Wednesday, January 20, 2021

संतति

 

ये धरती न मेरी है , न तुम्हारी

हम सिर्फ कुछ समय के लिए ,

इसके सरंक्षक है ,

यह धरती आने वाली पीढ़ी की है ,

और हमें यह धरती उन्हें सौंप कर जाना है ,

जैसे हमें अपनी पुरानी पीढ़ी से थाती के रूप में मिली है।

 

हम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना ही ,

इस धरती को सँवारने और बिगाड़ने के जिम्मेदार है ,

बाकी ईश्वर की जीवित रचनाये तो आज भी वैसी ही जी रही है ,

जैसे वो सदियों से जीती आ रही है,

हमें ही जिम्मेदारी लेनी होगी ,

इसके अच्छे या बुरे की ,

और हमें ही परिणाम भुगतना होगा,

हमारी संतति हमें बस इसी के लिए याद रखेगी।

 

 

 


Thursday, January 14, 2021

नयी कविता

 

इंस्टाग्राम में चमकती तुम ,

फेसबुक पर इठलाती हो ,

व्हाट्सप्प पर आकर ,

गुमसुम क्यों हो जाती हो। 

 

सुना तो है 4 जी बड़ा अच्छा चलता है,

तुम्हारे शहर में ,

सब नेटवर्क के टावर भी खड़े है ,

मगर कॉल का जवाब देने में क्यों कतराती हो। 

 

अब तो कितना आसान हो गया सब ,

चिट्टी पत्री , छुप कर निहारना - सब पुरानी बातें है ,

अब तो कनेक्टेड रहते है हरदम ,

ज्यादातर ऑफलाइन क्यों रहती हो। 

 

इजहार करना कितना आसान हो गया अब ,

बिना शब्दों के भी काम चल जाता है ,

बने बनाये भाव व्यक्त हो जाते है ,

तुम इमोजी क्यों इस्तेमाल नहीं करती हो। 

Friday, January 1, 2021

सुनो माँ

 


सुनो माँ ,

मैं जानता हूँ अब ,

तुम सुन नहीं सकती मुझे ,

देख तो सकती हो ,

उस नीले अम्बर के पार से ,

जहाँ तुम चली गयी हो ,

क्यूँकि तुम ही कहा करती थी अक्सर ,

लाखो की भीड़ में भी तुम ,

पहचान सकती हो ,

तो पहचानो माँ ,

मैं अक्सर आकाश को निहारता हूँ ,

ढूँढता रहता हूँ तुम्हे ,

कभी लगता है तुम सूरज की ,

किरणे बनकर ,

अपना आशीष दे रही हो ,

कभी बारिश की बूँदो में ,

खुद को भिगोता हूँ ,

जब हवा सर्र से कानो से ,

गुजरती है मेरे ,

मुझे लगता है ,

जैसे तुम मेरे आस पास हो ,

मगर दिखती नहीं। 

 

 

सुनो माँ ,

दुनिया में सब वैसा ही है ,

जैसा तुम छोड़ गयी थी ,

मगर मेरी दुनिया में ,

सब कुछ बदल गया है ,

अब मुझे डर लगता है ,

घबरा जाता हूँ हर बात पर ,

खाने में अरुचि हो गयी है ,

कोई सफलता पाने में ,

ज्यादा ख़ुशी नहीं होती ,

उदास सा रहता हूँ अक्सर ,

अब कोई नहीं कहता मुझसे ,

"तबियत का ध्यान रखा कर ",

अब मैंने खुद को ज्यादा व्यस्त,

कर दिया है ,

अकेला रहने से जी घबराता है ,

कुछ पाने की ख्वाईश ,

बची नहीं है, 

सब कहते है ,

मैं इतना बड़ा हो गया हूँ ,

समझदार और दुनियादारी समझता हूँ ,

मगर सिर्फ तुझे और मुझे पता था ,

जहाँ पर भी मुझे संशय होता था ,

तेरा बस ये कहना ," सब ठीक हो जायेगा "

