Thursday, September 25, 2025

प्रकृति का गुरुमंत्र


मसला सिर्फ इक हल न हुआ ,

जितनी मेहनत की , उतना फल न मिला ,

देखे बियाबान में बहुतेरे ऐसे ,

किस्मत से जिनको भर -भरके मिला। 

 

सोचा षड़यंत्र है ये कोई प्रकृति का ,

थोड़ा दिमाग लगाया तो समझ आया ,

जिन्होंने मेहनत की सही दिशा में ,

समय और किस्मत का उनको साथ मिला।

 

मेहनत तो सभी करते है अपने स्तर पर ,

फर्क फिर कहाँ पैदा होता है , ये बता ,

सही समय पर सही दिशा में जो ऊर्जा लगाये ,

प्रकृति के उसूलों से मिलती है उसी को सफ़लता। 


Saturday, September 20, 2025

सफलता की कुँजी

 

इक जूनून सा जगाना पड़ता है ,

ध्यान बगुले सा लगाना पड़ता है ,

आसानी से नहीं मिलती मंजिल ,

बाकियों से अधिक श्रम करना पड़ता है। 

 

विश्वास खुद पर रखना होता है ,

निराशाओं को पार करना होता है ,

हुनर तो बहुतों के पास हैं "आनन्द " ,

एक कदम औरों से आगे चलना होता है। 

 

शंका स्वंय पर कमजोरी है ,

इंसान के बूते सब कुछ हासिल है ,

करना पड़ता है त्याग थोड़ा ,

मखमल में कहाँ कमल खिलता हैं। 

 

ध्यान और मेहनत सफलता की कुँजी है ,

परिस्थितियाँ तो बस इक बहाना है ,

लक्ष्य सामने , परिश्रम एकसार ,

गर्जन में ही कदम्ब के फूल खिलते है। 

Thursday, September 18, 2025

छलावा

शनैः शनैः हम इक ,

छलावे की दुनिया ,

असली समझ , 

गिरफ्त में आ रहे है , 

इस दुनिया का कोई , 

सिर पैर नहीं है , 

सब आभाषी , 

सब छदम , 

इसी दुनिया को अब , 

नई दुनिया समझ रहे है।  


डर इस बात का है सिर्फ , 

छदम या आभाषी दुनिया की , 

उम्र लंबी नहीं होती है , 

फिर जब टूटेगा भ्रम , 

तब तक शायद बहुत देर , 

हो चुकी होगी , 

और शायद इक पीढ़ी , 

भ्रम में ही खप चुकी होगी, 

नई पीढ़ी को फिर , 

सिफ़र से शुरुवात करनी होगी।  

Friday, September 12, 2025

ज़ेन -जी

 

अलग़ नहीं है ये हमसे ,

मगर तेवर थोड़ा जुदा है ,

कसूर इनका नहीं है ,

वक्त ही अब इनका है।

 

जोशोजुनूं से लबरेज ,

खून नया नया है ,

आंधी , तूफ़ान से नहीं डरने वाले ,

हवाओं का रुख मोड़ने वाले है।

 

तकनीक हाथों की कठपुतली ,

पहुँच में सारा जहान है ,

माकूल हवाओं का इन्तजार क्यों ,

आज ही समाधान है।

 

ये कल का आधार है ,

आज की कीमत जानते है ,

लगे भले ही थोड़े विद्रोही से ,

ये जंजीरें तोड़ना जानते हैं।

 

व्यावहारिकता इनके नस नस में ,

किताबी बातें सिर्फ ढकोसला है ,

वक्त बदला है , दौर बदला है ,

अपना हक़ सब जानते है।

 

बहुत आग है ,

तूफ़ान है इनके अंदर ,

मिल गया सही रास्ता ,

बदल सकते है ये सारा मंजर।

 

