Tuesday, July 9, 2019

डिजिटल युग ( हास्य )


डियर  शायद तुम उदास हो , 
क्यूंकि दो दिन से तुमने स्टेटस में कुछ डाला ही नहीं , 
डियर  शायद तुम कुछ दिनों से सजी संवरी नहीं , 
इंस्टाग्राम पर तुम्हारा कोई नया फोटो आया ही नहीं , 
शायद तुम्हे किसी के ऑनलाइन आने से डर लग रहा है , 
क्यूंकि व्हाट्सएप्प पर तुम्हारा लास्ट सीन घंटो से बदला ही नहीं।  

डियर  शायद तुम किसी बात से खफा हो , 
वर्ना फ़ोन स्विचड ऑफ तुम करती नहीं  , 
शायद कही घूमने भी नहीं जा पायी हो , 
फेसबुक में कुछ अपडेट आया ही नहीं।  
ट्विटर  पर फॉलोवर घटने लगे है , 
तुम्हारा ट्वीट अब वायरल होता ही नहीं।  


अब तो तुम्हारा हाल ऑनलाइन देखकर ही समझ लेता हूँ , 
फिर भी तुम कहती हो - मैं तुम्हारी  चिंता  नहीं करता हूँ।  

Friday, July 5, 2019

बारिश की पहली बूँद

बारिश की पहली बूँद 
जब धरा पर गिरी , 
सूखी मिट्टी ने उड़कर , 
उसे गले लगा लिया , 
रच बस कर जब दोनों गिरे , 
धरा पर , 
सावन आ गया।  

सोंधी सी सुगंध , 
मिट्टी बौरा गयी , 
बादलो ने देखो , 
उसकी झोली भर दी, 
लहलहा उठा , 
तन मन , 
कपोले उसके सीने से , 
फूट पड़ी , 
आलिंगन कर बारिश का , 
देखो ! धरा सज गयी।  

निर्लज्ज , बेवफा 
कितनी देर लगा दी , 
बूँदो तुमने धरा की , 
जान हलक में ला दी ,
आये हो अब तो , 
निहाल कर दो , 
कण कण में समा कर , 
 " मिट्टी " को सोना कर दो।   

Sunday, June 23, 2019

मेरे दस "शेर"


1
अच्छा है ,  दिमाग को भूलने की बीमारी है
सोचो , सब याद रहता तो न जाने क्या होता। 

2
कुछ मसले , यूँ ही हल नहीं होते। 
एक ही समय में , दोनों को "मैं " नहीं " हम " होना पड़ता है। 

 3
बदलते दौर में  इश्क की बुनियाद , हिल सी गयी है ,
रूहानी न होकर अब , जिस्म पर टिक गयी है। 

4
उड़ेंगे वही जिनके पंख होंगे ,
चाहने भर से आसमां नहीं नापा जाता। 

5
किसने कहा "वो " नहीं सुनता ,
दिल से आवाज कब लगाई थी।

6
मत मुस्करा किसी की लाचारी पर ,
वक्त ने पढ़ाया है पाठ कइयो को। 

 7
जो खाते थे कसमें हर हाल में साथ निभाने की ,
ग़ुरबत के दिन क्या आये , निकल लिए। 

8
सुना था तेरा शहर बड़ा संजीदा है ,
एक चौराहे से अभी अभी बचकर लौटा हूँ मैं। 

9
किताबी बातों को सच मान लेते तो ,
न जाने कैसे जीते इस जहाँ में। 

10
"सच" बोलते है ,
इसीलिए बहुतो को खटकते है। 

Wednesday, June 19, 2019

चुड़ैल



कहते है वो भुतहा महल है , 
वहाँ एक चुड़ैल रहती है , 
मर गयी थी वो इन्तजार में , 
हर आहट पर अब उसकी नजर है।  

लूट लिया था उसका महल , 
उसके ही अपनों ने , 
धोखा दिया था किसी ने उसको, 
जिस पर उसको खुद से ज्यादा यकीन था। 

कितने ताने , 
कितने पहरे , 
कितने अत्याचार , 
कितनी जगहँसाई हुई थी।  

अब कहते है उस महल में , 
चुड़ैल रहती है , 
हर आने वाले पर  , 
चीखती -चिल्लाती और हँसती है।  

Thursday, June 13, 2019

बचपन की यारी


चल , भागते है 
कटी पतंग लाते है , 
आ जरा , पानी में छपकी , 
दोनों पैरो से लगाते है।  

