धीरे -धीरे हमारे चारों तरफ ,
इक मकड़जाल आकार ले रहा है ,
शनैः शनैः हम फँसते जा रहे है ,
और हमें मज़ा आ रहा है।
धीरे -धीरे पकड़ मजबूत हो रही है ,
जाल और कसा जा रहा है ,
आभाषी दुनिया का इक आवरण ,
जाल के ऊपर फैलाया जा रहा है।
छदम वातावरण असल पर हावी है ,
नये आख्यानों से जाल बुना जा रहा है ,
पँख उलझने लगे है महीन तारो से अब ,
आभासी क़ैदख़ाना तैयार हो रहा है।