Tuesday, November 7, 2023

जीवन नैय्या

 


 जितना आपको जानना चाहता हूँ ,

उतना गहरा आपको पाता हूँ ,

मैं जड़बुद्धि , हे ! परमेश्वर ,

तेरी ओट में रहना चाहता हूँ। 

 

तेरे प्रकाश पुँज से उत्पन्न ,

तुझमें ही इक दिन विलीन होना है ,

तेरी रहमतों से ही ईश्वर,

जीवन पथ मेरा चलना हैं। 

 

न कोई शिकायत मेरी ,

न कोई शिकवा है ,

जो खोया -पाया नसीब मेरा ,

तेरी तो बस रहमत हैं।  

 

सुःख -दुःख के पलड़े ,

जीवन पथ चलते रहते है,

तुझ पर अटूट विश्वास से ,

दिन मेरे कटते रहते है।

 

सौंप देता हूँ रोज़ अपनी नैया ,

तू ही बस मेरा खैवय्या है ,

चिंता फिर किस बात की मुझे ,

जीवन सागर पार उतरना है। 


Thursday, November 2, 2023

सागर स्तुति

 


हाथ जोड़े तट पर बीत गए दिन तीन ,

जलाधीश का फिर भी मन न पिघला,

आँख बंद , ध्यान लगाए एक शिला पर ,

करते रहे याचना, स्तुति करे जगदीश। 

 

लक्ष्मण पुनि -पुनि समझाये ,

सामर्थ्य पर विश्वास करो कौशलधीश ,

शांति से जहाँ सुलझ जाये बात ,

क्यों उपयोग करो तूणीर –तीर कहे कुलधीश ।  

 

अनुनय -विनय गुण है वीर का ,

उसको सुशोभित होती है ,

युद्ध तो बहुत सरल मार्ग है ,

तलवार फिर शीश  माँगती है।  

 

जड़बुद्धि  विनय समझ न पाया ,

लोभी से कैसे दान की आशा ,

कुटिल न समझे प्रीत की भाषा ,

धैर्य , संयम की भी एक सीमा। 

 

लाओ , लक्ष्मण - तूणीर लाओ ,

अब धनुष पर अग्नि बाण संधान होगा ,

सूखा दूँगा इस जलातिरेक को ,

इस मूर्ख को अब ज्ञान न दूँगा। 

 

क्रोधित राम की आँखे हुई लाल ,

प्रत्यंचा चढ़ा , धनुष हाथ लेकर की टँकार ,

कांप उठे सब जल -थल- आकाश चराचर ,

"त्राहिमाम-त्राहिमाम " जग गया सागर। 

 

प्रकृति विधान सब आपका प्रभु ,

सब आपके आदेश अधीन ,

मैं जड़बुद्धि कैसे न मानूँ ,

जब साक्षात् खड़े हो जगदीश। 

 

युक्ति मैं बतलाता हूँ ,

सागर पार कराता हूँ ,

रामकाज में विघ्न कैसा ,

खुद का परलोक सुधारता हूँ। 

 

Monday, October 16, 2023

मन के मोती - भाग २

 

मन के मँजीरें बजे कैसे अब ,  कृत्रिम सब जग हुआ जाय। 

कृत्रिम हुआ जब जग सारा , वो भाव फिर कहाँ से आय।१। 

 

धीरज खोया , विश्वास खोया , खो दिये सब संस्कार।

मूल बदल गये समाज के ,  टिके कैसे अब संसार। २।

 

बीत रही ज़िन्दगी , समेटने सुःख के सब साज। 

मृगतृष्णा सी प्यास बड़ी , दुःख के सब काज। ३।

 

बड़े -बुढ़न की बात अब कहाँ किसके कान सुहाय। 

देख रहे इक कोने से अब किसको मर्म समझाय ।४।

 

उन्नति -उन्नति सब कहे , सब  चमकदार हो जाय।

राख बिछी है जो तल पर , वो किसके हिस्से आय। ५।

 

Thursday, October 12, 2023

मन के मोती - भाग -१

 

गूगल भये सबसे बड़े गुरु , फेसबुक बिछुड़े मिलाय। 

घोर सच है अब , अंतरजाल पटल बिन रहा न जाय ।१।

 

लद गए जमाने धीरज के, अब न धैर्य-संयम बरता जाय। 

एक क्लिक पर दुनिया सामने , जो चाहे वो हो जाय।२।

 

