Thursday, April 6, 2017

शब्द कम

शब्द कम ,
भाव बहुतेरे ,
दिल ग़मगीन ,
देखकर मंजर ,
उमड़ घुमड़ रहे हैं विचार अनेक ,

आशा लिखूं ,
निराशा लिखूं ,
कुछ खोने का दर्द लिखूं ,
चंद सिक्के मिले जो उनकी खनक लिखूं ,

यादो का पिटारा खोलूँ ,
वर्तमान का सच लिखूं ,
या भविष्य का कुछ खाका बुनू ,

लिखना तो आदत हैं मेरी ,
बिना लिखे रह भी न पाउँगा ,
आड़े तिरछे पिरोकर चंद शब्दो को ,
शायद अधूरी कविता ही लिख पाउँगा। 

फिर भी नाउम्मीदी में उम्मीद को तरजीह देता हूँ ,
घुप्प अँधेरे में प्रकाश की एक लकीर देखता हूँ ,
हर ज़िन्दगी के संघर्ष में ,
उसकी आँखों में एक नयी तस्वीर देखता हूँ। 

उस उदास सूरज को अस्त होते देखता हूँ ,
चाँद को अपनी मुंडेर से झांकते देखता हूँ ,
चहचाहट फिर उन पंछियो की ,
हर सुबह पहली किरण के साथ सुनता हूँ। 

ज़िन्दगी पर फिर रोज़ भरोसा सा होता हैं ,
निकल पड़ता हूँ घर से ,
दिन भर ज़िन्दगी की तमाम उलझने देखता हूँ ,
किसी के चेहरे पर सुकून ,
किसी के चेहरे पर मासूमियत ,
किसी को सब कुछ पा लेने की चाहत ,
किसी को 'कुछ न होने पर भी' मस्त देखता हूँ। 

हर रोज़ नए किस्से ,
नई कहानियां ,
नए गीत बनते देखता हूँ। 

कैसे लिखूं और क्या क्या लिखूं ?
शब्द कम ,

भाव बहुतेरे।  

Saturday, March 25, 2017

किंकर्तव्यविमूढ़

मेरा देश बड़ी  मुश्किल में हैं , इधर जाये या उधर जाये ! 
बड़ा किंकर्तव्यविमूढ़ सा हैं !! 

विकास की दौड़ में सबसे आगे रहना चाहता है , 
फिर घर की हालात देखकर ठिठक जाता हैं , 

खुशहाल बनने की ललक दिल में हैं , 
किसानों की दशा देखकर सहम जाता हैं , 

बराबरी का हक़ सबको मिले , 
महिलाओ पर होते अत्याचारो से जार जार रोता हैं, 

पूरे विश्व में शांति दूत बनना चाहता हैं , 
पड़ोसियों की हरकतों से बार बार जख्म खाता हैं , 

संताने उसकी मुक्कमल जहां बनाये , 
बढ़ती बेरोजगारी - हथोड़े सा वार करता हैं , 

सबको तरक्की के अवसर मिले , 
भ्रस्टाचार और बेईमानी राह में रोड़ा बनता हैं , 

सर्वधर्म समभाव रहे , 
कुछ लोगो को ये अखरता हैं , 

उम्मीद अभी हैं उसे , 
सदियो से वजूद उसका यूँ ही  कायम नहीं  हैं , 

उठ खड़े होंगे जब ढाई सौ अरब हाथ इक दिन , 
दुनिया में उसके जैसा फिर कोई नहीं हैं।  

Sunday, March 19, 2017

चलो , देश बदलते हैं



चलो , देश बदलते हैं , 
थोड़ा हम और थोड़ा दुसरो को बदलते हैं। 

मंद गति से चल रही विकास यात्रा को , 
आओ ढाई सौ अरब हाथो से थोड़ा धक्का लगाते हैं, 
चलो  , देश बदलते हैं। 

हम सब पहले भारतवासी हैं , 
जात -पात - धर्म- ऊँच - नीच  की राजनीति से थोड़ा ऊपर  उठते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