चिंता बस इक बात की है ,

किसी की कठपुतली मत बनना ,

सक्षम हो तुम सब मिलकर ही ,

आवाज हक़ में बुलंद रखना।

Wednesday, September 10, 2025

उद्देश्य

 न जाने कहाँ से लुढ़कते लुढ़कते ,

किनारे लगा था वो बड़ा सा पत्थर ,

किसी रोज़ जब नदी में बाढ़ आयी थी ,

बहुत कोशिशों से कोई न हटा पाया था ,

उस पत्थर ने एक तरफ नदी की धार रोक दी थी ,

सब की उलाहना सहते सहते वो भी तंग था ,

"मेरी फूटी किस्मत " रोज़ रोता था ,

फिर आदत हो गयी उसे किनारे पर रहते रहते ,

नदी ने जमा कर दी थी गाद चारों ओर उसके ,

बच्चे आते थे , चढ़कर उसपर नदी में छलाँग मारते थे ,

वो रोज़ नदी को बहते देखता और ,

पुराने दिनों की यादों में खो जाता ,

फिर एक चौमास घनघोर बारिश हुई ,

नदी ने विकराल रूप धारण किया ,

जो मिला रास्ते में , सब निगल लिया ,

जब टकरायी उस शिला से,

बहुत वेग लगाया , खूब जोर लगाया ,

एक बार पत्थर का भी जी ललचाया ,

वो तो बहने के इन्तजार में ही पड़ा था,

मगर अचानक से उसे ख्याल आया ,

उसे सहारा मान नदी के उस किनारे ,

लहलहा रही थी फसलें ,

कुछ मकान बन चुके थे ,

सोचकर उसने अपना इरादा बदल लिया ,

नदी जितना वेग लगाती उसे उखाड़ने को ,

वो उतना ही धँसता गढ़ता चला जाता,

नदी ने समझाया , बुझाया उसको ,

साथ बहने की हिदायत दी ,

मगर टस से मस न हुआ वो हठी ,

अड़ा रहा और सारा पानी उतर गया ,

बच्चे -बड़े सब कहने लगे ,

इस "शिला" ने सबको बचा लिया,

शिला को अपना ठहरने का उद्देश्य समझ आ गया ,

दुत्कारें सब दुआओं में बदल गयी ,

शिला की तबसे पूजा होने लगी ,

कुछ भी बिना उद्देश्य के नहीं है जगत में ,

सबका इक प्रारब्ध है ,

वक्त का बस इन्तजार रहता है ,

अकारण  इस जगत में कुछ भी नहीं।     

 

Monday, September 8, 2025

सुनो ज़िन्दगी

सुनो ज़िन्दगी , 

एक बात करनी है , 

इक मुद्दा सुलझाना है , 

मुद्दा ये है , 

जिस गति से तुम भाग रही हो , 

वह गति मुझे मंजूर नहीं है , 

तुम्हारा क्या है ? 

समय के साथ क्यों दौड़ लगा रही हो , 

थोड़ा आराम आराम से चलो , 

मेरी ख्वाइशें हर मील के पत्थर पर , 

अभी भी अधूरी है ,

और याद रखना , 

तुम भी फिर अधूरी ही रह जाओगी, 

कम से कम एक ज़िन्दगी में।    

Friday, September 5, 2025

कल -आज -कल

  

भविष्य का सोच आज परेशान है ,

वर्तमान पिछली बातें सोच हैरान है ,

कहाँ है "अभी" वक्त जो हाथ में है ,

दो कल के बीच में फँसा पड़ा हैं। 

 

सबब ये है ध्यान बीती बातों में ,

चिंता आने वाले वक्त की सदा ,

मजा ले सकते है अभी में ,

वक्त का भी यही है तकाज़ा। 

 

बीता वक्त अब लौट नहीं सकता ,

आने वाले वक्त का बस कयास ही सही ,

तन -मन लगा अभी पर बस "आनन्द " ,

यही सुलझायेगा  कड़ियाँ  सभी। 

Sunday, August 31, 2025

नया वर्ल्ड आर्डर

 मानो तो मोदी है ,

न मानो तो ट्रम्प ,

संशय तो राहुल पर है ,

ज़ेलेन्स्की तो निशाने पर है ही। 

 

पुतिन अटल है , अडिग है ,

शी जिनपिंग खेल रहे गेम नई ,

यूरोप माथा पीट रहा ,

कौन गलत , कौन सही। 

 

अफ्रीका वाले मस्त है ,

देख रहे खेल सभी ,

करेंगे भी क्या वो वर्ल्ड आर्डर से ,

उनके घर के हालात ही सही नहीं। 

 

टैरिफ के चक्कर में ,

दुनिया बनी पड़ी है घनचक्कर ,

जबरदस्ती बॉस बनने पर तुला अमेरिका ,

पिछलग्गू है देश कई। 

 