बदल गयी है दुनिया , बदल गए है सब लोक । 

बदले नहीं जो अब भी , "पागल " कहते लोग। ३।

 

दौड़ लगी बड़ी भयंकर , कोई कैसे क्यों पीछे छूट जाय।

साम -दंड -भेद सब , पाप -पुण्य चिंता किसको सताय। ४।  

 


कह विधान नौकरी का -" हाँ जी " की नौकरी , "ना जी " का घर।
करता कोई काम मेहनत-लगन से, लेकिन चाटुकारों की जय -जय।५।

 

Tuesday, October 10, 2023

विश्वास

 

मैं सूक्ष्तम रूप तेरे जगत का ,

तुम गोचर -अगोचर जगत के ,

तुम ब्रह्माण्ड के कण -कण बसे,

मैं धूल का इक कण जैसे। 

 

मैं भेड़ सा चरता तेरे उपवन में ,

तुम चरवाहे मेरे ,मर्जी हाँके ,

तेरी ओट में रहता हरदम ,

तेरी मर्ज़ी - सुःख -दुःख कटे। 

 

जो समय दिया,जितना दिया तूने ,

नियति बाँधी है मेरे गले ,

न कोई गिला,न कोई शिकवा ,

मेरे हिस्से ही कर्मफल मेरे। 

 

बस इतनी सी विनती प्रभु ,

जो भी आये मेरे हिस्से ,

शीश नवा शिरोधार्य करुँ ,

विश्वास तुझपर कभी न टूटे। 

 

Saturday, October 7, 2023

श्रीराम वंशावली गाथा

ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए ,

मरीचि फिर कश्यप जने ,

कश्यप के सुत विवस्वान हुए ,

विवस्वान से प्रतापी वैवस्वत मनु हुए। 

 

मनु के कुल में इक्ष्वाकु जन्मे ,

कुक्षि -विकुक्षि से बाण हुए ,

बाण पुत्र अनरण्य चले ,

अनरण्य से महाराज पृथु जन्मे। 

 

पृथु वंश फिर त्रिशंकु बढ़ाये ,

त्रिशंकु से धुन्धुमार हुए ,

धुन्धुमार से युवनाश्व बढ़े ,

युवनाश्व से महान मान्धाता जने। 

 

मान्धाता का तेज सुसन्धि में आया ,

सुसन्धि से ध्रुवसन्धि में तेज बढ़े ,

भरत , ध्रुवसन्धि पुत्र कहलाये ,

इक्ष्वाकु कुल का मान बढ़ाये। 

 

भरत , असित को राजकाज सौंपे ,

असित के पुत्र सगर कहलाये ,

सगरपुत्र असमञ्ज साकेत संभाली ,

असमञ्ज फिर अंशुमान तात कहलाये। 

 

दिलीप जन्मे फिर भरत कुल में ,

महान भगीरथ  पुत्र रूप में पाए,

भगीरथ से ककुत्स्थ जन्मे ,

फिर रघु जैसा प्रतापी राजा पाये। 

 

रघुकुल की हुई बहुत बड़ाई ,  

प्रवृद्ध, शंखण, सुदर्शन,अग्निवर्ण

शीघ्रग , मरु, प्रशुश्रुक ,अम्बरीश,

सब रघुकुल तिलक कहलाये। 

 

अम्बरीश के कुल में नहुष हुए ,

नहुष कुलदीपक ययाति बने ,

ययाति से नाभाग जन्मे ,

नाभाग से शूरवीर अज हुए। 

 

अज के घर फिर दशरथ जन्मे ,

अयोध्या में राज -काज फले ,

दशरथ के भाग्य में पुत्ररूप में ,

नारायण स्वयं " राम " बने। 

 

धन्य है भाग्य अयोध्या के ,

साकेत नगरी खुद साक्ष्य बने ,

कण -कण राममय जिस भूमि का ,

वो " अयोध्या जी महाराज " कहलाये। 


Monday, September 18, 2023

गाँव और शहर

 

बहुत खूबसूरत दिखते है ये शहर ,

आसमां से बातें करती इमारतें ,

चौड़ी सड़कों पर सरपट भागती ,

लम्बी - चौड़ी , चमाचम गाड़ियाँ,

खिलते मुस्कराते बाज़ार गुलजार ,

लोगों के झुण्ड ही झुण्ड ,

सब अपने आप में व्यस्त ,

सजावट करीने की, फैशन हजार ।

 