थक गया , मेरे कंधे में हाथ रख , 
स्कूल जाते है , 
रास्ते में वो आम का पेड़ है न , 
दो चार आम चुराते है।  

फिक्र मत कर होम वर्क की , 
मैं भी फाड़ देता हूँ , 
चल , क्लास में दोनों , 
साथ में डाँट खाते है।  

आज मैं तेरी पसंद की सब्जी लाया हूँ , 
दोनों मिलकर खाएंगे , 
तेरे घर की रोटी में बहुत स्वाद है , 
मिलकर मौज उड़ायेंगे।  

जब मैं बड़ा होऊँगा , 
बहुत बड़ा आदमी बनूँगा , 
तू फिक्र मत कर , 
तुझे भी साथ रखूँगा।  

छुट्टी के बाद , 
साथ घर वापस जायेंगे , 
उसने कल पन्गा किया था न , 
आज उसको मिलकर मजा चखायेंगे।  

देखना , एक दिन हमारा राज होगा ,
हमारी दोस्ती पर नाज होगा , 
छू लेंगे आसमान भी  , 
जब तू मेरे साथ होगा।  

फोटो साभार - गूगल 

Tuesday, June 4, 2019

सोचो , हम क्या देकर जायेंगे ?


दूषित जल ,
कंक्रीट के जंगल ,
जहरीली हवा ,
अनुपजाऊ  जमीन ,
विषाक्त फल।

छोड़ जायेंगे इनके सहारे ,
बंद कमरे ,
गैजेट्स ,
एटम बम ,
कृत्रिम साँसे ,
अदकच्चा , अदपक्का जीवन। 

शेखी हमारी ,
उन्नति की ,
नई पीढ़ी को ,
पंगु कर जायेगी ,
प्रकृति से दूर ,
कृत्रिम दुनिया में ,
कब तक जीवित ,
रह पायेगी।

Monday, June 3, 2019

इनायत


हौंसला चट्टानों से टकराने का ,
                                     हम भी रखते हैं ,                                        
जिम्मेदारियों ने धार कुछ ,
कुंद कर दी। 

अकेले दुनिया नापने की हिम्मत ,
हम भी रखते है ,
साथ लेकर चलने की कवायद ने ,
चाल मंद कर दी। 

हवा में उड़ने की ख्वाइश ,
हम भी रखते है ,
जमीन से जुड़े रहने की नसीहत,
पँखो को परवाज भरने नहीं दी। 

शिकायतें बहुत रही ज़िन्दगी से ,
हमें भी ,
मगर इनायतों को गिना तो ,
वो सब पर भारी निकली। 

Tuesday, May 28, 2019

लहरें

लहरें , 
पानी की हो ,
या ,
यादों की , 
बहा ले जाती है , 
सब कुछ , 
और जब तन्द्रा टूटती है , 
तब , 
बहुत आगे निकल जाने का , 
एहसास , 
एकाकीपन , 
और आगे बढ़ने की, 
मजबूरी , 
या 
उम्मीदों का अपनापन।   

Friday, May 24, 2019

जीत


जीत , 
चाहे छोटी हो या , 
बड़ी , 
सब कुछ छुपा लेती है , 
कमियाँ , 
खामियाँ , 
अवगुण , 
क्यूंकि , 
जीत की परत , 
बहुत मोटी होती है , 
वह सब कुछ, 
अपने नीचे , 
छुपाकर , 
बस , 
ऊपरी सतह पर , 
मेहनत , 
जज्बा , 
जूनून , 
और हौंसला , 
दिखाती है, 
जीत , बस , 
जीत होती है , 
और , 
बहुत जरुरी होती है।   

Tuesday, May 21, 2019

गुरुर


मत इतराना अपने गुरुर पर ,
वक्त के आगे ये कुछ भी नहीं ,
देखा है मिट्टी में मिलते ,
रावण को और सिकंदर को भी।  

कर्मो की लकीरें ही,
याद रहती है जमाने को ,
जीये तो कृष्ण भी थे ,
और कंस भी।  

Friday, May 3, 2019

लोकतंत्र




लोकतंत्र की जब अवधारणा की होगी ,
कितनी गजब रही होगी ,
जनता से ,
जनता द्वारा ,
जनता के लिए ,
सेवक चुने जायेंगे ,
सोचकर ही जनता की बाँछे खिली होंगी। 

हम ही शासक ,
हम ही प्रजा ,
हमारे कानून ,
हमारे नियम ,
कोई भेदभाव नहीं ,
सबको समान अवसर ,
किताबो में यही परिभाषा उकेरी होगी। 

