Monday, August 11, 2025

ए आई ( कृत्रिम बुद्धिमता )


कितना अच्छा हो जायेगा , 

हमारा सब काम ए आई से हो जायेगा , 

हमारे सारे सवालों का उत्तर , 

ए आई बड़ी सटीकता से देगा , 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

हम कही फँसे तो , 

ए आई हमें रास्ता दिखायेगा , 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

बीमारी में वो हमें , 

सबसे अच्छी दवा सुझायेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

हमारा हिसाब किताब भी वही रखेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

जब वो हमारे सारे दिमागी काम , 

ए आई खुद कर देगा , 

कितना अच्छा होगा , 

स्कूलों में ए आई पढ़ायेगा , 

कितना आराम होगा , 

जब सारे मुश्किल प्रश्न , 

ए आई झटपट सुलझायेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

जब वो हमारे अच्छे -बुरे सब में , 

हमारे साथ हमारे दोस्त की तरह होगा, 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

जब ए आई का साथ ही काफी होगा , 

क्या फर्क पड़ेगा ? 

जब हम अपनी अक्ल का इस्तेमाल , 

करना भूल जायेंगे , 

दिमाग हमेशा स्थिर हो जायेगा , 

सोचने समझने के क्रम में जो , 

विकसित हुआ था मस्तिष्क हमारा , 

फिर से सिफ़र हो जायेगा , 

ए आई जिस दिन ठहरेगा , 

वही दिन क़यामत का दिन होगा।   

Wednesday, August 6, 2025

जल्दी

हम सब आजकल , 

बहुत जल्दी में है , 

घर में , 

दफ्तर में , 

सड़क में , 

काम में , 

और यही जल्दी , 

हमारा धैर्य , 

खा रही है , 

हम उग्र हो रहे है , 

व्यग्र हो रहे है , 

और खो रहे है , 

मन की शांति , 

सुकून , 

और क्षय हो रहा है , 

हमारे शरीर का , 

हमारे मस्तिष्क का, 

ये जल्दी , 

धीरे -धीरे , 

घुन की भाँति , 

चट कर रही है , 

जीवन को।   

Monday, July 28, 2025

सावन

उमड़ घुमड़ मेघों का आच्छादन, 

नीले अम्बर पर जैसे श्वेतावरण , 

अठखेलियाँ खेलते संग समीरण , 

कोहरे से धुऑं -धुआँ वातावरण।  


कोई श्वेत वर्ण, कोई श्यामवर्ण , 

करते जोर -शोर से गर्जन ,

तरुवर सब निहारे नभ को , 

बूँदो से फिर दृश्य धरा विहँगम।  


रोम - रोम पुलकित धरा का , 

हरा -भरा चहुँओर आवरण , 

पपीहे -मयूरा सब नाचे पँख फैला , 

झूम -झूम बरसे जब सावन।  


पुलकित रज का कण -कण  , 

बूँदो की छुअन अप्रतिम , 

खिले हुए से तन -मन सारे , 

बरसे जब भी पीयूष सावन।  

Thursday, July 24, 2025

पहाड़ों का चौमास


बारिश होती है खूब , 

पहाड़ों में ऊँचे ऊँचे डानो में , 

पानी सब इकठ्ठा होता है , 

गधेरों में , और गधेरे , 

सब मिल जाते है नदी में , 

एक मरियल सी सर्पीली नदी , 

जिसे कल तक यूँ ही फाँक मार कर , 

पार कर जाते थे बच्चे भी , 

अचानक से चौमास में , 

वार -पार फ़ैल जाती है , 

और पानी का सौट , 

इतना तेज , 

बड़े बड़े गंगलोड़ , 

सब बहा ले जाती है , 

इन गंगलोड़ो को , 

लुढ़का लुढ़का कर पीस देती है , 

और किनारे लगा देती है , 

बजरी बनाकर , 

अपना छीना -छिनाया क्षेत्र , 

सब वापस लेकर अतिक्रमण से , 

फिर एकदम शांत हो जाती है , 

चौमास के बाद नदी , 

फिर से पतली , सूखी धार , 

बन जाती है , 

अगले चौमास तक।   

Monday, July 14, 2025

भीष्म प्रतिज्ञा

 

देख पिता का संताप , देवव्रत को बड़ा विषाद हुआ ,

क्या उनके हस्तिनापुर आने से ही महाराज का ये हाल हुआ ,

तरसा जिनके स्नेह के लिये पूरे पच्चीस बरस ,

मिलन पर ये कैसा तुषारापात हुआ। 

 