एक मेरे गाँव का बाजार ,

मिलकर दूकान बस चार ,

फुरसत ही फुर्सत सबको ,

पूछ लेते है पूरा हाल समाचार ,

न भी हो पल्ले में , कल दे देना ,

सामान बैग में ठूँस देते है दूकानदार ,

चाय की एक छोटी सी टपरी पर ,

चार लोग ही नाप डालते है सारा संसार। 

 

अच्छा शहर भी है , गाँव भी सुन्दर,

न एक दूसरे से कमतर , न बेहतर ,

किसी को सुकूं गाँव में ,

किसी का सपना है शहर ,

दौड़ना सब जगह ही है पेट खातिर ,

अंतर बस इतना है ,

शहर चाहता है अब गाँव सा सुकून ,

और गाँव हो जाना चाहता है शहर। 

 

Friday, September 15, 2023

बताओ कौन ?

वो है तो अब जान है , 

नहीं तो सब सुनसान है , 

वो थोड़ी दूर रहे , 

तो कंपन है , 

वो पास तो , 

उँगलियों पर जहान है , 

वही सच्चा साथी अब , 

वही खोलता ज्ञान के द्वार है , 

उसकी नजरों से दुनिया दिखती अब , 

वही सब प्रश्नो का समाधान है , 

उसके न होने से बेचैनियां बहुत , 

होने से सुकून बहुत है ,

बूझो जरा -कौन है ? 

हरदम हमारे जो साथ है।  


Wednesday, August 9, 2023

पहाड़ों की एक ढलती शाम

 

इक पहाड़ से उगा ,

दूसरे पहाड़ से डूबेगा ,

इन दोनों पहाड़ों के बीच ,

पहाड़ों का एक आकाश ,

उस पहाड़ से जब उगा ,

तो उस पहाड़ में हुआ सवेरा ,

अब इस पहाड़ से नीचे ढलेगा ,

उस पहाड़ पहले होगी सांझ ,

दोनों पहाड़ों को बराबर मिलेगी ,

दिव्य भास्कर की किरणों की बरसात ,

फिर उतरेगा एक पहाड़ से अँधियारा ,

नीचे तलहटी पर घुप्प अन्धकार ,

टिमटिमायेगी कुछ कृत्रिम रोशनाईयां ,

कुछ इस पहाड़ , कुछ उस पहाड़ ,

बस सुनाई देगा अँधेरे में ,

बहते पानी का शोर ,

दूर कही किसी घर में ,

किवाड़ बंद करने की आवाज ,

उतर आयेंगे जंगलों से ,

तेंदुए , बाघ और सियार ,

सन्नाटे को कभी -कभार चीरती ,

दूर कही सड़क पर चलती मोटर कार ,

मनमोहक दृश्य ,नयनभिराम ,

जवान होती रात में ,

पहाड़ खामोश और विराम ,

इन्तजार में अगले सूरज का ,

तब तक पहाड़ों में अटूट विश्राम। 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, July 4, 2023

अल्हड़पन

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था। 

 

मंजिल का पता नहीं था मगर ,

बेमकसद घूमना एक शगल था ,

नफे -नुकसान की किसको परवाह थी ,

हर शक्ल में इक दोस्त दिखता था।

 

आसमां को मुट्ठी में करने की ललक थी ,

हवाओं से बातें अक्सर होती थी ,

पता नहीं था -क्या होगा भविष्य में ,

पल -पल जी लेने की अजब हसरत थी। 

 

चाँद को आगोश में लेने का सपना था ,

सूरज से आँखे मिलाने की जुर्रत  थी ,

इक नन्हा सा ख्वाब पलता था आँखों में ,

हमारी कागज़ की नाव पानी में तैरती थी। 

 

खुली आँखों में कुछ सपने थे,

हर सपने की इक हरारत थी ,

कहाँ परवाह थी तूफानों की ,

तूफानों से अपनी नूरा -कुश्ती थी। 

 

नियम -कानून सब बासी लगते थे ,

विद्रोह की चिंगारी सुलगती थी ,

अम्मा -बाबूजी की सुलझी बातें,

दिमाग में उलझन पैदा करती थी।  

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था।