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Friday, October 3, 2025

जीवन संसार

  

आशा और निराशा के मध्य ,

झूलता रहता है इक मन ,

होनी -अनहोनी की आशंकाएँ ,

चिंतित रहता है  मन ,

समय की मंथर गति में ,

छुपे न जाने कितने राज ,

राजा बने रंक-रंक बने महाराज ,

मन की बेचैनियाँ बहुत ,

इच्छाओं का है अम्बार ,

जिम्मेदारियाँ रीढ़ झुकाये ,

जीवन देखता बस गुबार ,

सुकून को तरसता मन ,

मस्तिष्क करे हुँकार ,

लाभ -हानि के चक्कर में ,

फँसा हुआ जीवन संसार। 

 

पार कैसे लगे ?

बहुत टेड़ा है ये सवाल ,

सबके अपने अपने लक्ष्य ,

सुकून के सबके अपने द्वार ,

समर पल रहा सबके भीतर ,

किसी की जीत , किसी की हार ,

दौड़ में  शामिल सभी,

सबका अपना अपना भाग्य ,

पल -पल जीता जो ,

परवाह नहीं -जीत हो या हार ,

स्वीकार कर हर परिणाम को ,

राग द्वेष सब दरकिनार ,

रिश्ते नातों को देता एक आकार ,

जीवन उसी का समझो - साकार। 

Wednesday, September 10, 2025

उद्देश्य

 न जाने कहाँ से लुढ़कते लुढ़कते ,

किनारे लगा था वो बड़ा सा पत्थर ,

किसी रोज़ जब नदी में बाढ़ आयी थी ,

बहुत कोशिशों से कोई न हटा पाया था ,

उस पत्थर ने एक तरफ नदी की धार रोक दी थी ,

सब की उलाहना सहते सहते वो भी तंग था ,

"मेरी फूटी किस्मत " रोज़ रोता था ,

फिर आदत हो गयी उसे किनारे पर रहते रहते ,

नदी ने जमा कर दी थी गाद चारों ओर उसके ,

बच्चे आते थे , चढ़कर उसपर नदी में छलाँग मारते थे ,

वो रोज़ नदी को बहते देखता और ,

पुराने दिनों की यादों में खो जाता ,

फिर एक चौमास घनघोर बारिश हुई ,

नदी ने विकराल रूप धारण किया ,

जो मिला रास्ते में , सब निगल लिया ,

जब टकरायी उस शिला से,

बहुत वेग लगाया , खूब जोर लगाया ,

एक बार पत्थर का भी जी ललचाया ,

वो तो बहने के इन्तजार में ही पड़ा था,

मगर अचानक से उसे ख्याल आया ,

उसे सहारा मान नदी के उस किनारे ,

लहलहा रही थी फसलें ,

कुछ मकान बन चुके थे ,

सोचकर उसने अपना इरादा बदल लिया ,

नदी जितना वेग लगाती उसे उखाड़ने को ,

वो उतना ही धँसता गढ़ता चला जाता,

नदी ने समझाया , बुझाया उसको ,

साथ बहने की हिदायत दी ,

मगर टस से मस न हुआ वो हठी ,

अड़ा रहा और सारा पानी उतर गया ,

बच्चे -बड़े सब कहने लगे ,

इस "शिला" ने सबको बचा लिया,

शिला को अपना ठहरने का उद्देश्य समझ आ गया ,

दुत्कारें सब दुआओं में बदल गयी ,

शिला की तबसे पूजा होने लगी ,

कुछ भी बिना उद्देश्य के नहीं है जगत में ,

सबका इक प्रारब्ध है ,

वक्त का बस इन्तजार रहता है ,

अकारण  इस जगत में कुछ भी नहीं।     

 