जो पिछड़े , अशिक्षित , गरीब हैं , 
उनको सब मिलकर ऊपर उठाते हैं , 
चलो  , देश बदलते हैं। 

जो जहाँ हैं , वही से शुरू करते हैं , 
अपना काम मेहनत और  ईमानदारी से करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

क़र्ज़ बहुत बड़ा हैं देश का सब पर , 
थोड़ा इस क़र्ज़ को कम करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।

कराह रही अपनी भारत माता के, 
चेहरे पर मुस्कान लाते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

Friday, March 17, 2017

ये चुनाव कुछ कहते हैं



उत्तर में भगवा लहराया , 
गोवा में थोड़ा सा कमल मुरझाया , 
मणिपुर में कमल शुरुवात हुई , 
पंजाब ने हाथ पर भरोसा जमाया।  

मोदी लहर ने फिर दिखाया कमाल , 
पंक्चर हुई "साइकिल" - "हाथ" हुआ लाल, 
"हाथी" की बदल गयी चाल , 
बाकियो का किसी ने न पूछा हाल।  

सारे मिलकर मंथन कर रहे हैं , 
हार का दोष अब एक दूसरे पर  मढ़  रहे हैं , 
कई  ई वी एम् को शक से देख रहे  हैं ,
अपनी कथनी  करनी कोई देख नहीं रहे हैं।  

मतदाता फिर से चुपचाप हो गया हैं , 
नेताओ को सबक सीखा दिया हैं , 
पांच साल बाद ही अब जागेगा , 
किस्मत अपनी नेताओ को देकर अपने काम में लग गया है।  

Friday, February 17, 2017

मतदान बाद , गणना से पहले



नींद उडी हैं नेताओ की , 
ई वी एम  में बंद हो गयी किस्मत।  

कुछ अब सोच रहे जीत गए तो कैसे कमायेंगे ? 
हार गए तो पाँच साल कैसे बितायेंगे ? 

बड़ी कशमकश चल रही हैं , 
ज़िन्दगी नीरस सी लग रही हैं।  

वादों -इरादों के पोस्टरों को जला  दिया हैं , 
अब किसी के हाथ न पड़े , छुपा दिया हैं।  

हर मतदाता को शक की निगाह से देख रहे हैं , 
लिया तो इन्होंने  मुझसे से हैं , वोट पता नहीं - किसे दिया हैं ? 

नेताजी के कट नहीं रहे दिन रात , 
चेले अब भी दिलासा दे रहे हैं - जीतोगे बस आप।  

नेता जी ने अब विपक्षी उम्मीदवारों से भी दोस्ती कर ली हैं , 
अपने भाषणों में उसकी खिल्ली पर माफी माँग ली हैं।  

समझौता हो गया है - तुम जीते तो हमारा भी काम करना , 
हम जीते तो तुम हमें अपना भाई ही समझना।  

दोनों अब साथ साथ कहकहे लगाते हैं , 
चेले दोनों के साथ में अब पार्टी उड़ाते हैं।  

इन्तजार में दिन कट रहे हैं , 
ख्याली पुलाव रोज़ बन रहे हैं।

एक दिन का राजा - मतदाता ,
अपने काम धंधे , रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लग जाता हैं।  

Wednesday, January 4, 2017

देश जगना चाहिये , देश चलना चाहिए

 हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए ,
देश आगे बढ़ना चाहिए।  

चलो - उठो - भारत निर्माण करना हैं , 
हर हाथ में काम होना चाहिए।  

वक्त आ गया अब नए भारत का निर्माण करना होगा , 
हर भारतवासी को देश के लिए पहले सोचना होगा।  

अपने पुरखो की सींची धरा पर कर्म बीज बोना होगा , 
आने वाली पीढ़ी के लिए " स्वच्छ और निर्मल" भारत देना होगा।  

जात-पात , धर्म - अधर्म , ऊँच -नीच से ऊपर उठना होगा , 
हरेक नागरिक को अब " भारतीयता " को समझना होगा।  

