निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
Sunday, July 27, 2025
Thursday, July 24, 2025
पहाड़ों का चौमास
बारिश होती है खूब ,
पहाड़ों में ऊँचे ऊँचे डानो में ,
पानी सब इकठ्ठा होता है ,
गधेरों में , और गधेरे ,
सब मिल जाते है नदी में ,
एक मरियल सी सर्पीली नदी ,
जिसे कल तक यूँ ही फाँक मार कर ,
पार कर जाते थे बच्चे भी ,
अचानक से चौमास में ,
वार -पार फ़ैल जाती है ,
और पानी का सौट ,
इतना तेज ,
बड़े बड़े गंगलोड़ ,
सब बहा ले जाती है ,
इन गंगलोड़ो को ,
लुढ़का लुढ़का कर पीस देती है ,
और किनारे लगा देती है ,
बजरी बनाकर ,
अपना छीना -छिनाया क्षेत्र ,
सब वापस लेकर अतिक्रमण से ,
फिर एकदम शांत हो जाती है ,
चौमास के बाद नदी ,
फिर से पतली , सूखी धार ,
बन जाती है ,
अगले चौमास तक।
Monday, July 14, 2025
भीष्म प्रतिज्ञा
देख पिता का संताप , देवव्रत को बड़ा विषाद हुआ ,
क्या उनके हस्तिनापुर आने से ही महाराज का ये हाल हुआ
,
तरसा जिनके स्नेह के लिये पूरे पच्चीस बरस ,
मिलन पर ये कैसा तुषारापात हुआ।
पुत्र तो पिता
को सुःख देने के लिये होता है ,
एक जनक के लिये पुत्र वर्तमान , भविष्य होता है ,
पूत सपूत वंश का अभिमान होता है ,
पूत कपूत वंश का कलंक होता है ।
परशुराम शिष्य
निकले ढूँढने समाधान ,
संकट आ गया उनके सामने महान ,
जो हो स्वंय गंगा पुत्र , वो क्यों हो विचलित,
बदलने को आतुर सब विधान।
ले जल हाथ में,साक्षी बने अरुण –वरुण-व्योम ,
ठहर गया सारा चर-अचर जगत तमाम ,
करने चला शांतनु पुत्र, आज प्रण महान ,
पिता के सुख के लिए भविष्य का बलिदान।
प्रण करता हूँ - आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा ,
हस्तिनापुर राजसिंहासन का ताउम्र सेवक रहूँगा ,
सूर्य बदल दे रास्ता अपना , चन्द्रमा कलाएँ भूल जाये
,
अटल रहेगा प्रण देवव्रत का , जब तक प्राण तन से न जाये।
जिसके सिर मुकुट सजना था हस्तिनापुर का ,
जिसकी भुजाओं में अकूत बल , मस्तक पर तेज था ,
अस्त्र -शस्त्र , वेदों में निपुण , नीतियों का मर्मज्ञ
था ,
किस्मत की लेखी पर कहाँ उसका वश चलना था।
हे ! विधाता - ये क्या कर दिया तूने , शान्तनु को पश्चताप
हुआ ,
हस्तिनापुर के युवराज ने सब कुछ एक पल में त्याग दिया ,
जोड़कर अपने सब पुण्य कर्मों को , एक आशीष दिया ,
ईच्छा मृत्यु का वरदान , और नाम " भीष्म " दे
दिया।
सत्यवती का अपना रुख , शांतनु समय का इक मोहरा था,
निर्णय ये इतना सहज न था, कौन जानता था आगे क्या होना
था ,
परिस्थितयों के वश लिया गया निर्णय ,काल की एक चाल थी ,
किसे पता था - महाभारत की नींव उसी दिन पड़ चुकी थी।
Friday, July 11, 2025
महत्व
रात ने कभी सुबह से शिकायत नहीं की ,
सुबह ने रात को कभी नहीं चिढ़ाया ,
दोनों को पता है महत्व इक दूजे का ,
इक दूसरे के बिना अस्तित्व कहाँ उनका।
उतार -चढ़ाव भी तो ऐसे ही जीवन चक्र में ,
एहसासों के अनुभव से गुजरने का सफर सारा ,
मुक्कमल सफ़र -ऐ -ज़िन्दगी तो वही जहाँ में ,
कर्मफल जो मिला , जिसने दिल से स्वीकारा।
Wednesday, July 2, 2025
जानता नहीं , मैं कौन हूँ ?
