निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
Sunday, October 22, 2017
Tuesday, October 17, 2017
Thursday, October 12, 2017
मोमबत्ती
ये मोमबत्ती भी न बड़ा तंग करती है ,
जलने के बाद अपनी बचे हुए धाँगे और ,
पिघले मोम से जगह गन्दा कर देती है ,
किया क्या इसने ?
अँधेरे में रौशनी देने के सिवाय ,
अपने को जलाया ही तो है ,
सब ताप सहन करने के बाद ,
नियति ही इसकी ऐसी थी ,
खुरच दो इसके सब निशाँ ,
कही भी कुछ रह न जाये ,
जगह चाहिए बिलकुल साफ़,
जब फिर अँधेरा होगा ,
जला लेंगे दूसरी मोमबत्ती ,
क्या कमी है हमारे पास।
Wednesday, October 11, 2017
ज़िन्दगी
हर किसी के लिए ज़िन्दगी के
मायने अलग ,
किसी के लिए चक्रव्यूह ,
किसी के लिए मृगतृष्णा ,
किसी के लिए काँटो का ताज
,
किसी के लिए फूलो की सेज ,
किसी के लिए संघर्ष गाथा ,
किसी के लिए भाग्य का खेल,
किसी के लिए अंतहीन दौड़ ,
किसी के लिए मोक्ष ,
किसी के लिए प्यार -मोहब्बत
,
किसी के लिए रंजिश का सफर
,
हर किसी के लिए ज़िन्दगी के
मायने अलग।
गरीब के लिए दो वक्त की रोटी
,
अमीर के लिए ऐशो आराम का जीवन
,
प्रेमी के लिए प्रेयसी ,
प्रेयसी के लिए प्रेमी जीवन
,
रोगी के लिए स्वास्थ्य ,
निरोगी के लिए भरपेट भोजन
,
माँ के लिए उसके बच्चे जीवन
,
पिता के लिए बच्चो का भविष्य जीवन ,
दोस्तों के लिए दोस्ती ,
दुश्मनो के लिए दुश्मनी ,
हर किसी के लिए ज़िन्दगी के
मायने अलग,
ऐ ! ज़िन्दगी तेरे इतने रूपों
को नमन।
कलाकार के लिए रंगमंच ,
खिलाडी के लिए खेल ,
कवि के लिए कविता ,
लेखक के लिए कहानी ,
नेता के लिए कुर्सी ,
किसान के लिए फसल ,
छात्रों के लिए पढाई ,
बच्चो के लिए मौज मस्ती
नौकरीपेशा के लिए सैलरी ,
बेरोजगारो के लिए नौकरी ,
सैनिको के लिए देशभक्ति ,
एक ज़िन्दगी , कितने रंग ,
शायद इसलिए कहते है रंगीन ज़िन्दगी।
कोई इसे क्षणभंगुर कहता ,
कोई ठोस धरातल ,
कोई नदी की संज्ञा देता ,
कोई कहता मरुस्थल।
कोई कहता खूबसूरत ,
कोई कहता दलदल ,
कोई कहता आज़ादी ,
कोई कहता सफर।
किसी के लिए जिम्मेदारियां
,
कोई अपने में ही मस्त मगन
,
ज़िन्दगी एक , रूप अनेक ,
ज़िन्दगी देने वाले तुझे शत
शत नमन।
मेरी नजर में बहती नदी है ज़िन्दगी
,
कही से शुरू होकर ,
कही दूर सागर में मिलना है
ज़िन्दगी ,
इस सफर में कही चंचलता ,
कही ठहराव ,
कही तेज बहाव ,
कही गहराई ,
कही कंकड़ पत्थरो में लुढ़कती ज़िन्दगी ,
कही पूजा योग्य ,
कही तिरस्कृत ,
कही उफान ,
कही शांतचित ,
लेकर अपने साथ कितने अनुभव
,
कुछ खट्टे , कुछ मीठे ,
सागर में मिलने से पहले ,
अविरल बहाव ही शायद है ज़िन्दगी।
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Monday, October 9, 2017
दिवाली के पटाखे और मिठाई
दीये बेचकर कुछ पैसे लेकर ,
वो मासूम अपने माँ से बोली ,
" माँ , आज दिवाली है ,
हम भी मनाते है ,
कुछ मिठाई और पटाखे हम भी लाते हैं। "
माँ ने उससे पैसे लिए और
हिसाब किताब करने लगी ,
और बोली ,
" सारे दीये तुझे तीन सौ रुपये में बेचने को बोला था ,
तू उन्हें दो सौ रुपये में ही बेच आयी ,
अब कहाँ से खरीदू पटाखे और मिठाई ?"