हिमालय से कन्याकुमारी , कच्छ से अरुणाचल तक अब बिगुल फूँकना होगा , 
"विश्व गुरु " का गौरव फिर से वापस पाना होगा।  

सिंहनाद कर दे सवा अरब भारतवासी जिस दिन , 
दुनिया का कोना कोना थर्रा जायेगा। 

शर्त सिर्फ पहले यह हैं की , 
हमें अपने को अंदर से जगाना  होगा।  

अपनी ऊर्जा , सामर्थ्य और विवेक को , 
देश हित में लगाना होगा।  

हर हाल में अब देश जगना चाहिए , 
"विश्व विजय " की रणभेरी लेकर हर भारतवासी चलना चाहिए।  

Monday, January 2, 2017

खुद की , खुद से ........( 2017 की पहली कविता )

 



क्या हैं ? हम में वो जुनून और वो जज्बा की , 
हम खुद से मुकाबला करे , 
रोज़ अपने लिए कुछ पैमाने तय करे और, और उन पर खरा  उतरे , 
अपने लिए खुद नियम बनाये और उन पर अमल करे , 
क्यूंकि हमें दुसरो की नक़ल नहीं करनी , 
हमारा तो खुद से मुकाबला हैं , 
अपने को बेहतर से और बेहतर करने की जंग , 
हमारे ही भीतर तो हैं। 

हमें हमारी सोच बदलनी होगी , 
अपने पंखो को परवाज देनी होगी , 
खुला आसमान हैं ये जहाँ , 
क्षितिज की तलाश हमें खुद करनी होगी ,
 न रुकना होगा , न झुकना होगा 
अपने लक्ष्यों तक अपने जूनून से पहुचना होगा ,
 लगेगी थोडा देर भले ही ,
हार ने मानने का जज्बा रखना होगा, 
हिम्मत  रखनी पड़ेगी दुनिया बदलने की , 
हर हालात में मुस्कराये ये कलेजा रखना होगा। 

दुनिया हमें पागल कहे तो भी अपना रास्ता खुद चुनना होगा, 
सफलता और असफलता को बिना ध्यान में रखे , 
हमें  अविरल बहना होगा,  
भेडचाल में चल के बहुत देख लिया अब, 
अपने लिए खुद का  मुकम्मल जहाँ बनाना होगा ,
 अपने ज़िन्दगी कारवां को हमें , 
और बेहतर बनाना होगा। 


Sunday, December 25, 2016

2016 को अलविदा और 2017 का स्वागत

चलो  की आगे बढ़ते हैं , 
2016 को अलविदा  और  2017 का स्वागत करते हैं।  

खट्टी - मिट्ठी यादो का पिटारा दे गया 2016 , 
2017 में और अच्छे की उम्मीद करते हैं !! 

ये समय चक्र हैं , 
अनवरत चलता रहेगा।  

बीता साल इतिहास का पन्ना , 
और आने वाला साल उम्मीदें गढ़ेगा !!

बस इतना याद रखियेगा , 
हर बीता पल  आपके जीवन खाते से ही कटता हैं।  

कुछ लोग हर पल को जी जाते हैं , 
और कुछ लोगो का बस गुजर जाता हैं !!

चलो की सब गिले-शिकवे , दुःख दर्द भूलते हैं , 
नए साल में फिर से नयी शुरुवात करते हैं।  

ज़िन्दगी एक नियामत हैं उस ईश्वर की , 
आओ की एक नयी परिभाषा गढ़ते हैं !! 

Thursday, December 22, 2016

कवि और कविता

जो देखता हूँ , वो लिखता हूँ !
शब्दो को आड़े तिरछे - आगे पीछे पिरोता हूँ !!

जो महसूस होता हैं !
शब्दो के जरिये बयां करता हूँ !!

अपने को कवि नहीं कहता  !
फिर भी कविताये लिखने का प्रयास करता हूँ !!

खालिस कवि तो विरला होता हैं !
वो शब्दो को मोती बना कविता को पिरोता हैं !!

