बैठकर ,

एक सूखी रोटी का निवाला ,

एक गुड़ की डली ,

मुँह में डालकर ,

वो देख रहा था ,

अपनी बकरियों को चरते ,

जो पूरे पहाड़ में टिमटिमा सी रही थी ,

पूरी दुनिया से बेखबर वो ,

पुराने से रेडियो में ,

आज के जमाने में ,

विविध भारती का ,

दोपहर का फरमाइशी कार्यक्रम ,

सुन रहा था ,

और बाकी दुनिया ,

कोरोना के डर ,

से दुबकी पड़ी थी ,

अपनी चारदीवारी के अंदर ,

बाहर जाने से कतरा रही थी ,

दो गज की दुरी ,

मास्क है जरुरी,

में पक चुकी थी ,

और वो मस्त मलंग ,

अपनी दुनिया में ,

अलमस्त ,

रेडियो पर उस वीराने में ,

मुरादाबाद के एक श्रोता की फरमाइश पर  ,

किशोर कुमार की आवाज में ,

अंदाज फिल्म से ,

शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध ,

" ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना ,

यहाँ कल क्या हो , किसने जाना ?"

गीत सुन रहा था।


Monday, February 15, 2021

मेरी कवितायेँ

 

मुझे पता है मेरी कवितायें ,

व्याकरण के नियमों पर खरी नहीं उतरती ,

साहित्य के मापदंडो पर कही नहीं ठहरती ,

न कोई गूढ़ रहस्य उजागर करती है ,

मगर फिर भी मैं लिखता रहता हूँ,

बेतरीब, लिखना मुझे अच्छा लगता है,

एक अधूरापन , एक खालीपन

कुछ कमियाँ  जैसा मेरी कविताओं में झलकता है ,

वैसा ही तो जीवन भी होता है ,

सब कुछ पूर्ण हो जाता तो ,

फिर क्या कविता और क्या जीवन ,

पूर्णता के बाद फिर क्या बचता है। 

 

Tuesday, February 2, 2021

बजट और मिडिल क्लास

 

हर बार टकटकी लगती है ,

उस लाल पोथी पर ,

फिर उम्मीद बंधती है ,

मगर धराशायी होती है।

 

हमेशा बजट में ,

उच्च वर्ग या निम्न वर्ग ही ,

छाये रहते है ,

मिडिल क्लास वाले ,

जाने किस उम्मीद में रहते है।

 

लम्बा चौड़ा भाषण ,

हजारो करोड़ों का आबंटन ,

जाने किसके हिस्से आता है ,

मिडिल क्लास फिर टैक्स भरने ,

जी जान से लग जाता है।

 

हर बार की यही कहानी है ,

मिडिल क्लास के आँसू नहीं , पानी है ,

ठगा सा जाता है हर बार ,

एक और सेस भरने की तैयारी है

 

हर बजट ये कह जाता है ,

मध्यम वर्ग तुम संघर्ष करो ,

सरकार तुम्हारे ही साथ है ,

मेहनत करो , कमाओ और ईमानदारी से टैक्स भरो ,

तुम्हारे लिए बजट में बस यही प्रावधान है।

 

Friday, January 29, 2021

यादें

 


अकेला बैठा हूँ लेकिन अकेला नहीं हूँ ,

इक यादों की गठरी है , गाँठ खोल रहा हूँ।

 

परत दर परत संजो कर रखी है यादें ,

उनको झाड़कर फिर करीने से रख रहा हूँ। 

 

इक परत में बचपन झाँक रहा है ,

इक परत में माँ बाबूजी का दुलार छलक रहा है। 

 

वो पहले गुरु जी रौबीले से दिख रहे है इक परत में ,

विद्यालय का वो आँगन चहक  रहा है। 

 

कुछ बचपन के दोस्त कंधे में हाथ रखकर अब भी खड़े है ,

मैं ही शायद उन्हें छोड़ गया वो तो अब भी वही अड़े है। 

 

वो मेरे पुरखो का बनाया घर का आँगन बिलकुल नहीं बदला है ,

मेरे पास ही उसकी सुध लेने का अब समय नहीं है। 

 

विद्यालय की वह प्रार्थना अब भी कानो में गूंजती है,

कैसे भूल गया मैं , शायद मुझमे ही कोई कमी है। 

 

वो सपने दबे पड़े है इक परत में , कितनी धूल जम गयी है ,

झाड़ा जरा तो मेरी ही हँसी छूट रही है। 

 

इक परत में अब भी जज्बात बंद पड़े है ,

रिस रहा है जैसे अंदर कुछ पिघल रहा है। 

 

समय की गति का भी क्या चक्कर है ,

भागते रहे उम्र भर , परिणाम वही सिफर है। 

 

हासिल है तो ये कुछ यादें ही है , तह करके रखता हूँ फिर से ,

कुछ की तुरपाई कर आगे बढ़ना ही है, यही तो जीवन सफर है।   

 

अकेला नहीं हूँ मैं कभी भी इस राह में , न जाने कितनी दुआओ का असर है,

न कोई गिला , न सिकवा किसी से , जो मिला , वो क्या कम है। 

 

अभी सफर लम्बा तय करना है , न जाने कितनी और परतें जुड़ेगी ,

जरुरी है समय निकालूँ और टटोलू - यही यादें तो असली पूँजी है। 

 

Wednesday, January 20, 2021

संतति

 

ये धरती न मेरी है , न तुम्हारी

हम सिर्फ कुछ समय के लिए ,

इसके सरंक्षक है ,

यह धरती आने वाली पीढ़ी की है ,

और हमें यह धरती उन्हें सौंप कर जाना है ,

जैसे हमें अपनी पुरानी पीढ़ी से थाती के रूप में मिली है।

 

हम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना ही ,

इस धरती को सँवारने और बिगाड़ने के जिम्मेदार है ,

बाकी ईश्वर की जीवित रचनाये तो आज भी वैसी ही जी रही है ,

जैसे वो सदियों से जीती आ रही है,

हमें ही जिम्मेदारी लेनी होगी ,

इसके अच्छे या बुरे की ,

और हमें ही परिणाम भुगतना होगा,

हमारी संतति हमें बस इसी के लिए याद रखेगी।

 

 

 


Thursday, January 14, 2021

नयी कविता

 

इंस्टाग्राम में चमकती तुम ,

फेसबुक पर इठलाती हो ,

व्हाट्सप्प पर आकर ,

गुमसुम क्यों हो जाती हो। 

 

सुना तो है 4 जी बड़ा अच्छा चलता है,

तुम्हारे शहर में ,

सब नेटवर्क के टावर भी खड़े है ,

मगर कॉल का जवाब देने में क्यों कतराती हो। 

 

अब तो कितना आसान हो गया सब ,

चिट्टी पत्री , छुप कर निहारना - सब पुरानी बातें है ,

अब तो कनेक्टेड रहते है हरदम ,

ज्यादातर ऑफलाइन क्यों रहती हो। 

 

इजहार करना कितना आसान हो गया अब ,

बिना शब्दों के भी काम चल जाता है ,

बने बनाये भाव व्यक्त हो जाते है ,

तुम इमोजी क्यों इस्तेमाल नहीं करती हो।