बेटी रुँआसी सी बोली ,
" अम्मा , सबने तय कीमत से कम बोली लगाई
किसी ने दो रूपये , किसी ने पाँच रुपये कम कीमत चुकाई ,
इसलिए तीन सौ रुपये के दीये दो सौ रुपये में ही बेच पाई। "
माँ बोली ,
" चल , कोई बात नहीं ,
डेढ़ सौ रुपये में घर चला लूंगी ,
पचास रुपये ले , भाई को साथ ले जा ,
जमकर लाना पटाखे और मिठाई। "
वो भाई का हाथ पकड़ बाजार चल दी ,
अब उसे मोलभाव करने की आज़ादी मिल गयी ,
बाजार में खो सी गयी ,
चंद पटाखे और कुछ लड्डू लेकर ,
दस रुपये माँ को लौटाती बोली ,
" अम्मा , शुभ दीपावली। "
वो मासूम अपने माँ से बोली ,
" माँ , आज दिवाली है ,
हम भी मनाते है ,
कुछ मिठाई और पटाखे हम भी लाते हैं। "
माँ ने उससे पैसे लिए और
हिसाब किताब करने लगी ,
और बोली ,
" सारे दीये तुझे तीन सौ रुपये में बेचने को बोला था ,
तू उन्हें दो सौ रुपये में ही बेच आयी ,
अब कहाँ से खरीदू पटाखे और मिठाई ?"
बेटी रुँआसी सी बोली ,
" अम्मा , सबने तय कीमत से कम बोली लगाई
किसी ने दो रूपये , किसी ने पाँच रुपये कम कीमत चुकाई ,
इसलिए तीन सौ रुपये के दीये दो सौ रुपये में ही बेच पाई। "
माँ बोली ,
" चल , कोई बात नहीं ,
डेढ़ सौ रुपये में घर चला लूंगी ,
पचास रुपये ले , भाई को साथ ले जा ,
जमकर लाना पटाखे और मिठाई। "
वो भाई का हाथ पकड़ बाजार चल दी ,
अब उसे मोलभाव करने की आज़ादी मिल गयी ,
बाजार में खो सी गयी ,
चंद पटाखे और कुछ लड्डू लेकर ,
दस रुपये माँ को लौटाती बोली ,
" अम्मा , शुभ दीपावली। "
Thursday, October 5, 2017
टेक्नोलॉजी और इश्क
टेक्नोलॉजी ने कमाल कर दिया ,
आज के इश्क को कितना आसान कर दिया ,
कबूतर और चिट्ठियों के दौर को पीछे छोड़ दिया ,
मोबाइल ने सब काम आसान कर दिया।
दूरियाँ सात समंदर की भी हैं तो क्या हुआ ?
