Wednesday, August 9, 2023

पहाड़ों की एक ढलती शाम

 

इक पहाड़ से उगा ,

दूसरे पहाड़ से डूबेगा ,

इन दोनों पहाड़ों के बीच ,

पहाड़ों का एक आकाश ,

उस पहाड़ से जब उगा ,

तो उस पहाड़ में हुआ सवेरा ,

अब इस पहाड़ से नीचे ढलेगा ,

उस पहाड़ पहले होगी सांझ ,

दोनों पहाड़ों को बराबर मिलेगी ,

दिव्य भास्कर की किरणों की बरसात ,

फिर उतरेगा एक पहाड़ से अँधियारा ,

नीचे तलहटी पर घुप्प अन्धकार ,

टिमटिमायेगी कुछ कृत्रिम रोशनाईयां ,

कुछ इस पहाड़ , कुछ उस पहाड़ ,

बस सुनाई देगा अँधेरे में ,

बहते पानी का शोर ,

दूर कही किसी घर में ,

किवाड़ बंद करने की आवाज ,

उतर आयेंगे जंगलों से ,

तेंदुए , बाघ और सियार ,

सन्नाटे को कभी -कभार चीरती ,

दूर कही सड़क पर चलती मोटर कार ,

मनमोहक दृश्य ,नयनभिराम ,

जवान होती रात में ,

पहाड़ खामोश और विराम ,

इन्तजार में अगले सूरज का ,

तब तक पहाड़ों में अटूट विश्राम। 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, July 4, 2023

अल्हड़पन

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था। 

 

मंजिल का पता नहीं था मगर ,

बेमकसद घूमना एक शगल था ,

नफे -नुकसान की किसको परवाह थी ,

हर शक्ल में इक दोस्त दिखता था।

 

आसमां को मुट्ठी में करने की ललक थी ,

हवाओं से बातें अक्सर होती थी ,

पता नहीं था -क्या होगा भविष्य में ,

पल -पल जी लेने की अजब हसरत थी। 

 

चाँद को आगोश में लेने का सपना था ,

सूरज से आँखे मिलाने की जुर्रत  थी ,

इक नन्हा सा ख्वाब पलता था आँखों में ,

हमारी कागज़ की नाव पानी में तैरती थी। 

 

खुली आँखों में कुछ सपने थे,

हर सपने की इक हरारत थी ,

कहाँ परवाह थी तूफानों की ,

तूफानों से अपनी नूरा -कुश्ती थी। 

 

नियम -कानून सब बासी लगते थे ,

विद्रोह की चिंगारी सुलगती थी ,

अम्मा -बाबूजी की सुलझी बातें,

दिमाग में उलझन पैदा करती थी।  

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था।

Monday, June 26, 2023

ठौर

 

ठौर कहाँ ढूढें ये पग ,

इन्हे तो चलते जाना है,

नियति में इक सफर लिखा है,

आज यहाँ, कल न जाने कहाँ जाना हैं।

 

गठरी हल्की रख मुसाफिर ,

कहाँ कोई स्थायी ठिकाना है ,

कर्मों की एक राह चलाचल ,

आगे किस्मत का खेला है।

 

कोई गर छूटा है , कोई मिल जायेगा ,

भावों का समंदर है , अनुभव से सीख जायेगा ,

हार क्या , जीत क्या , बेमानी सब यश -अपयश ,

चलते -चलते इक दिन मंजिल पा जायेगा।

Tuesday, June 20, 2023

चलाचल

 

चल चलाचल अपनी धुन में, दुनिया की फ़िक्र छोड़।

कहते रहने दे दुनिया को , तू अपनी राह खोज।।


 कहने -सुनने में वक्त जाया न कर , मंजिल बहुत दूर।

समय निश्चित है तेरे पास , ये एक क्षण भी मत भूल।।

 

मिले सलाह , जँचे दिल को - कर ले कबूल।

बेहतर कर खुद को रोज़ , बना ले इक ये उसूल।।

 

जो मिले -स्वीकार कर , फूल मिले या बबूल।

स्वस्थ रख खुद को , इससे बड़ा नहीं कोई मूल।।

 

सरल , सहज और सुन्दर है जीवन पथ ।

व्यर्थ की चिंताओं में वक्त गँवाया मत कर।

 

खोने जैसा कुछ नहीं यहाँ ,मुस्कराते हुए आगे बढ़।

सफर अकेले का ही है , जो मिले , कदम बढ़ाये चल।।

 

हार -जीत , यश -अपयश - सब वक्त की बातें।

एक यात्रा है ये "आनन्द ", अपनी मौज में चला कर।।

Monday, June 12, 2023

स्याह सच

  

शामिल जिस कहानी में हम हो ,

जरुरी नहीं - सब में हीरो ही होंगे,

न जाने कितनी कहानियों में ,

हम विलेन भी तगड़े रहे होंगे।

 

जरुरी नहीं आपकी जीत ,

सबकी ही जीत होगी ,

किसी न किसी के मन में ,

हार की जरूर टीस होगी।

 

जरुरी नहीं की सिर्फ ,

दुआओ में शामिल रहोगे सबकी ,

जाने -अनजाने किसी की ,

बद दुआओं में भी ज़िन्दगी शामिल होगी।

 

नजर और नजरिये का फेर है सब ,

राय परिस्थितियों पर निर्भर रहेगी ,

उजाले की ही उम्मीद बेमानी है ,

कही तो स्याह रात भी होगी ।

Sunday, May 7, 2023

पैमाना

 

अगर अब भी आपके पैर ,

मिट्टी को छूते है तो ,

सफल नहीं हो आप ,

नया पैमाना है तरक्की का ,

कौन कितना ऊपर है ,

मिट्टी से - वही सफल है। 

 

