Monday, April 11, 2022

सच

 

मुझे "सच " लिखने में डर लगता है ,

क्यूँकि "सच" चीथड़े कर देता है झूठ के ,

नकाब हटा देता है चेहरों से ,

खोल देता है परत दर परत झूठ की ,

और सब " उजाला " कर देता हैं ,

लेकिन इस उजाले को देखने की ,

ताकत किसमे बची है अब ,

हमें तो अब झूठ में जीने में ,

मजा आने लगा है और ,

वही सच लगने लगा है ,

जो भी लिखना चाहता है "सच",

उसकी बातों पर किसको अब विश्वास है ,

न जाने क्यों फिर भी कुछ सिरफिरे ,

सच की तलाश में भटकते है ,

और फिर एक दिन गुमनाम ,

जीवन जीने को मजबूर होते हैं,

पता सबको हैं , अंत में " सच "

एक न एक दिन उभर ही आयेगा ,

अँधियारे को मात देकर ,

झक "उजाला " कर जायेगा ,

मगर इस अंतराल में ,

"झूठ " अपनी बाजी जीत जायेगा। 


Tuesday, March 22, 2022

खुशियाँ

 

तू धीरे -धीरे ही सही , कदम बढ़ाये जा।

न सोच , कोई क्या कहेगा , लक्ष्य जगाये जा।।

 

जूनून पर तेरे हँसने दे , उसको सबल बनाये जा।

अँधेरे तेरे हिस्से जो आज है , जुगनू बन चमकाये जा।।

 

उजाले तेरे हिस्से के , आलिंगन को तैयार खड़े हैं।

बिना थके , बिना हारे - अलख दिल में जलाये जा।।

 

तेरा तुझसे ही मुकाबला , जीत - हार का संशय कहाँ।

परिणाम जो भी रहे कर्मों के, अपना अनुभव बढ़ाये जा ।।

 

खोने के लिये कुछ भी नहीं तेरे पास।

जो भी मिले , उसकी खुशियाँ मनाये जा।।

Friday, February 25, 2022

युद्ध

   कुछ सनक ,

कुछ महत्वाकांक्षायें

धकेल देती है ,

मानवता को ,

युद्ध की तरफ ,

और कुछ गिद्ध ,

ताक में रहते है ,

अपना फायदा ,

सोचकर ,

हारने वाला ,

पछताता है ,

और जीतने वाला ,

सोचता है ,

क्या मिला उसे ,

एक भूमि का टुकड़ा छोड़कर ,

युद्ध की परिणीति ,

शोक से ही होती है ,

दोनों तरफ ,

हुक्मरान पीठ ठोकते ,

टीस जनता पर,

जो चाहती रही हमेशा ,

गुजर जाये उम्र ,

शांति और सुकून पर।

 

रौंद दिये जाते है ,

घरौंदे ,

खेत -खलिहान ,

रक्त बिखर जाता है ,

सरेआम सड़क पर ,

बिखर जाती है मानवता ,

दिल के टुकड़े ,

बिखर जाते है इधर -उधर ,

मिटा दिए जाते है ,

हर निशाँ इंसानियत के ,

कुचल जाती है भावनाएँ ,

लोहे के पहियों पर ,

बारूद बिखर जाता है ,

मिट्टी पर ,

जो उगलती थी ,

अनाज -लहलहा कर ,

कितने सपने चकनाचूर ,

कितनी औलादें अनाथ ,

कितनी कीमत चुकाओगे ,

सिर्फ एक युद्ध लड़कर।

 

Friday, February 4, 2022

बिसात

 

लिखता हूँ, मिटाता हूँ ,

हर्फ़ -दर -हर्फ़ जोड़ता हूँ ,

ज्वार जज्बातों का उतरे ,

कागज़ काले करता हूँ। 

 

लिखने को यूँ तो बहुत है ,

विषयों की कोई कमी नहीं है ,

हर बार, मगर , दिल को छलता हूँ ,

हाँ , सच लिखने से डरता हूँ। 

 

मायूसियाँ , दर्द और दुःख बहुत है ,

उसकी बयानगी से क्या फायदा ,

गढ़ता हूँ इक नया शब्दजाल ,

यही मेरे पास , इक उम्मीद देता हूँ। 

 

सबका अपना -अपना संघर्ष हैं ,

उम्मीदों का एक पहाड़ ,

जगा रहें पथ पर, इक विश्वास ,

शब्दों का मरहम देता हूँ। 

 

वक्त की बिसात है , हम सब मोहरे ,

परिस्थितयों का मोहताज नहीं ,

जो ,जहाँ , जैसा मिले ,

स्वीकार कर , आगे बढ़ता हूँ। 

Monday, January 10, 2022

वक्त

 


फितरत है वक्त की,बदलते रहने की,

जो भी है , जैसा भी है - बदल जायेगा ,

कर्मों की धूणी हैं और किस्मत की झोली ,

धैर्य रख , इक दिन सबका आयेगा। 

 

ठहरता कहाँ है किसी एक के पास ,

इसके तराजू में हरेक तोला जायेगा ,

मुलाकात तय है कर्मों और किस्मत की ,

हिम्मत रख , तेरे हिस्से का तुझे मिल जायेगा।