Thursday, March 13, 2025

मकसद

 सारी चिंताएँ , 

कुछ खोने का डर , 

कुछ पाने की बेचैनी है।  


सारा संघर्ष , 

कुछ पाने का , 

कुछ और पाने का हैं।  


सारा दुःख , 

अपना नहीं है , 

दूसरों के सुःख का भी है।  


सारी अशांति , 

बाहर ही नहीं है , 

मन के भीतर भी है।  


सारी असफलताएँ , 

खुद की वजह से ही नहीं है , 

किसी के साथ नहीं देने से भी है।  


सारी सफलताएं , 

अकेले की नहीं है , 

बहुतों से साथ से भी है।  


सारी खुशियाँ , 

हमारी वजह से ही नहीं है , 

समय का साथ भी जरुरी है।  


हमारा जीवन , 

सिर्फ हमारा नहीं है , 

किसी न किसी मकसद का है।  


हमारा मकसद , 

हमने नहीं चुना है , 

उसने चुनकर भेजा है।  

Saturday, January 18, 2025

शिरा

मैं भी वो शिरा ढूंढ रहा है , 

जिससे पकड़कर , 

मैं भी चढ़ सकूँ , 

सफलता की ऊँचाइयाँ , 

मैं भी चख सकूँ ,

कामयाबी का स्वाद , 

न जाने क्यों , 

नहीं मिल रहा मुझे वो शिरा , 

कोशिश तो मैं भी कर रहा , 

रात -दिन , हर पल , 

जोश भी नित भर रहा , 

मेहनत से भी नहीं डर रहा , 

फिर क्या कारण हो सकता है , 

जो मुझे नहीं मिल रहा वो उपाय , 

जिससे मैं भी चढ़ सकूँ , 

वो सीढ़ियाँ , जिसे देख , 

दुनिया कहती है , 

हाँ , देखो , वह सफल हुआ।   

Tuesday, March 22, 2022

खुशियाँ

 

तू धीरे -धीरे ही सही , कदम बढ़ाये जा।

न सोच , कोई क्या कहेगा , लक्ष्य जगाये जा।।

 

जूनून पर तेरे हँसने दे , उसको सबल बनाये जा।

अँधेरे तेरे हिस्से जो आज है , जुगनू बन चमकाये जा।।

 

उजाले तेरे हिस्से के , आलिंगन को तैयार खड़े हैं।

बिना थके , बिना हारे - अलख दिल में जलाये जा।।

 

तेरा तुझसे ही मुकाबला , जीत - हार का संशय कहाँ।

परिणाम जो भी रहे कर्मों के, अपना अनुभव बढ़ाये जा ।।

 

खोने के लिये कुछ भी नहीं तेरे पास।

जो भी मिले , उसकी खुशियाँ मनाये जा।।

Wednesday, November 1, 2017

लक्ष्य


कोशिश तो कर , 
मंजिल मिलेगी जरूर।  

हौंसला रख , 
समय बदलेगा जरूर।  

कर्म पर विश्वास रख , 
हथेली की रेखाये बदलेंगी जरूर।  

परिश्रम की ताकत गजब , 
मरुस्थल से भी पानी निकलेगा जरूर।  

हुनर पर भरोसा रख , 
किस्मत बदलेगी जरूर।  

स्वयं को पहचान , 
पहचान बनेगी जरूर।  

लक्ष्य गर साफ़ है , 
तो पहुँचेगा जरूर।  

Wednesday, September 6, 2017

लक्ष्य



धीरे धीरे ही सही , 
आगे बढ़ रहा हूँ।  
रुक रुक कर ही सही , 
पैरो को अपने साध रहा हूँ। . 

आते हैं अवरोध , 
मगर उद्देश्य को हमेशा याद रखता हूँ ।    
सुनाने वाले बहुत हैं , 
मगर हर बात को दिल पर नहीं लेता हूँ।  

मुझे अपने पर यकीन हैं , 
ईश्वर को हमेशा साथ रखता हूँ।  
शुभचिंतको की दुआएँ बहुत हैं , 
इसलिए हर बार गिरकर उठता हूँ।  

देर होगी मगर अंधेर नहीं , 
हर निराशा का अंत करता हूँ।  
थोड़ा पीछे रह भी गया अभी तो क्या , 
दौड़ के अंत में अपनी विजय देखता हूँ।  

Monday, January 2, 2017

खुद की , खुद से ........( 2017 की पहली कविता )

 



क्या हैं ? हम में वो जुनून और वो जज्बा की
हम खुद से मुकाबला करे
रोज़ अपने लिए कुछ पैमाने तय करे औरऔर उन पर खरा  उतरे
अपने लिए खुद नियम बनाये और उन पर अमल करे
क्यूंकि हमें दुसरो की नक़ल नहीं करनी
हमारा तो खुद से मुकाबला हैं
अपने को बेहतर से और बेहतर करने की जंग
हमारे ही भीतर तो हैं। 

हमें हमारी सोच बदलनी होगी
अपने पंखो को परवाज देनी होगी
खुला आसमान हैं ये जहाँ
क्षितिज की तलाश हमें खुद करनी होगी ,
  रुकना होगा , झुकना होगा 
अपने लक्ष्यों तक अपने जूनून से पहुचना होगा ,
 लगेगी थोडा देर भले ही ,
हार ने मानने का जज्बा रखना होगा
हिम्मत  रखनी पड़ेगी दुनिया बदलने की
हर हालात में मुस्कराये ये कलेजा रखना होगा। 

दुनिया हमें पागल कहे तो भी अपना रास्ता खुद चुनना होगा
सफलता और असफलता को बिना ध्यान में रखे
हमें  अविरल बहना होगा,  
भेडचाल में चल के बहुत देख लिया अब
अपने लिए खुद का  मुकम्मल जहाँ बनाना होगा ,
 अपने ज़िन्दगी कारवां को हमें
और बेहतर बनाना होगा।