Sunday, February 9, 2020

ठूँठ



ठूँठ को देखकर ,
दया भी आयी और गर्व भी हुआ ,
सब कुछ दे दिया था उसने ,
फल , शाखाएं , छाया ,
मगर शायद और भी कुछ चाहिये था उससे ,
तना भी काट ले गया कोई ,
अब भी वो खड़ा है ,
कोई आएगा ,
तो ले जाये ,
इस अवशेष को भी ,
ताकि फिर शायद ,
उसके रिक्त स्थान पर ,
फिर उगे कोई नन्हा पौधा ,
पेड़ बन सके ,
या फिर ,
कोई सड़क बन सके ,
वो कोई बाधा न रहे ,
अब वो अतीत को याद ,
नहीं करना चाहता ,
क्यूंकि शायद अब नियति ,
उसकी यही थी,
बस उसका ये संतोष ,
उसकी पूँजी है ,
वो हर तरह से काम आया ,
नन्हे पौधे से लेकर ,
अंत तक ,
जितना हो सकता था - दिया ही ,
लिया शायद कुछ नहीं ,
सिवाय एक स्थान के ,
जहाँ वो खड़ा रहा सीना ताने ,
वर्षो वर्षो तक।

Sunday, February 2, 2020

रोज़ एक जीवन



डूबते सूरज के साथ जैसे ,
एक जीवन पूरा हो जाता है ,
तेरी रची महिमा  के आगे ,
सिर मेरा एक बार फिर झुक जाता है ,
फिर एक दिन का जीवन देने का तेरा शुक्रिया ,
रात को फिर अर्ध मृत्यु का आगोश छा जाता है ,
पहली किरण के साथ जब आँख खुलती है ,
तुझ पर विश्वास और अटल हो जाता है। 

फिर उम्मीदें , सपने जग जाते है ,
नवसंचार सामर्थ्य का नस नस में दौड़ जाता है ,
कदम खुद बखुद निकल पड़ते है ,
रात होने से पहले जैसे सब कुछ समेट लेना चाहता है,
हर भाव से जैसे जीवन गुजरता है ,
रोज़ , एक जीवन का आरम्भ और अंत हो जाता है। 

Wednesday, December 25, 2019

न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है





जब कभी अपनी हारो की सोचता हूँ , 
उस एक जीत के आगे सब फीका नजर आता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है। 

कभी शिकायतों का पुलिंदा जब खोलूं  , 
रहमतो का पलड़ा ज्यादा भारी नजर आता है  ,
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

छाया हो घुप्प अँधेरा राहो में , 
टिमटिमाता कोई जुगनू नजर आता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब देखता हूँ मानवता पर संकट के बादल , 
किसी फ़रिश्ते का किस्सा पढ़ने में आ जाता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

देकर कभी थोड़ा निराशा के बादल , 
फिर किरणों से आकाश भर देता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब भी उठने लगता है विश्वास उस पर , 
उसका कोई चमत्कार आँखों के आगे आ जाता है  , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

रिश्तो से जब मन भर भर जाता है , 
कोई अजनबी सा रहनुमा बन खड़ा मिलता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  

जब कभी अपने वजूद पर संशय   ,
उम्मीदों , दुआओं और आशाओ का अम्बार नजर आता है, 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है। 

उठ ही जाती है कलम बार बार , 
जब भावनाओ का ज्वार उठता है , 
न जाने मेरा ईश्वर क्या चाहता है।  



फोटो आभार - उमेश मेहरा ( मेरा छोटा भाई ), इसी छायाचित्र ने मुझे ये पंक्तियाँ लिखने के लिए विवश किया।  

Monday, December 9, 2019

यह दौर क्यों इतना संवेदनहीन कैसे ?

बीच में सड़क पर अधमरा औंधे मुहँ गिरा , 
बचते बचाते निकलते अपनी कारो से , बाइको से , 
नजर सी बचाकर देखकर , 
एक्सेलरेटर पर पाँव दबाते , 
ये दौर इतना सवेंदनहीन कैसे  ?

बस स्टॉप पर दस लोग खड़े , 
एक लड़की को छेड़ रहे दो लड़के , 
बालो से घसीट कर , 
अपनी कार में धकेलते , 
लोग यूँ ही खड़े रहे जैसे गूँगे और अंधे ,
ये दौर इतना सवेंदनहीन कैसे  ?

उन बूढ़े माँ बाप ने ज़िन्दगी खपा दी , 
जिस छत के लिए , 
अपना पेट काटकर , 
हर ख़ुशी दी अपने जिगर के टुकड़े को , 
एक दिन क्यों शर्म आती है उसको , 
अपने साथ रखने को ,
ये दौर इतना सवेंदनहीन कैसे  ?

उसके पास जज्बा था , 
समाज के लिए कुछ करना का , 
साथ किसी ने दिया नहीं - पागल कहते रहे , 
वो सफेदपोश जिसने कभी कुछ किया ही नहीं , 
वोट मांगने के अलावा , 
उसी के पीछे सब चलते रहे भेड़ो की तरह , 
ये दौर इतना सवेंदनहीन कैसे  ?

आग लगती है पड़ोस में , 
लगने दो , क्या फर्क पड़ता है हमको , 
फैली जब आग , जद्द में आया अपना घर तो , 
दुसरो की मदद की आस फिर कैसे ,
ये दौर इतना सवेंदनहीन कैसे  ?