सड़क पर टक्कर मार ,
एक लम्बी गाड़ी वाला ,
अकड़ झाड़ रहा था ,
साईकिल वाले को ,
घुड़की दे रहा था ,
तेज आवाज़ में चिल्ला रहा था ,
"जानता नहीं , मैं कौन हूँ ?"
साईकिल वाला अपने पैर के ,
रिसते हुए खून को पोछते हुए बोला ,
दूसरे हाथ से साईकिल को संभाले हुए ,
" मैं तो नहीं जानता ,
मगर क्या तुम जानते हो ,
मैं कौन हूँ ?
गलती तुम्हारी है ,
जाओ , जाओ साहब
,
बख्श देता हूँ आज ,
आपसे बड़ा तो मैं हूँ। "
प्रकोप
नदी, नाले, गधेरे, पहाड़, जंगल
आपसे कुछ नहीं कहेंगे ,
मगर जब आप उनका हक़ छीनोगे ,
इक दिन एक झटके में सब ले लेंगे।
सहने की भी इक सीमा होती है ,
वो उससे ऊपर भी सह जाते है ,
असहनीय अतिक्रमण हो जाता है जब ,
वो भी अपना गुस्सा जाहिर करते है।
कुदरत जानती है संतुलन बनाना ,
वो उसका नैसर्गिक स्वभाव है ,
जरूरतें तो पूरी कर सकते है ये सब ,
लालच का तो इनके पास भी नहीं कोई समाधान।
Saturday, June 28, 2025
घर
जिसके किसी भी कोने में सुकून आ जाये ,
जिसके दीवारों से अपने बचपन की खुशबू आये ,
जिसके आँगन में अभी भी बचपन अटका हो ,
जिसके जर्रे जर्रे पर माता -पिता का अक्स नजर आये ,
जिसके हर कमरे की एक कहानी हो ,
जिसके दरख्तों पर छुपी कोई निशानी हो ,
जिसकी अलमारियों में बंद कई यादें हो ,
जिसकी दहलीज पर माँ का मन बसता हो ,
जिसकी फुलवारियों पर पिता की छाया हो ,
जिसकी नींव पर पूर्वजों का आशीर्वाद हो ,
वो " घर " होता है , बाकी तो मकान होते है।
Thursday, June 26, 2025
शाबाशी
दे सकते हो तो उम्मीद दो ,
बाँट सकते हो तो दर्द बाँटो ,
उलझे है सब यहाँ " आनंद "
बुरा तो दुश्मन का भी न सोचो।
चिंताओं में वक्त मत गँवाओ ,
वो देख लेगा - दिल को समझाओ ,
हाथ में जो वर्तमान है "आनन्द ",
जैसा भी है , स्वीकारो और जियो।
कौन क्या सोचता है ,
ये उसकी तकलीफ है ,
वक्त वैसे भी फिसला जा रहा ,
फालतू चीजों पर वक्त न जाया करो।
खुशियाँ ढूँढने से नहीं मिलती ,
बड़ी कामयाबियाँ रोज़ नहीं होती ,
संघर्ष तो सभी की ज़िन्दगी में है ,
खुद को भी शाबाशी देना सीखो।
Friday, June 13, 2025
इन्तजार
तुम मिलोगे दुबारा ?
मैं नहीं जानता ,
मगर उम्मीद है ,
ज़िन्दगी के किसी न किसी ,
मोड़ पर ,
हम फिर टकरायेंगे ,
वो बात अलग होगी ,
तुम भी न जाने कितना सफर,
तय कर आये होगे,
और मैं भी ,
मगर विश्वास तब तक ,
कायम रहेगा फिर मिलने का ,
जब तक ये दुनिया गोल रहेगी।
जीवन
जीवन कौन चला रहा है ?
क्या हम ?
कतई नहीं ,
हमें तो पता भी नहीं ,
अगले पल क्या होने वाला है ?
फिर किसके हाथ में डोर है ?
प्रकृति की ,
नहीं ,
इसको भी कोई और नियंत्रित कर रहा है ,
फिर किसके हाथों की कठपुतली है हम ?
कौन हमें नचा रहा है ?
किसकी मर्ज़ी से साँसे चल रही है ?
किसकी ईच्छा से ये संसार चल रहा है ?