तय होगा नया वर्ल्ड आर्डर ,

बन रहे है ध्रुव कई ,

बारूद के ढेर पर ,

लग न जाए चिंगारी कहीं। 

Thursday, August 28, 2025

सफ़र के नुक्ते

 

कब , कहाँ , किसको , किसकी पड़ी है ,

तन कहीं , मन कहीं, दिमाग की बत्ती बुझी पड़ी है ,

कहने को अकेले का ही सफर है "आनन्द"  यहाँ ,

नन्ही सी गाड़ी में न जाने कितने सवारियों की जिम्मेदारी है।

 

जिम्मेदारी तक तो ठीक ,

उम्मीदों का बोझ भारी है ,

मन गिरवी चंद पैसों खातिर ,

दिमाग में ख्याली पुलाव है ,

तन तरसता थोड़ा सुस्ताने को ,

पिछड़ने का डर लाज़मी है ,

अपने दुःख तो सहे जाते है ,

दूसरों के सुःख का दुःख ज्यादा हावी हैं।

 

जरूरतें तो कम ही है ,

इच्छाओं का ही कोई अंत नहीं है ,

जब तक अप्राप्य है , तभी तक धुन है ,

मिल गया तो फिर वह तुच्छ समान है ,

स्वर्ग की तलाश में भटक रहे सब ,

हर कोई परेशान और खुद हैरान है , 

संतोष किस चिड़िया का नाम है " आनन्द ",

भागते रहना ही तो जिंदगी का दूसरा नाम हैं।

Monday, August 25, 2025

सापेक्षिक पंक्तियाँ

 

विकल्प हमेशा से मौजूद है ,

"भाग लो" या "भाग" लो। १। 

 

राय अपनी तभी दो ,

अगला जब मानने को तैयार हो।२।

 

मेहनत करो , खूब करो ,

मगर दीवार खिसकाने में मत करो।३।    

 

ऊंगलीबाजी हर जगह ठीक नहीं ,

अपना गिरहेबां पहले ठीक करो।४।  

 

उम्मीद जायज है किसी से ,

मगर उसके भरोसे ही मत रहो।५। 

 

रिश्ते दो तरफा ही चलते है ,

अकेले हाथ से चुटकी बजाया करो।६।  

 

मेहनत का उम्र से सीधा रिश्ता है ,

जितनी जल्दी कर लो , अच्छा हैं।७। 

 

नेताओं के आपसी रिश्ते "गुप्त " होते है ,

बहकावे में आकर अपने रिश्ते ख़राब न करो।८। 

 

जो दिख रहा है , वही सच नहीं है ,

सोशल मीडिया के दौर में बड़ा झोल है। ९।

 

जेब में धन है , तब तक पूछे यार -रिश्तेदार ,

जेब खाली , पल्ला झाड़े - धन से चल रहा संसार।१०।  

 

वक्त बदल रहा तेजी से , ताल कैसे कोई मिलाये ,

पिछड़ने का खतरा बड़ा , बस सीखते जाइये। ११।

 

 है "ज्ञान" तो जो माँगे उसको दो ,

हर जगह "ज्ञानी " बनने से बचो। १२।  

Friday, August 22, 2025

अंतिम धुन

 



संदेशा पहुँचा राज दरबार ,

मिलना चाहती है राधा अंतिम बार ,

द्वारकादीश भागे छोड़ सब काम ,

पहुँचे जहाँ राधा कर रही थी अंतिम विश्राम ,

"बजा दो कान्हा , फिर वही धुन ,

अब गहरी नींद सोना चाहती हूँ ,

विरह में बीती सारी ज़िन्दगी ,

वो धुन फिर सुनना चाहती हूँ। "

राधा रानी के अंतिम शब्द ,

सुन कृष्ण मुस्कराये ,

पकड़ी फिर से बाँसुरी ,

जिसे त्याग आये थे वृंदावन धाम ,

अंतिम बार अधरों से ,

बाँसुरी से धुन छेड़ी ,

राधा पहुँच गयी कानन में ,

हौले से मुस्कराई ,

कुँज की गलियों में भागी ,

गोपियों संग अठखेली,

कान्हा को देख सुधबुध खोई ,

दी माखन की डली  ,

धीरे -धीरे आँखे बंद हुई ,

दिव्य तेज शरीर से निकला ,

उर में समा गई बाँसुरी बजैया,

तोड़ दी बाँसुरी ,

अंतिम बार निहारा ,

राधे अमर रहेगा प्रेम तुम्हारा ,

कैसा आलौकिक  प्रेम था ये ,

राधे -राधे हुआ जग सारा।

Wednesday, August 20, 2025

संदेश

 