व्हाट्सएप्प के वीडियो कॉल ने रूबरू कर दिया ,
फिर भी मिलना ही हैं तो ,
मेट्रो , एयरोप्लेन , कार से कही भी घंटो में पहुँच गया।
अब न सताती याद किसी की ,
तुरंत सेल्फी खींची और भेज दिया।
उपहार देना हो गर कुछ तो ,
ऑनलाइन आर्डर देकर सीधा उसके घर पहुँचा दिया।
गया वो जमाना जब छुप छुप कर मिलना होता था ,
शॉपिंग मॉलों के एयर कण्डीशनएड माहौल ने हल कर दिया ,
अब कोई नहीं डर फोटो या चिट्ठियां पकडे जाने का ,
एंड्राइड में पासवर्ड ने सब कुछ छुपा लिया।
टेक्नोलॉजी ने कमाल कर दिया ,
आज के इश्क को कितना आसान कर दिया ,
कबूतर और चिट्ठियों के दौर को पीछे छोड़ दिया ,
मोबाइल ने सब काम आसान कर दिया।
Tuesday, October 3, 2017
यादो का गलियारा
उन गलियों में जाना हुआ ,
जहाँ कभी हमारी सपनो की दुनिया बसती थी ,
उन पगडंडियों में फिर कदम पडे ,
जिन पर जगह जगह हमारे बनाये निशान अब भी पड़े थे।
उस नदी के ऊपर पुल से गुजरना हुआ ,
जिस नदी को हम पैंट को घुटने तक मोड़कर हँसते पार करते थे ,
उस मैदान से रूबरू हुए ,
जिस मैदान पर हम कभी चौक्के - छक्के लगाते थे।
उस शिवालय के आगे से गुजरना हुआ ,
जिसमे हम कभी घंटो बैठ भागवत सुना करते थे ,
उस चाचा से बात हुई ,
जिसके पेड़ो के फल हम चुराये करते थे।
वो चीड़ के पेड़ को भी देखना हुआ ,
जिसमे कभी हम खुरच कर अपना नाम खोद आये थे ,
नाम अभी भी लिखा हुआ था ,
मगर अक्षर अब बड़े हो चुके थे।
वो पहाड़ की चोटी को चढ़ने की हिम्मत न हुई ,
जिसमे हम कभी न जाने दिन में कितनी बार चढ़ जाते थे ,
वो सीढ़ीनुमा खेत जो अब डराते है ,
कभी हम उनमे कूदम - कूद खेलते थे।
वो पहाड़ की चोटी को चढ़ने की हिम्मत न हुई ,
जिसमे हम कभी न जाने दिन में कितनी बार चढ़ जाते थे ,
वो सीढ़ीनुमा खेत जो अब डराते है ,
कभी हम उनमे कूदम - कूद खेलते थे।
नजरे उन तमाम यादो को ढूँढ रही थी ,
जो कही न कही दिमाग में बहुत गहरी थी ,
लगा जैसे वक्त का पहिया रुक सा गया ,
मेरा बचपन , मेरा गाँव मुझे फिर से मिल गया।
Monday, September 25, 2017
रावण - कुम्भकरण संवाद
"उठो , जागो लंका के वीर ,
आपदा आयी है ,
दो मनुज संग वानरों की सेना ,
लंका पर चढ़ आयी हैं।"
सुन रावण की आवाज ,
कुम्भ घोर निद्रा से जागा ,
आयी है कोई घनघोर विपदा लंकेश पर ,
मन ही मन विचारा।
" हे , लंका के वीर शिरोमणि ,
इस निद्रा
को त्याग अब चिरनिद्रा की बारी है ,
एक एक कर मारे
गए सब कुल के वीर ,
अब तुम्हारी
बारी हैं। "
कुम्भकरण मुस्कराया ,
खूब अपने लिए खाना मँगवाया ,
छक कर खा पीकर बोला ,
" तुम शिवभक्त , परमज्ञानी भ्राता ,
बताओ
, कहाँ युद्ध के लिए जाना हैं। "
रावण ने सारी कथा बताई ,
सुनकर कुम्भकरण
बोला ,
" घोर अपराध किया तुमने भाई ,
किसी स्त्री का अपरहण,
बिलकुल भी क्षमायोग्य नहीं हैं ,
इसे बड़ा अपराध दुनिया में कोई नहीं हैं ,
इसलिए शायद अब ,
रावण कुल के विनाश की नौबत आयी हैं।
हे रावण , स्त्री इस जगत का आधार है ,
उसका एक एक आँसू प्रलय समान हैं। "
रावण बोला ,
" जानता हूँ भाई , अपराध मैंने किया हैं ,
जगत माता सीता
का हरण किया है ,