कैसा चमत्कार करता था, 

जब भी तेरे सानिध्य में होता था ,

कितना निडर होता था ,

लगता था जैसे सारी कायनात ,

मेरे साथ खड़ी थी ,

मेरे पेट भरने के बावजूद ,

"एक रोटी और खा ले

कमजोर हो गया है "

बार बार कहती थी।

 

अभागा हूँ माँ ,

जो तेरी सेवा न कर सका ,

सोचता था ,

मेहनत करता हूँ पहले ,

फिर फुर्सत से बैठूँगा ,

पहले तेरे कुछ सपने ,

पूरे करने की खातिर ,

कुछ जमा करता हूँ ,

तू अक्सर कहा करती थी ,

जोर देती थी नौकरी पाने की ,

तेरे आदेश का पालन करने ,

मैं छोड़ आया तुझे ,

उम्मीद में की अब जब लौटूँगा ,

तो साथ में लेकर आऊँगा ,

तेरे कुछ अधूरे सपनो की ईटे ,

फिर मिल बैठकर देखेंगे ,

सपनो को हकीकत में बदलते ,

मगर शायद ईश्वर को ,

तेरी मेरी ये बात पता न थी,

उसने तुझे अपना कुछ काम ,

करवाने बुला लिया ,

और मन मसोसकर रह गया।

 

सुनो माँ ,

क्रोध आता है मुझे कभी तेरे ईश्वर पर ,

मगर तूने विश्वास करना सिखाया है  ,

"जो करता है , अच्छा करता है "

हर बार यही समझाया है ,

तेरी इन्ही बातो से पीछे हटता हूँ ,

वर्ना कई बार ईश्वर को ,

कटघरे में खड़ा करने की सोचता हूँ। 

 

सुनो माँ ,

अब मैं जल्दी सो जाता हूँ ,

उम्मीद में ,

कि तुम सपनो में आओगी ,

फिर मुझसे लाड़ करोगी ,

फिर मुझे डाँट मारोगी ,

अच्छा लगता है ,

माँ , तुझसे बात करना ,

घबरा जाता हूँ उस सुबह ,

जिस दिन तुम सपनो में भी नहीं आती ,

वादा करो माँ ,

सपनो में तो आओगी ,

और मुझे डाँटोगी ,

मैं बड़ा नहीं हुआ माँ तेरे लिये ,

ताउम्र मुझे तेरी जरुरत पड़ेगी। 

 

गुजारिश है या कह लो प्रार्थना ,

जिनके पास "माँ" महफूज है अभी ,

उसे सबसे बड़ी दौलत समझना ,

उसके कदमो के नीचे जन्नत ,

उसे ही जीता जागता खुदा या भगवान समझना।  


( माँ की यह फोटो उनके अंतिम दिनों की फोटो है , जब वह इलाज के लिए नोएडा में मेरे साथ थी।   बालकनी से निहारती माँ को शायद एहसास था की अब उन्हें वापस जाना है और वह जैसे ईश्वर की कायनात को आँखों में बसा लेना चाहती थी। ) 

 


Thursday, December 17, 2020

2020

 जनवरी में देखे सपने दिसंबर आते हवा हो गये। 

ऐसे करते करते न जाने कितने साल गुजर गये।।

 

हसरते परवान चढ़ती रही हकीकत ने कदम रोक लिये।

हर साल की भाँति इस साल के भी दिन यूँ ही गुजर गये।।

 

कुछ यूँ गुजरा यह साल दहशत में सिमट गये। 

बचते बचाते कुछ अपने फिर भी गुजर गये ।।

 

दुआ रहमत प्रार्थना आशीष करते रह गये।

मास्क मुँह सैनिटाइजर हाथ मलते रह गये।।

 

कोसे किसको कसूर किसका ढूँढ़ते रह गये।

इन्तेजार -ऐ - वैक्सीन में  सब दिन गुजर गये।।

Tuesday, December 15, 2020

अब लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में।

                                                       कैद कर दिए पाँव , पसरा दिया सन्नाटा

भय से त्रस्त प्राण ,  मुँह पर मास्क की छाँव ,

लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में। 

 