मुकर्रर है वक्त हर चीज़ का ,

बेवज़ह बैचनीयाँ फिजूल है ,

कर्मों पर ही बस हक़ हमारा ,

चलते रहना जरुरी हैं। 

 

वक़्त तोलता है , परखता है 

किस्मत अपना खेल खेलती है ,

सबसे कमजोर क्षण देकर ,

उजला दरवाजा खोलती है। 

 

बिना कारण कुछ नहीं घटता ,

हर घटना का इक उद्देश्य है ,

उतार -चढ़ाव पाठ ज़िन्दगी के ,

जीवन ईश्वर का सन्देश हैं। 

 

जीवन नाजुक साँसो की डोर ,

वक्त सबका बहुत सीमित है ,

क़द्र कर वक्त की "आनन्द " ,

हर क्षण जीवन से भरपूर है। 

Monday, August 11, 2025

ए आई ( कृत्रिम बुद्धिमता )


कितना अच्छा हो जायेगा , 

हमारा सब काम ए आई से हो जायेगा , 

हमारे सारे सवालों का उत्तर , 

ए आई बड़ी सटीकता से देगा , 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

हम कही फँसे तो , 

ए आई हमें रास्ता दिखायेगा , 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

बीमारी में वो हमें , 

सबसे अच्छी दवा सुझायेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

हमारा हिसाब किताब भी वही रखेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

जब वो हमारे सारे दिमागी काम , 

ए आई खुद कर देगा , 

कितना अच्छा होगा , 

स्कूलों में ए आई पढ़ायेगा , 

कितना आराम होगा , 

जब सारे मुश्किल प्रश्न , 

ए आई झटपट सुलझायेगा , 

कितना अच्छा होगा , 

जब वो हमारे अच्छे -बुरे सब में , 

हमारे साथ हमारे दोस्त की तरह होगा, 

कितना अच्छा हो जायेगा , 

जब ए आई का साथ ही काफी होगा , 

क्या फर्क पड़ेगा ? 

जब हम अपनी अक्ल का इस्तेमाल , 

करना भूल जायेंगे , 

दिमाग हमेशा स्थिर हो जायेगा , 

सोचने समझने के क्रम में जो , 

विकसित हुआ था मस्तिष्क हमारा , 

फिर से सिफ़र हो जायेगा , 

ए आई जिस दिन ठहरेगा , 

वही दिन क़यामत का दिन होगा।   

Wednesday, August 6, 2025

जल्दी

हम सब आजकल , 

बहुत जल्दी में है , 

घर में , 

दफ्तर में , 

सड़क में , 

काम में , 

और यही जल्दी , 

हमारा धैर्य , 

खा रही है , 

हम उग्र हो रहे है , 

व्यग्र हो रहे है , 

और खो रहे है , 

मन की शांति , 

सुकून , 

और क्षय हो रहा है , 

हमारे शरीर का , 

हमारे मस्तिष्क का, 

ये जल्दी , 

धीरे -धीरे , 

घुन की भाँति , 

चट कर रही है , 

जीवन को।   

Monday, July 28, 2025

सावन

उमड़ घुमड़ मेघों का आच्छादन, 

नीले अम्बर पर जैसे श्वेतावरण , 

अठखेलियाँ खेलते संग समीरण , 

कोहरे से धुऑं -धुआँ वातावरण।  


कोई श्वेत वर्ण, कोई श्यामवर्ण , 

करते जोर -शोर से गर्जन ,

तरुवर सब निहारे नभ को , 

बूँदो से फिर दृश्य धरा विहँगम।  


रोम - रोम पुलकित धरा का , 

हरा -भरा चहुँओर आवरण , 

पपीहे -मयूरा सब नाचे पँख फैला , 

झूम -झूम बरसे जब सावन।  


पुलकित रज का कण -कण  , 

बूँदो की छुअन अप्रतिम , 

खिले हुए से तन -मन सारे , 

बरसे जब भी पीयूष सावन।