राक्षसों के
पाप बढ़ गए थे ,
सत्ता और शक्ति
के मद में चूर हो गए थे ,
अब राक्षस
कुल का विनाश जरुरी हैं ,
राम राज्य
स्थापना के लिए हमारा जाना भी जरुरी हैं।
स्त्री का
जब जब भी अपमान होगा ,
रावण का संहार
जरुरी होगा। "
Friday, September 22, 2017
युग कवि - श्री रामधारी सिंह दिनकर को शत नमन।
मानव अपनी इच्छाशक्ति से ,
पहाड़ भी डिगा सकता हैं ,
रसातल समंदर के जाकर ,
मोती भी पा सकता हैं।
गर ठान ने इक बार मन में ,
सभी चुनौतियाँ छोटी हैं ,
गर कदम उठा ले एक बार ,
सात लोक भी नाकाफी हैं।
पहचान खुद को ,
अपनी राह बना ,
चलचलाचल फिर ,
कर्मो से खुद को ' महा मानव बना'।
कह गए 'दिनकर ' बार बार ये ,
दीप्तिमान , हो प्रज्वल्लित ,
जीवन एक आहुति है ,
प्राणो में अपने तू ज्योत जगा।
(हिंदी कविता के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के जन्मदिन - २३ सितम्बर पर श्रदांजलि स्वरुप लिखी चंद पंक्तियाँ)
Thursday, September 21, 2017
कनखेधार
बैठा था उतुंग शिखर " कनखेधार " पर इक दिन ,
सामने हिमालय का दृश्य था ,
मनोरम , अति मनभावन ,
स्वर्ग सरीखा लग रहा था।
कल कल करती कोसी नदी ,
सर्पीली होकर मद हरण करती अटल अडिग पहाड़ो का ,
अपने लय में शोर करती ,
शिवालय के जैसे पग पखार रही थी।
रवि की आभा से हिमालय नए नए रंग बिखेरता ,
चीड़ के पेड़ो से लदे जंगल ,
छोटे छोटे सीढ़ीनुमा खेतो पर किसान ,
एक जोड़ी बैलो को लेकर अपना पसीना बहा रहा था।
दूर एक सड़क पर कुछ पो -पो की आवाज़ ,
इस शांत माहौल में जैसे खलल डाल रही थी ,
छितरे छितरे से गाँव ,
हर गाँव के जंगल में मंदिर,
जैसे हर गाँव का अपना अपना भगवान लग रहा था।
सांझ हुई , उतरा नीचे
हिमालय भी अब सोने लगा था ,
अजीब अजीब छायाचित्रों से ,
अब जंगल भयावह लग रहा था।
टिमटिमाते तारे संगी ,
चंद्र किरणे राह दिखा रही थी,
नीचे जाकर फिर देखा " कनखेधार " को ,
वो जैसे मुस्करा रहा था।
आओ कभी , बैठेंगे फिर " कनखेधार "
जीवन का कुछ मर्म समझेंगे ,
जीवन की रफ़्तार के बीच ,
कुछ पल हम सिर्फ प्रकृति के साथ रहेंगे।
( कनखेधार मेरे गाँव - कोटुली , जिला - अल्मोड़ा , उत्तराखंड का एक पहाड़ हैं जिससे हिमालय का विहंगम दृश्य दिखाई देता हैं , वास्तविक अनुभव को शब्दों में ढालने का प्रयास किया हैं। )
Friday, September 15, 2017
मधुशाला
न अमीर , न गरीब ,
न कोई ऊँचा , न कोई नींचा ,
सबके लिए एक जैसा ,
ये मधु का प्याला ,
मन भेदो को हरती ,
सुःख -दुःख में एक सा ,
कोई मतभेद नहीं करती ,
ऐसी हैं सबकी - मधुशाला।
बदल रही दुनिया ,
बदल रहे रिश्ते नाते ,
बदल रहे है पैमाने ,
बदल रही साकीबाला ,
स्वार्थ का हर जगह बोलबाला ,
मगर अटल सत्य,
सदा है , और रहेगा
जीवन जब तक ,
गुलजार रहेगी मधुशाला।
न कोई ऊँचा , न कोई नींचा ,
सबके लिए एक जैसा ,
ये मधु का प्याला ,
मन भेदो को हरती ,
सुःख -दुःख में एक सा ,
कोई मतभेद नहीं करती ,
ऐसी हैं सबकी - मधुशाला।
बदल रही दुनिया ,
बदल रहे रिश्ते नाते ,
बदल रहे है पैमाने ,
बदल रही साकीबाला ,
स्वार्थ का हर जगह बोलबाला ,
मगर अटल सत्य,