कल्पना को अपनी शब्दो में जीवंत करता हैं !
एक  एक शब्द से पूरा सार गढ़ता हैं !! 

कभी भावनाओ के अतिरेक में बह कर विद्रोही सा लगता हैं !
कभी किसी विषय पर आँखों के कोरे गीली कर देता हैं !!

कवियों का संसार भी अजब हैं !
हर कोई दिल से यायावर और मस्तमौला हैं !!

हर चीज में उन्हें कविता सूझ जाती हैं !
ज़िन्दगी की  इस आपाधापी में भी  कलम बेबाक चलती हैं !!

Saturday, November 19, 2016

बदलाव की बयार ( नोटबंदी )

एक कोशिश हुई कुछ बदलने की , 
जो हम दिल से चाहते हैं !
किसी ने तो पहल की वो दुनिया बनाने की , 
जिसमे हम रहना चाहते हैं !! 

बदलाव की बयार बह रही हैं , 
हमें भी कुछ बदलना होगा !
अपने " आने वाले कल" के लिए,
 " आज " संघर्ष करना होगा !! 

देश आज दोराहे पर खड़ा हैं , 
कोई रास्ता तो चुनना होगा !
या तो ऐसे ही चलते रहो , 
या फिर परिवर्तन का हिस्सा बनना होगा !! 

बेशक अभी परेशानी बहुत हैं , 
हर तरफ हाहाकार हैं !
लोगो के सब्र का ये कड़ा इम्तेहान हैं , 
" देश " के लिए आज यही तो बलिदान हैं !! 

Monday, November 14, 2016

नोटबंदी के साइड इफेक्ट्स

पूरा विपक्ष एकजुट हो गया , भूल गया अपने उसूल !
कालेधन पर हथौड़ा मारा हैं , उनसे पूछे बिना मोदी जी ने शायद कर दी भूल !!

कुछ समय तो देते मोदी जी उनको , ठिकाना लगाना था काला धन !
वर्षो की मेहनत पर उनके , उड़ेल दी सारी धूल !!

"ऐसा भी कोई करता हैं" - एक झटके में ऐसे फैसला लेता हैं !
खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे , सारे देश को कोई क्या  लाइन में लगाता हैं ? !!

 सारा देश लाइन पर लग गया , छोड़ के सारे काज !
क्या ऐसे कोई करता हैं "काले धन " का पर्दाफाश ? !!

 आतंकवादी - आतंक भूल गए , उनके आकाओ को आ गया पसीना !
दुश्मन भी चित हुआ - बिना वार किये दिखा दिया छप्पन इंची सीना !!

गरीब आज खुश हुआ , मिला उसे बराबरी का ताज !
बड़े बड़े धन्ना सेठो को ,  चिंतित देखा आज !!

 ऐसा अवसर इतिहास में यदा -कदा ही आता हैं !
जब छोटा नोट , बड़े नोट को उसकी औकात  दिखाता हैं !!

खुल गए खजाने सब , टूट गयी तिजोरियाँ !

बनने चल दिया मेरा 'भारत ' फिर से 'सोने की चिड़िया ' !!

Wednesday, November 9, 2016

ऐ ! सैलरी , जरा धीरे धीरे गुजर। ( सभी वेतनभोगी कर्मचारियों को समर्पित)


तेरे इन्तजार में न दिन देखा-न रात ,
अब आयी हैं तो जरा ठहर !

मुझे तेरे होने का एहसास तो होने दे ,
कुछ वक्त तो मेरे साथ गुजार ले !

तेरे आने की आहट से ही दिल सुकून से भर जाता हैं ,
तेरे जाने पर दिल मेरा जार जार रोता हैं !

जब तक तू मेरे साथ रहती हैं ,
मेरा हर दिन होली , रात दिवाली होती हैं !

तेरे चले जाने के बाद ,
हर दिन बेरंग और रात अमावस होती हैं !

तू तो इतरा कर चली जाती हैं ,
तुझे इल्म नहीं हैं शायद , उसके बाद मुझपर क्या बीतती हैं ? !