Friday, October 18, 2019

वादा




तुमने वादा किया है मुझसे ,
मिलोगे मुझसे उस दिन ,
जिस दिन मैं जीवन से छक जाऊँगा ,
तृप्त हो जाऊँगा हर चीज से ,
फिर कोई मंजिल नहीं ,
कोई सफर नहीं ,
न कोई हड़बड़ाहट ,
बस शांति और असीम शांति ,
उस दिन हम मिलेंगे ,
और खूब बातें करेंगे। 

मैं भी जल्दी में नहीं हूँ ,
क्यूंकि अभी तो चलना शुरू किया है ,
अभी बहुत कुछ देखना है ,
कुछ अरमानो को धरातली रंग दिखाना है ,
कुछ एहसासो को कैद करना है दिल में ,
कुछ भावो को सतही कत्था चढ़ाना है। 

मिलूँगा , जरूर मिलूँगा , वादा किया है
मगर उससे पहले ये सफर तय कर लूँ ,
सफर में जो मिले , उसे आत्मसात कर लूँ ,
बताने के लिए कुछ तो इकठ्ठा कर लू पोटली में ,
वर्ना तुम समझोगे ,
क्या किया जीवन में ?

Saturday, October 12, 2019

जीवन समर


उतरे है जीवन समर में , 
तो डरना क्या , 
दिया है सिर ओखली में , 
तो मूसल से डरना क्या , 
कर्मो का परिणाम है वर्तमान , 
भविष्य के लिए घबराना क्या , 
मुकद्दर खुद लिखना होता है , 
दुसरो पर दोष मढ़ना क्या ,
जिद्द हो , जूनून हो 
तो क्या पर्वत , क्या आसमान 
क्या सागर की गहराइयाँ 
बैठे रहे तो फिर , 
सपाट रास्ते में भी खाइयाँ।  

हौंसला और विश्वास , 
और कर्म हो अगर साथ , 
भाग्य का बनना और बिगड़ना क्या , 
पुरषार्थ के आगे बेदम है , 
सब बाधाएँ और संकट , 
कर्मतप से पिघल जाये लोहा भी , 
जयगान जीवन का।  

Friday, September 13, 2019

अमावस की रात और कुछ जुगनू




वो अमावस की रात ,
जितना कालिख अपने में समेट सकती थी ,
समेटे , कितनी काली थी। 

दूर कृत्रिम  रोशनी  के जलते चिराग भी ,
जैसे अपनी रौशनी को अपने तक ही ,
समेटे , जुगनू से भी फीके थे। 

चाँद को भी जैसे आगोश में लेकर ,
तारो की चमक भी सोखकर ,
वो रात , सचमुच , भयानक अमावस की रात थी। 

मगर कुछ जुगनू अपनी ज़िद्द पर अड़े थे ,
मंडरा कर इधर उधर , बिना डर के ,
वो इस भयानक " अमावस " रात को चिड़ा रहे थे। 


बड़े जिद्दी और जुनूनी ये जुगनू ,
अपने अस्तित्व को दाँव पर लगाकर  ,
पहली किरण आने तक डटे रहने पर अड़े थे।  

Wednesday, September 11, 2019

प्रेम की सीढ़ी



आईने में खुद को सज धज कर निहारती ,
उसकी आँखों में जैसे अजब सा सुकून था ,
झील सी आँखों के ऊपर उसने ,
काजल से जैसे तटबंध बनाये थे ,
गेसुओं को करीने से पीछे बाँध कर ,
महक लिए कुछ फूल गुँथे थे ,
गालो पर हल्का हल्का ,
गुलाबी मस्कारा लगाया था ,
खुद से आईने के सामने ,
शर्मा रही थी  ,
बड़े दिनों से सजने की ,
तमन्ना को जिये जा रही थी ,
किसी दूसरे से प्रेम करने से पहले ,
खुद से प्रेम करना सीख रही थी । 

उसे आज किसी और के लिए नहीं ,
खुद के लिए सज रही थी ,
बदल बदल कर कपडे वो ,
हर रंग के साथ निखर रही थी ,
खुद से अपने चेहरे पर ,
एक काला टीका भी लगा लिया ,
नजर न लग जाए खुद की ,
चेहरा सुर्ख गुलाबी  हो गया।  
खुद से प्रेम हो रहा था उसे ,
आज वो जैसे पूर्ण हो रही थी,
प्रेम की सीढ़ी जैसे ,
आज वह चढ़ रही थी ।

फोटो सौजन्य और आभार - गूगल 

Monday, September 9, 2019

लिखने के लिए ये दौर कठिन है


लिखने के लिए ये दौर कठिन है ,
मन की लिखूँ तो ,
मनगढंत ,
सच लिखूँ ,
किसको इसकी फिक्र है ,
लिखने के लिए ये दौर कठिन है। 

चाटुकारिता करूँ ,
वाहवाही है ,
विरोध लिखूँ तो ,
तन्हाई है ,
प्यार लिखूँ तो ,
कहा अब वो गहराई है ,
रिश्तो में ,
कहा अब वो सच्चाई है ,
लिखने के लिए ये दौर कठिन है। 

फलसफों में कोई दम नहीं ,
पाखंडियो ने दूकान सजाई है ,
मानवता पर लिखने वालो ने ,
हालातो की सजा पाई है ,
शब्द भी अमर्यादित अब ,
वजूद से खोने लगे है ,
पढ़ने वाले भी अब ,
अपने हिसाब से पढ़ने लगे है ,
बिकने लगी है कलम ,
शब्द भी छल करने लगे है ,
सच्चे कलमकार ,
चुप रहने लगे है ,
लिखने के लिए ये दौर कठिन है।