पुत्र  तो पिता को सुःख देने के लिये होता है ,

एक जनक के लिये पुत्र  वर्तमान , भविष्य होता है ,

पूत सपूत वंश का अभिमान होता है  ,

पूत कपूत वंश का कलंक होता है । 

 

परशुराम  शिष्य निकले ढूँढने समाधान ,

संकट आ गया उनके सामने महान ,

जो हो स्वंय गंगा पुत्र , वो क्यों हो विचलित,

बदलने को आतुर सब विधान। 

 

ले जल हाथ में,साक्षी बने अरुण –वरुण-व्योम  ,

ठहर गया सारा चर-अचर जगत तमाम ,

करने चला शांतनु पुत्र, आज प्रण महान ,

पिता के सुख के लिए भविष्य का बलिदान। 

 

प्रण करता हूँ - आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा ,

हस्तिनापुर राजसिंहासन का ताउम्र सेवक रहूँगा ,

सूर्य बदल दे रास्ता अपना , चन्द्रमा कलाएँ भूल जाये ,

अटल रहेगा प्रण देवव्रत का , जब तक प्राण तन से न जाये। 

 

जिसके सिर मुकुट सजना था हस्तिनापुर का ,

जिसकी भुजाओं में अकूत बल , मस्तक पर तेज था ,

अस्त्र -शस्त्र , वेदों में निपुण , नीतियों का मर्मज्ञ था ,

किस्मत की लेखी पर कहाँ उसका वश चलना था। 

 

हे ! विधाता - ये क्या कर दिया तूने , शान्तनु को पश्चताप हुआ ,

हस्तिनापुर के युवराज ने सब कुछ एक पल में त्याग  दिया ,

जोड़कर अपने सब पुण्य कर्मों को , एक आशीष दिया ,

ईच्छा मृत्यु का वरदान , और नाम " भीष्म " दे दिया। 

 

सत्यवती का अपना रुख , शांतनु समय का इक मोहरा था,

निर्णय ये इतना सहज न था, कौन जानता था आगे क्या होना था ,

परिस्थितयों के वश लिया गया  निर्णय ,काल की एक चाल थी ,

किसे पता था - महाभारत की नींव उसी दिन पड़ चुकी थी। 

Friday, July 11, 2025

महत्व

 

रात ने कभी सुबह से शिकायत नहीं की ,

सुबह ने रात को कभी नहीं चिढ़ाया ,

दोनों को पता है महत्व इक दूजे का ,

इक दूसरे के बिना अस्तित्व कहाँ उनका। 

 

उतार -चढ़ाव भी तो ऐसे ही जीवन चक्र में ,

एहसासों के अनुभव से गुजरने का सफर सारा ,

मुक्कमल सफ़र -ऐ -ज़िन्दगी तो वही जहाँ में ,

कर्मफल जो मिला , जिसने दिल से स्वीकारा। 

Wednesday, July 2, 2025

जानता नहीं , मैं कौन हूँ ?

 

सड़क पर टक्कर मार ,

एक लम्बी गाड़ी वाला ,

अकड़ झाड़ रहा था ,

साईकिल वाले को ,

घुड़की दे रहा था ,

तेज आवाज़ में चिल्ला रहा था ,

"जानता नहीं , मैं कौन हूँ ?"

साईकिल वाला अपने पैर के ,

रिसते हुए खून को पोछते हुए बोला ,

दूसरे हाथ से साईकिल को संभाले हुए , 

" मैं तो नहीं जानता ,

मगर क्या तुम जानते हो ,

मैं कौन हूँ ?

गलती तुम्हारी है ,

जाओ , जाओ साहब  ,

बख्श देता हूँ आज ,

आपसे बड़ा तो मैं हूँ। "

प्रकोप

 

नदी, नाले, गधेरे, पहाड़, जंगल

आपसे कुछ नहीं कहेंगे ,

मगर जब आप उनका हक़ छीनोगे ,

इक दिन एक झटके में सब ले लेंगे। 


सहने की भी इक सीमा होती है ,

वो उससे ऊपर भी सह जाते है ,

असहनीय अतिक्रमण हो जाता है जब ,

वो भी अपना गुस्सा जाहिर करते है। 


 कुदरत जानती है संतुलन बनाना ,

वो उसका नैसर्गिक स्वभाव है ,

जरूरतें तो पूरी कर सकते है ये सब ,

लालच का तो इनके पास भी नहीं कोई समाधान।  

Saturday, June 28, 2025

घर

 