संशय , असमंजस , बेरोजगारी , लाचारी

एक वायरस के आतंक से थम गयी दुनिया सारी ,

लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में।

 

त्राहि त्राहि मची चहुँओर , मानवता पर संकट भारी

सीख लिया जो सबक सीखना था , अब टीके पर नजर सारी ,

अब लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में।

 

भ्र्म अब टूट गया , घमंड पीछे छूट गया

प्रकृति के ऊपर नहीं सारा अधिकार हमारा ,

अब लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में।

 

अब जाते जाते अवसान कर जाना ,

संशय और भय सब हर जाना , प्राण फूँक जाना  ,

एक गुजारिश -अब लौट कर मत आना 2020 मानवता के काल में।

Wednesday, December 9, 2020

अंतिम बैंच


वो कक्षा की अंतिम पँक्ति के बैंच ,

सबको ही लुभाते थे ,

आज़ादी थी वहाँ , किस्से तमाम बनते थे।

 

जब पढ़ाया जा रहा होता था ,

इतिहास का कोई महत्वपूर्ण पाठ ,

आँखे उनीदी सी हो जाती थी।

 

जब सुलझाया जा रहा होता था ,

गणित का कोई सवाल ,

आँखे बाहर मैदान में गड़ी होती थी।

 

जब विज्ञान शिक्षिका बताती थी ,

न्यूटन के नियम ,

वहाँ से सब पर नजर जाती थी।

 

जब अंग्रेजी के शिक्षक ,

बारी बारी से पढ़ने को कहते थे कोई लेसन ,

अंतिम बेंच तक आते आते लेसन ख़त्म हो जाता था।

 

किस्सागोई के तमाम हिस्से ,

इन्ही बेंचो में बनते थे ,

बदलाव के विचार यही पनपते थे।

 

वह अंतिम बेंच , महज एक बेंच नहीं थी

क्रांति स्थल था ,

खाली समय में सबका वही अड्डा था।

 

शोध करो तो पता लगता है ,

अंतिम बेंच पर बैठने वाले निठ्ठले , नकारा या कमजोर नहीं थे ,

असल में , दुनिया बदलने वाले यही बच्चे थे ।

सफर

 

ऐ ज़िन्दगी !

तेरे साथ चलते चलते एक दिन ,

मैं भी थक जाऊंगा ,

तुम आगे बढ़ते रहोगे , मैं हट जाऊँगा ,

फिर तुम्हारे साथ कोई नया होगा ,

शायद मुझसे बेहतर होगा ,

हो जिक्र कभी सफर का ,

बस तुम मुस्करा के कह देना ,

छोड़ आया हूँ पीछे किसी को ,

तुम्हारे सवाल का उत्तर देने से पहले ,

वो याद आ गया। 

Wednesday, November 18, 2020

माँ

 


न जाने क्यों लोग कहते है ,

तू चली गयी है माँ ,

मगर मैं तो न मानूँ ,

मेरी रूह और हर साँस में बसी है तू माँ !

 

न जाने क्यों लोग कहते है ,

तू मिट्टी में मिल गयी है माँ ,

मैं तो तुझसे ही बना हूँ ,

जब तक मैं , तू ज़िंदा है माँ। 

 

न जाने लोग क्यों कहते है ,

अब तेरी आवाज नहीं सुनाई देगी माँ ,

मेरे हर शब्द में तो तू ही ,

गूँजती है माँ। 

 

न जाने क्यों लोग कहते है ,

अब तू कभी नहीं दिखेगी ,

लेकिन मैं तो तेरी छाया ,

जब तक मैं , तेरा अक्स मुझमे माँ। 

 

झूठ कहते है लोग,

तेरे जाने के बारे में ,

मेरे रोम रोम में ,

हमेशा ज़िंदा रहेगी तू माँ।

 

 शायद लोगो के लिए तू सिर्फ ,

एक नाशवान इंसान थी माँ ,

मगर हमारे लिए तो तू ,

भगवान से बढ़कर थी ,है और रहेगी माँ।