तेरे फिर से आने के ख्यालो से जी लेता हूँ ,
हर रोज़ जी और मर लेता  हूँ !

अब आना -तो थोड़ी फुरसत लेकर आना,
कुछ दिन और रुककर मुझे ज़िंदा होने का एहसास करा जाना !

तेरी बाट जोहूंगा ,
हो सके तो समय पर आ जाना ! 

काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक

मोदी जी हद कर दी , 
एक झटके में ५०० और १००० के नोटों की गड्डी रद्दी कर दी !

कितने जतनो से कमाई थी , 
नजर न लगे किसी की , सबसे छुपाई थी !

न जाने कहाँ कहाँ लक्ष्मी माता कैद रखी थी , 
तुम्हारे एक एलान से झटके में मुस्कराई थी !

काली तिजोरियो में हड़कंप हैं , 
पहली बार १०० के नोट के आगे ५०० का नोट बेदम हैं !

अब कैसे लड़े जायेंगे चुनाव -कैसे होगा हवाला कारोबार , 
इस सर्जिकल स्ट्राइक में वाकई दम हैं !

हर बार कुछ गजब कर जाते हो , 
इतना बड़ा जिगर कहाँ से लाते हो ? !

लगता हैं कुछ कर जाओगे , 
इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरो में लिख जाओगे।  

Tuesday, November 8, 2016

पलायन का दर्द




छोड़ कर अपना घोंसला एक दिन , 
उड़ पड़ा  पंछी नया आसमां ढूंढने , 

नए पंखो की उड़ान लंबी थी , 
सब कुछ नाप जाने की ललक भी थी , 

नई उम्मीदे , नए हौंसले 
नव किरण की आस लिए 

माँ ने समझाया - बाप ने बुझाया ,बहनो ने रिझाया - भाइयो ने हड़काया। 
सबकी अनसुनी कर , उड़ चला वो मस्तमौला अपनी दुनिया से अनजानी दुनिया में रम गया।।

वो नयी दुनिया पाकर मस्त हो गया , घोंसला उसका बिखर गया ।  
उसको नया आसमां रास आ गया , पीछे उसका सब कुछ छूट गया।।  

बहुत कुछ मिल गया उसे ,  पा लिया सबकुछ  जिसकी उसको चाह थी।  
मगर बैचैनी थी  कुछ उसे , शायद उस मिटटी में कुछ अलग बात थी।। 

चकाचौंध की अपनी नयी दुनिया में, अब उसे सुकून की तलाश थी।  
रौंदा था जिस मिटटी को बचपन में , शायद उसको उसकी खुशबूं अब भी याद थी।।

स्वंछंद और बेफिक्रे घूमने की शायद  उस पर पाबन्दी थी।  
डरा डरा रहने की शायद , नए आकाश में  मजबूरी थी।।  

Sunday, November 6, 2016

फिजायें कुछ बदली सी हैं .... ( देश की राजधानी और उसके आसपास के वातावरण पर समर्पित कविता )

आबो हवा कुछ बदली सी हैं , कोहरे की चादर ओढे सुबह रो रही  हैं !
सूरज अपनी किरणे भेजता तो हैं , ये अजीब सी धुंध अपने अंदर सोख रही हैं !!

फक्र होता था जिन हवाओ पर कभी , आज वही जहरीली सी क्यों हैं ? !
लगता हैं कही कुछ साजिश हैं , हवाओ को कैद करने की मंशा तो नहीं हैं ? !!

आँखे लहूलुहान , फेफड़ो का दम घुट रहा हैं !
कही इसके लिए हम सब तो जिम्मेदार नहीं हैं ? !!

प्रक्रति तो अपने तय नियमानुसार ही चलती हैं !
जैसे करोगे वैसा भरोगो - बार बार कहती हैं !!

हवाओ ने भी अब सीधा सबक सिखाने की ठान ली हैं !
दंभ और आडंबर ओढ़े हम इंसानो को अपनी करनी याद दिला दी हैं !!