सबके अपने -अपने नाम है ,
सबका अपना -अपना विश्वास है ,
कोई तो है कहीं न कही ,
जो अदृश्य होकर भी कण -कण में बसा हैं।
Sunday, June 8, 2025
शनैः शनैः
शनैः शनैः ,
हम धैर्य खो रहे है ,
हम संयम खो रहे है ,
हम विश्वास खो रहे है ,
हम आस खो हो रहे है।
शनैः शनैः ,
हम ईश्वर को भूल रहे है ,
हम रिश्ते भूल रहे है ,
हम मानवता भूल रहे है ,
हम करुणा , दया भूल रहे है।
सच ये भी है ,
धरती पर मानव सभ्यता ,
इन्ही गुणों से शताब्दियों तक ,
बची रही है।
Thursday, June 5, 2025
पहाड़
आधे से अधिक पहाड़ ,
पहले ही मैदानों में पहुँच चुका है ,
जो आधा बचा था गाँवों में ,
उसमे भी तीन चौथाई अब ,
सड़क किनारे बस चुका है ,
बचा एक चौथाई त्रस्त है ,
बन्दर , लंगूरो , सूअरों के आतंक से ,
गाँव के जीर्ण घरो के आँगन में ,
सिसूण जम चुका है ,
और जंगलों में चीड़ सिर उठा रहा है ,
जंगलो के रास्ते गुम हो चुके है ,
इन सबमे जंगल में ,
फिर से आ चुके है बाघ,
गाँव अब गाँव नहीं रह गए ,
सड़क दूर गाँव अब सब ,
फिर से जंगल होने के कगार पर है।
Saturday, May 24, 2025
पहाड़ जरूर आना
तुम इक दिन पहाड़ जरूर आना ,
पहाड़ सिखायेगा तुम्हे ,
उतार -चढ़ाव में संभलने का सलीका ,
कैसे चढ़ाव में झुकना पड़ता है ,
कैसे उतार में सीधा रहना पड़ता है ,
पहाड़ सिखायेगा तुम्हें ,
मुश्किलों में कैसे जिया जाता है ,
एकांत क्या होता है ,
कैसे ज़िंदा रहा जा सकता है ,
सिर्फ हवा ,पानी पर।
पहाड़ वो पाठ पढ़ा सकता है तुम्हे ,
जो शायद किताबों में नहीं होता ,
पहाड़ तुम्हें समझायेगा ,
भले ही कितने ही ऊँचे हो जाओ ,
तलहटी में सब बराबर होते है।
पहाड़ तुम्हे अनुभूति देगा ,
धैर्य पैदा करेगा तुम्हारे भीतर ,
जीवन का वो सार बतायेगा ,
जो लिखा -पढ़ा नहीं गया है कही पर ,
उतार -चढ़ाव का नियम सब पर लागू बराबर।
Monday, May 19, 2025
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में आजकल ,
गजब बवाल चल रहा है ,
नए समीकरण बन रहे है ,
पुरानो का हिसाब किताब चल रहा है।
ट्रंप साहब बौराये से घूम रहे है ,
पुतिन जी अपनी धुन में रमाये है ,
जिंगपिंग साहब का पड़ोसी से मोह हो गया है ,
नेतन्याहू अरब में गरज रहे है।
अस्त्र शस्त्रों का व्यापार जोरों पर है ,
समीकरण इधर -उधर हो रहे हैं ,
भय जनता में बैठाया जा रहा है ,
कमीशन से मालामाल नेता हो रहे है।
बगल में इक पड़ोसी को समझ नहीं आ रहा है ,
दाना -पानी को मोहताज न जाने किस युग में जी रहा है ,
हेकड़ी न जाने किस बात की है ,
अंतर्राष्ट्रीय भीख लेकर आतंकी पाल रहा है।
अब भारत नए युग में जी रहा है ,
जैसे को तैसा का नया सूत्र गढ़ रहा है ,
बहुत सबक सीख लिये हमने इतिहास से ,
शक्ति से शांति का मार्ग चुन रहा है।
Saturday, May 3, 2025
अक्सर
अक्सर ,
हम सोचते कुछ है ,
होता कुछ है ,
अक्सर ,
हम चाहते कुछ है ,
मिलता कुछ है ,
अक्सर ,
हम बनना कुछ चाहते है ,
बन और कुछ जाते है ,
अक्सर ,
हम करना कुछ चाहते है ,
कर और कुछ रहे होते है ,
बस इसी अंतर को ,
बड़े -बुजुर्ग और ज्ञानी ,
नियति, नीयत और कर्मो का हेर-फेर कहते है।