सदा है , और रहेगा
जीवन जब तक ,
गुलजार रहेगी मधुशाला।
(" मधुशाला " के रचनाकार श्री हरिवंश राय बच्चन जी को समर्पित। )
Thursday, September 14, 2017
हिंदी दिवस
हिंदी को दोयम दर्जा देने वालो ,
आज तुम्हे बतलाता हूँ ,
हिंदी में सोच कर अंग्रेजी बोलने वालो ,
आज तुम्हे चेतना देता हूँ।
संस्कृत की बेटी हिंदी ,
हमारा आधार हिंदी ,
जन - जन की हिंदी ,
हिंदुस्तान की धड़कन हैं हिंदी।
सशक्त है हिंदी ,
प्रकृति की सरल है हिंदी ,
जैसी लिखी जाती है हिंदी ,
वैसी ही बोली जाती है हिंदी।
आदिकाल से आधुनिक काल तक ,
निरंतर बहती सी हैं हिंदी ,
विद्यापति की हिंदी ,
तुलसीदास और सूरदास की हिंदी ,
केशवदास की हिंदी ,
दिनकर , पंत , प्रेमचंद और गुप्त की हिंदी।
कितनी भाषाओ को समेटे ,
माँ का सा बर्ताव करती हिंदी,
बनते बिगड़ते रिश्तो को अपने में ,
सिमटाते सिमटाते राजभाषा का दर्जा पायी हिंदी,
नौनिहालों से उपेक्षित हिंदी ,
परायो का सम्मान पाती हिंदी,
बेरोकटोक बढ़ रही हिंदी।
Tuesday, September 12, 2017
खिलने दो , महकने दो
खिलने दो , महकने दो ,
हमको भी जीने दो ,
खुदा ने भेजा हैं हमको ,
बड़ी रहमतो और मुद्दत के बाद ,
हमको भी जीने दो।
हमको भी जीने दो ,
खुदा ने भेजा हैं हमको ,
बड़ी रहमतो और मुद्दत के बाद ,
हमको भी जीने दो।
कलियाँ हैं हम ,
हमें भी फूल बनने दो ,
यूँ बेरहमी से मत कुचलो ,
कुछ तो उस खुदा से डरो।
डरा डरा सा बचपन बीत रहा ,
क्यों हर जगह इंसान रुपी जानवर दिख रहा ?
क्या कसूर हैं हमारा ?
कोई हमें नहीं बतला रहा।
सब कहते हैं हम देश का भविष्य हैं ,
क्यों फिर भविष्य इतना डर में पल रहा ?
महफूज नहीं जगह कोई ,
क्यों हर जगह अंधकार पसर रहा।
खिलने दो , महकने दो
हमें भी सपने पूरे करने दो ,
हमें भी पूरा जीवन जीना हैं ,
इतना तो रहम करो।
Thursday, September 7, 2017
बचपना
बड़प्पन का लबादा ओढ़े बहुत दिन हो गए ,
चलो थोड़ा बचपना करते है।
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से उकता गए हैं ,
थोड़ा आवारागर्दी का लुफ्त उठाते हैं।
सोचने का काम दुसरो को देकर ,
चलो , बिना बात के खिलखिलाते हैं।
मन जरा हल्का करते हैं ,
चलो थोड़ा बच्चा बनते हैं ।
है ज़िन्दगी में कई समस्याएं ,
है होगी कल की फिक्र ,
है जिम्मेदारियों का बोझ बहुत ,
कभी कभी इनको थोड़ा अनदेखा करते है ,
चलो , थोड़ी देर ज़िन्दगी से कुछ पल चुराते हैं ,
आओ की , थोड़ा बचपना फिर जीते है।
Wednesday, September 6, 2017
लक्ष्य
धीरे धीरे ही सही ,
आगे बढ़ रहा हूँ।
रुक रुक कर ही सही ,
पैरो को अपने साध रहा हूँ। .
आते हैं अवरोध ,
मगर उद्देश्य को हमेशा याद रखता हूँ ।
सुनाने वाले बहुत हैं ,
मगर हर बात को दिल पर नहीं लेता हूँ।
मुझे अपने पर यकीन हैं ,
ईश्वर को हमेशा साथ रखता हूँ।
शुभचिंतको की दुआएँ बहुत हैं ,
इसलिए हर बार गिरकर उठता हूँ।
देर होगी मगर अंधेर नहीं ,
हर निराशा का अंत करता हूँ।
थोड़ा पीछे रह भी गया अभी तो क्या ,
दौड़ के अंत में अपनी विजय देखता हूँ।
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