हमने अब मिट्टी से संपर्क ,

तोड़ना शुरू कर दिया है ,

एक परत बिछानी शुरू कर दी ,

कभी कंक्रीट की , कभी गलीचे की ,

जमीन में पैर रखने से भय ,

और खतरा लगने लगा है। 

 

अब पैरों में मिट्टी लिपटना ,

शुभ संकेत नहीं है , अपशकुन हैं ,

ढक दो जहाँ -जहाँ भी मिट्टी है ,

चढ़ा दो परत -दर -परत ,

मिट्टी किसी काम की नहीं हैं ,

मिट्टी से मिट्टी होने तक यही दूरी ,

सबको अब हवाओं में लटकाये है ,

त्रिशंकु बन बैचैन रहने की ,

यही यात्रा अब सफलता की सूचक हैं। है। 

Wednesday, April 19, 2023

नियम

 

प्रकृति का अपना नियम है संतुलन का ,

उसके लिये कोई अमीर -गरीब होता है क्या ?

 

कुछ भी अकारण नहीं होता जहाँ में ,

किसी का नफा , किसी का नुकसान नहीं होता क्या ?

 

माना कि हरेक की अपनी क़िस्मत होती है ,

कर्मों से बहुतों ने किस्मत बदली नहीं क्या ?

 

सभी बँधे है साँसों की एक अदृश्य डोर से,

आज तक कोई अमर हुआ है क्या ?

 

जितना गुरुर , अहं पाल ले कोई ,

एक दिन मिट्टी में मिला नहीं क्या ?

 

हर रिश्ते की एक अहमियत है ,

अपेक्षा रखने से पहले उपेक्षा देखी है क्या ?

 

सुख़ -दुःख तो आते -जाते रहेंगे ,

वक्त कभी सदा सा रहता है क्या ?

 

कर्मों का स्पष्ट विधान है " आनन्द ",

बिना बीज के कोई पेड़ उगा है क्या ?

 

ज़िन्दगी तो जीना चाहती है हमारे साथ ,

हमारे पास उसकी सुनने के लिए वक्त है क्या ?

Sunday, April 16, 2023

हसरतें

  

या तो हसरतें जगाती है या जिम्मेदारियाँ ,

दिल तो कहता है - जो है ,जितना है -जिये जा।

 

कहाँ दिल लगता है नौकरी -चाकरी में ,

धन के बिना फिर औकात है क्या?

 

मौज में तो हर कोई रहना चाहता है ,

उस मौज का कोई इंतजाम है क्या?

 

दौड़ तो सभी रहे है "आनन्द " यहाँ ,

हर दौड़ का अंजाम जीत है क्या?

 

किंकर्तव्यविमूढ़ सा हर शख्श यहाँ ,

चौराहे पर खड़ा सोच रहा जाऊँ कहाँ ?

 

दिल तो कहता है सरल है ज़िन्दगी ,

दिमाग को उछलने की जरुरत है क्या ?

 

बेलगाम दौड़ है सब कुछ समेटने की ,

जो समेटा है उसको भरपूर जिया क्या ?

 

आज खपाना है कल की चिंता में ,

वो कल किसी के हिस्से आया है क्या ?

 

या तो हसरतें जगाती है या जिम्मेदारियाँ ,

दिल तो कहता है - चादर तान , सो जा।

Sunday, April 2, 2023

शब्द

 

लिख कम , पढ़ ज्यादा रहा हूँ आजकल ,

शब्दों की जादूगरी समझ रहा हूँ आजकल। 

 

शब्द पंक्ति दर पंक्ति बहुत कुछ कहते है ,

मगर, खाली स्थानों को भी समझ रहा हूँ आजकल। 

 

भावों को पिरोना आसान काम नहीं है ,

शब्दों का उचित चयन सीख रहा हूँ आजकल। 

 

जो लिखा है , उससे ज्यादा अनलिखा होता है ,

दो शब्दों के बीच फ़ासला समझ रहा हूँ आजकल। 

 

लिखे हुए को पढ़ना इक अलग बात है ,

लिखे हुए का मर्म समझ रहा हूँ आजकल। 

 

अभिव्यक्ति का वरदान है ये शब्द ,

कब, कैसे, क्यों,क्या- समझ रहा हूँ आजकल।  

 

तीर की मानिंद है ये शब्द ,

सार्थक संधान सीख रहा हूँ आजकल। 

Monday, March 27, 2023

मौसम

 

मौसम भी आजकल गजब फिरकी ले रहा है ,

इंसानी फितरत को बराबर टक्कर दे रहा है ,

बस अभी एक कमी रह गयी है  फिर भी ,

मौसम फिर भी बदलने की पूर्वसूचना दे रहा है। 

 

गिरगिटों ने अब रंग बदलना छोड़ दिया है ,

इंसानों ने उनसे ज्यादा रँग बदलना सीख लिया है ,

आरोप है उनका - वो सुरक्षा के लिये रंग बदलते है ,

इंसान तो फायदे के लिये रंग बदल रहा है। 

 

साँपो ने भी दुहाई देनी शुरू कर दी है ,

उनके डसने का असर कम हो रहा है ,

इंसानी जुबान में कही ज्यादा विष है अब ,

बिना घाव किये ही तार -तार कर रहा है। 

 

मिट्टी  के लिये बबूल उगाना आसान है अब ,

उर्वरा शक्ति का तो सब नाश हो रहा है ,

जिस पानी को बचाना चाहिये बूँद -बूँद ,

वही पानी जहर बन पाताल रिस रहा है। 

 

शुद्ध हवा की चाह मन में , भटक रहा है ,

न जाने किसको -किसको कोस रहा है ,

जिम्मेदारी किसके मत्थे डाले हालातों की ,

खुद को पाक साफ़ घोषित कर रहा हैं।