जिसके किसी भी कोने में सुकून आ जाये ,

जिसके दीवारों से अपने बचपन की खुशबू आये ,

जिसके आँगन में अभी भी बचपन अटका हो ,

जिसके जर्रे जर्रे पर माता -पिता का अक्स नजर आये ,

जिसके हर कमरे की एक कहानी हो ,

जिसके दरख्तों पर छुपी कोई निशानी हो ,

जिसकी अलमारियों में बंद कई यादें हो ,

जिसकी दहलीज पर माँ का मन बसता हो ,

जिसकी फुलवारियों पर पिता की छाया हो ,

जिसकी नींव पर पूर्वजों का आशीर्वाद हो ,

वो " घर " होता है , बाकी तो  मकान होते है। 

Thursday, June 26, 2025

शाबाशी

 

दे सकते हो तो उम्मीद दो ,

बाँट सकते हो तो दर्द बाँटो ,

उलझे है सब यहाँ " आनंद "

बुरा तो दुश्मन का भी न सोचो। 

 

चिंताओं में वक्त मत गँवाओ ,

वो देख लेगा - दिल को समझाओ ,

हाथ में जो वर्तमान है "आनन्द ",

जैसा भी है , स्वीकारो और जियो। 

 

कौन क्या सोचता है ,

ये उसकी तकलीफ है ,

वक्त वैसे भी फिसला जा रहा ,

फालतू चीजों पर वक्त न जाया करो। 

 

खुशियाँ ढूँढने से नहीं मिलती ,

बड़ी कामयाबियाँ रोज़ नहीं होती ,

संघर्ष तो सभी की ज़िन्दगी में है ,

खुद को भी शाबाशी देना सीखो। 

Friday, June 13, 2025

इन्तजार

तुम मिलोगे दुबारा ? 

मैं नहीं जानता , 

मगर उम्मीद है , 

ज़िन्दगी के किसी न किसी , 

मोड़ पर , 

हम फिर टकरायेंगे , 

वो बात अलग होगी , 

तुम भी न जाने कितना सफर,

तय कर आये होगे, 

और मैं भी , 

मगर विश्वास तब तक , 

कायम रहेगा फिर मिलने का , 

जब तक ये दुनिया गोल रहेगी।  

जीवन

 

जीवन कौन चला रहा है ? 

क्या हम ?

कतई नहीं , 

हमें तो पता भी नहीं , 

अगले पल क्या होने वाला है ? 


फिर किसके हाथ में डोर है ? 

प्रकृति की , 

नहीं , 

इसको भी कोई और नियंत्रित कर रहा है , 


फिर किसके हाथों की कठपुतली है हम ? 

कौन हमें नचा रहा है ? 

किसकी मर्ज़ी से साँसे चल रही है ?

किसकी ईच्छा से ये संसार चल रहा है ? 


सबके अपने -अपने नाम है , 

सबका अपना -अपना विश्वास है , 

कोई तो है कहीं न कही , 

जो अदृश्य होकर भी कण -कण में बसा हैं।   

Sunday, June 8, 2025

शनैः शनैः

 शनैः शनैः , 

हम धैर्य खो रहे है , 

हम संयम खो रहे है , 

हम विश्वास खो रहे है , 

हम आस खो हो रहे है।  


शनैः शनैः , 

हम ईश्वर को भूल रहे है , 

हम रिश्ते भूल रहे है , 

हम मानवता भूल रहे है , 

हम करुणा , दया भूल रहे है।  


सच ये भी है  , 

धरती पर मानव सभ्यता , 

इन्ही गुणों से शताब्दियों तक , 

बची रही है।  

Thursday, June 5, 2025

पहाड़

आधे  से अधिक पहाड़ , 

पहले ही मैदानों में पहुँच चुका है , 

जो आधा बचा था गाँवों में , 

उसमे भी तीन चौथाई अब , 

सड़क किनारे बस चुका है , 

बचा एक चौथाई त्रस्त है , 

बन्दर , लंगूरो , सूअरों के आतंक से , 

गाँव के जीर्ण घरो के आँगन में , 

सिसूण जम चुका है , 

और जंगलों में चीड़ सिर उठा रहा है , 

जंगलो के रास्ते गुम हो चुके है , 

इन सबमे जंगल में , 

फिर से आ चुके है बाघ, 

गाँव अब गाँव नहीं रह गए , 

सड़क दूर गाँव अब सब , 

फिर से जंगल होने के कगार पर है।