यथार्थ में ,
नेता ही सबकुछ ,
नया क्षत्रप हो गया ,
जनता की भागीदारी ,
बस वोट तक सीमित ,
बाकि लोकतंत्र ,  किताबो तक ही रह  गया।   


Friday, April 26, 2019

नन्ही चिड़िया



नन्ही चिड़िया ढूंढ रही , 
कहीं तो मिले उसे छाँव , 
पेड़ो की डालियाँ कट गयी , 
बेचारी अब कहाँ जाय।  

पोखर , तालाब 
नदी ,  नाले सब सुख गए , 
कहाँ तक अब पंख फड़फड़ाय , 
बेरहम सूरज कुछ तो तरस खा , 
अब ये नन्ही चिड़िया कहाँ जाये। 

आग बरसा रही किरणे , 
धरती बन रही शोला , 
घर के मुंडेर रहे नहीं अब , 
कहाँ अब अपना घौंसला बनाये , 
अब ये नन्ही चिड़िया कहाँ जाये।

उड़ने से पहले सोचे , 
कहीं कोई डाल मिल जाये , 
दूर तक फैला बंजर , 
इस तपती गर्मी में , 
नन्हे पँख झुलस जाय, 
अब ये नन्ही चिड़िया कहाँ जाये।

किससे अपना दर्द कहें , 
कुछ समझ न आये , 
मृगतृष्णा सी प्यास उसकी , 
दूर दूर भटकाये ,
अब ये नन्ही चिड़िया कहाँ जाये।

बनाओ तुम अट्टालिकाएं , 
करो प्रकृति से खिलवाड़ , 
वृक्ष न बचेंगे धरा पर गर तो , 
तुम्हारा भी होगा ऐसा ही हाल , 
सोचो और बताओ , 
अब ये नन्ही चिड़िया कहाँ जाये।

Wednesday, April 17, 2019

प्राइवेट कर्मचारी


घुटती ज़िन्दगी ,
बेदम साँसे ,
लड़खड़ाते कदम ,
टूटते शब्द
उनींदी  ऑंखें
आँखों के नीचे घेरे ,
माथे पर बल ,
लटका हुआ चेहरा ,
आधे अधूरे सपने ,
दौड़ता भागता जिस्म ,
थोड़ा छटपटाहट ,
थोड़ा बेचैनी ,
आधा अधूरा विश्वास ,
नकली सी हँसी ,
घबराया मन ,
कंधे पर लटकता बैग ,
हाथ में टिफ़िन ,
बड़बड़ाता मुँह ,
घडी पर नजर ,
ऑफिस से आता हुआ ,
एक प्राइवेट कर्मचारी।


Image source - Google 

Sunday, April 7, 2019

मताधिकार - जनाधिकार





लोकतंत्र का आधार ,
मताधिकार - जनाधिकार ,
सोच विचारकर बटन दबाना ,
होगा इससे ही भविष्य साकार। 

सियासत की ये कुँजी ,
एक एक मत जरुरी ,
जनता की , जनता द्वारा , जनता से सरकार बने ,
लोकतंत्र की पूँजी । 

सुनना सबकी ,
करना मन की ,
देश प्रगति पथ पर आगे बढ़े ,
यह ध्यान रखना है जरुरी । 

उठो , जागो और विचारो ,
लोकतंत्र का ये महापर्व है ,
अगले पाँच वर्षो का भविष्य
आपके वोट से ही तय होना है। 


Tuesday, April 2, 2019

बढ़ती उम्र


बढ़ती उम्र का शुक्रिया , 
बहुत कुछ तजुर्बा दिया , 
ज़िन्दगी को समझने का , 
एक नया नजरिया दिया।  

माथे की लकीरें , 
संघर्षो से जूझने का प्रमाण है , 
कान के नीचे पके बाल , 
अनुभव की खान है , 
माथे की बढ़ी चौड़ाई, 
सफलताओ की पहचान है।  

थोड़ा आगे बड़ा पेट , 
परिस्थितियों से सामंजस्य है , 
गालो में फुलाव , 
छोटी छोटी खुशियों का सार है।  

धीमी और मंद चाल , 
धैर्य का सलीका है , 
आँखों में चश्मा , 
हर चीज को बारीकी से देखने का तरीका है।  

छोटी छोटी बातें भूलना, 
सयानेपन की निशानी है , 
कभी कभी ज़िद पर अड़ जाना , 
बचपने को ज़िंदा रखने की ख्वाईश है।